अयोध्या केस: मध्यस्थता पैनल ने सुप्रीम कोर्ट के सामने रखा नया प्रस्ताव, क्या है इसमें
नई दिल्ली। 40 दिनों तक चली रोजाना सुनवाई के बाद सुप्रीम कोर्ट ने अयोध्या भूमि विवाद मामले में अपना फैसला सुरक्षित रख लिया है। बुधवार को अयोध्या मामले में आखिरी सुनवाई हुई। अंतिम दिन की सुनवाई के दौरान कोर्टरूम में वकीलों के बीच तीखी बहस हुई, जबकि इस बीच सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ के सामने कोर्ट द्वारा नियुक्त मध्यस्थता पैनल ने 'समझौते' का एक नया प्रस्ताव पेश किया है।

मुस्लिम पक्ष की तरफ से सुन्नी वक्फ बोर्ड भी शामिल
इंडियन एक्सप्रेस की खबर के मुताबिक, कोर्ट द्वारा नियुक्त किए गए मध्यस्थता पैनल ने कुछ पक्षों की सहमति के बाद अयोध्या भूमि विवाद मामले में 'समझौते' का विवरण दिया है। इसमें विश्व हिंदू परिषद के नियंत्रण वाले रामजन्मभूमि न्यास, रामलला और छह अन्य मुस्लिम पक्षों, जिन्होंने अपील दायर की थी, वे इस समझौते में शामिल नहीं हैं। इस समझौते में हिंदू अखिल भारतीय श्रीराम जन्मभूमि पुनरूद्धार समिति, हिंदू महासभा और निर्मोही अनी अखाड़ा के श्रीमहंत राजेंद्रदास शामिल हैं। जबकि मुस्लिम पक्ष की तरफ से यूपी सुन्नी वक्फ बोर्ड भी शामिल है।

एएसआई के मस्जिद को नमाज के लिए फिर से खोले जाने की मांग
इस सेटलमेंट में मुस्लिम पक्ष ने राम मंदिर को उचित स्थान देने के बदले कुछ शर्तें रखी हैं। सूत्रों के मुताबिक, इसमें कहा गया है कि सुन्नी वक्फ बोर्ड को मस्जिद भूमि को सरकार की तरफ से अधिग्रहण किए जाने पर कोई ऐतराज नहीं है। सुन्नी वक्फ बोर्ड ने इसके बदले में एएसआई के मस्जिद को नमाज के लिए फिर से खोले जाने की मांग की है। साथ ही अयोध्या मस्जिद और सुन्नी वक्फ बोर्ड की वैकल्पिक मस्जिद की मरम्मत की मांग भी की गई है।

'सेटलमेंट' के प्रस्ताव को तय करने में करीब एक महीने का वक्त लगा
इंडियन एक्सप्रेस की खबर के मुताबिक, इस प्रस्तावित 'सेटलमेंट' के प्रस्ताव को तय करने में करीब एक महीने का वक्त लगा, इस प्रस्ताव से सहमति जताने वाले पक्षों के बीच दिल्ली और चेन्नई में दो-तीन मीटिंग्स हुईं। हालांकि, सुन्नी वक्फ बोर्ड के वकीलों का कहना है कि उनकी तरफ से कोई एनओसी दाखिल नहीं की गई है। उनकी तरफ से कहा गया कि कोई ईमेल या किसी तरह से इसकी सूचना उनको नहीं है। सुन्नी वक्फ बोर्ड के वकील जफरयाब जिलानी का कहना था कि ऐसी कोई अपील कोर्ट में नहीं दी गई है। इसके पहले, बुधवार को सुबह से ही मीडिया में खबरें आने लगी थीं कि सुन्नी वक्फ बोर्ड जमीन पर दावा छोड़ सकता है और वह कोर्ट में हलफनामा दायर करने की तैयारी कर रहा है।

40 दिनों तक हुई सुप्रीम कोर्ट में रोजाना सुनवाई
बता दें कि राम मंदिर-बाबरी मस्जिद मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने साल 2010 में फैसला सुनाया था। जिसमें कोर्ट ने विवादित 2.77 एकड़ भूमि को तीन पक्षकारों-सुन्नी वक्फ बोर्ड, निर्मोही अखाड़ा और रामलला के बीच बराबर-बराबर बांटने का फैसला सुनाया था। इलाहाबाद हाईकोर्ट के इस फैसले से तीनों पक्षों ने असहमति जताई थी और इस फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में 14 याचिकाएं दायर की गई थीं।












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