आदिवासी सीटों पर क्यों पिछड़ी कांग्रेस? छत्तीसगढ़ से राजस्थान तक हुआ बदलाव देखिए

Assembly Election Results 2023: कांग्रेस अगर चार राज्यों- राजस्थान, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश और तेलंगाना के चुनाव परिणामों की समीक्षा करने बैठेगी तो उसे यह सोचने के लिए मजबूर होना पड़ेगा कि आखिर उसकी रणनीति कहां फेल हुई कि आदिवासियों का उससे मोहभंग होता नजर आया है।

इन चारों राज्यों के अनुसूचित जनजाति (ST) के लिए आरक्षित 113 चुनाव क्षेत्रों के परिणामों के विश्लेषण से पता चलता है कि बीजेपी ने एक साल पहले गुजरात विधानसभा चुनाव में आदिवासी बहुल सीटों पर जो बुनियाद रखी थी, उसपर वह अपनी बुलंद इमारत खड़ी कर चुकी है।

tribal votes shifts from congress to bjp

पीएम मोदी ने भी जीत में आदिवासियों की भूमिका सामने रखी
तीन हिंदी भाषी क्षेत्रों में भाजपा को मिली शानदार जीत का जश्न मनाने जब रविवार शाम को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी नई दिल्ली में पार्टी के मुख्यालय पहुंचे तो उन्होंने बताया कि बीजेपी की जीत में आदिवासी वोटरों ने कितनी बड़ी भूमिका निभाई है।

पीएम मोदी ने कहा,'आदिवासी समुदाय ने गुजरात में कांग्रेस को हराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी और मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में कांग्रेस के खिलाफ जनादेश में भी यही दिखा है।'

बस्तर में लहराया भगवा
इस बार आदिवासी वोटों का कांग्रेस से बीजेपी की ओर शिफ्ट होने का सबसे बड़ा उदाहरण छत्तीसगढ़ में देखा जा सकता है। यहां माना जाता है कि 'बस्तर में जिसकी भी जीत होती है, उसी की सरकार बनती है।' यहां पहले चरण में 7 नवंबर को मतदान हुआ था और भाजपा को यहां मिली बड़ी बढ़त से राज्य जीतने में सहायता मिली है।

स्तर-सरगुजा का कांग्रेस से मोहभंग
2018 में बस्तर डिविजन की 12 में से 11 सीटें कांग्रेस जीती थी। एकमात्र दंतेवाड़ा भी 2019 के उपचुनाव में उसके खाते में चली गई थी। लेकिन, इस बार बस्तर-सरगुजा ने कांग्रेस को बाहर का रास्ता दिखाया है।

छत्तीसगढ़ की 90 में से 29 सीटें अनुसूचित जनजातियों (ST) के लिए आरक्षित हैं। पिछली बार में इनमें से 25 पर कांग्रेस जीती थी और बीजेपी को सिर्फ 3 सीटें मिली थी। इस बार कांग्रेस यहां की 11 सीटें जीत गई है और 17 पर भाजपा को सफलता मिली है।

आदिवासी सीटों पर बीजेपी का वोट शेयर 11% बढ़ गया
यही नहीं अगर वोट शेयर देखें तो भाजपा को आदिवासी बेल्ट में जबर्दस्त कामयाबी मिली है और कांग्रेस का जनाधार खिसक गया है। 2018 में इन सीटों पर बीजेपी का वोट शेयर 32.3% रहा था और इस बार उसे 43.3% यानि 11% का फायदा हुआ है। जबकि, कांग्रेस को 2018 में 45.1% वोट मिले थे और इस बार उसे सिर्फ 41.7% मत मिले हैं।

चार राज्यों की 53 एसटी सीटें बीजेपी के खाते में
अगर रविवार को आए चारों राज्यों के नतीजों की बात करें तो कांग्रेस के पास 2018 में कुल 113 अनुसूचित जनजाति की सीटों में से 72 सीटें थीं, जो कि अब सिर्फ 52 रह गई हैं। वहीं बीजेपी पिछली बार सिर्फ 28 सीटों पर जीती थी, इस बार वह कांग्रेस की पिछली संख्या से भी ज्यादा 53 तक पहुंच गई है।

जैसे मध्य प्रदेश में अब बीजेपी के पास 16 से बढ़कर 24 आदिवासी सीटें हैं। राजस्थान में 9 से बढ़कर 12 सीटें हो गई हैं। तेलंगाना में पहले भी वह कोई आदिवासी सीट नहीं जीती थी और इस बार भी उसका खाता नहीं खुला है।

कांग्रेस को सिर्फ तेलंगाना से करना पड़ेगा संतोष
वहीं कांग्रेस के पास 2018 में जहां मध्य प्रदेश में 30 आदिवासी बहुल सीटें थीं तो अब घटकर 22 रह गई हैं। राजस्थान में वह 12 से घटकर 10 पर रह गई है। अलबत्ता में तेलंगाना में उसे फायदा मिला है और उसकी एसटी सीटें 5 से बढ़कर 9 हो गई हैं।

आदिवासी वोटरों के हृदय परिवर्तन का कारण?
तथ्य यह है कि भारतीय जनता पार्टी आदिवासी वोट बैंक को अपनी ओर खींचने की कोशिश में 2014 से ही लगी हुई है। उसने द्रौपदी मुर्मू को राष्ट्रपति बनाकर आदिवासी सशक्तिकरण का बहुत बड़ा दांव चला है। इसका असर सबसे पहले गुजरात में ही दिखा था, जहां पहली बार एसटी सीटों पर भी बीजेपी अप्रत्याशित तरीके से जीती थी।

यही नहीं चुनाव के आगाज से पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आदिवासी केंद्रीय यूनिवर्सिटी को तेलंगाना में मंजूरी दी थी। चुनाव के दौरान उन्होंने झारखंड में आदिवासी योद्धा भगवान बिरसा मुंडा के गांव जाकर उन्हें श्रद्धांजलि भी दी। केंद्र सरकार आदिवासी कल्याण के लिए एकलव्य मॉडल आवासीय विद्यालय और मॉडल गांवों पर काम पहले से ही कर रही है।

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छत्तीसगढ़ में कांग्रेस से क्यों नाराज हुए आदिवासी?
वनइंडिया में हमारे सहयोगी धीरेन्द्र गिरि गोस्वामी की रिपोर्ट है कि छत्तीसगढ़ में आदिवासी समाज अपने देव स्थल 'देवगुड़ी' को बहुत महत्त्व देते हैं। वे प्रकृति पूजक होते हैं और उनकी अलग पूजा पद्धति है।

लेकिन, पिछली भूपेश बघेल सरकार ने योगी मॉडल को कॉपी करने के चक्कर में रामगमन पथ का विस्तार आदिवासी इलाकों में भी करना शुरू किया, जिसे आदिवासियों ने पसंद नहीं किया। आरक्षण के मसले को लेकर भी उनमें कांग्रेस के प्रति नाराजगी रही।

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