Assembly Result 2023: लोकसभा चुनाव से पहले अब बीजेपी का आखिरी कांटा क्या है?
Assembly Election 2023 results: 3 दिसंबर, 2023 यानि रविवार को पांच में से चार राज्यों के परिणाम अगले साल होने वाले लोकसभा चुनावों का एक रुझान हो सकता है।
राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और तेलंगाना इन चारों राज्यों में 2018 में बीजेपी कहीं भी सत्ता में नहीं आई थी। कांग्रेस को भी छत्तीसगढ़ छोड़कर एमपी या राजस्थान में पूर्ण बहुमत नहीं मिला था; और तेलंगाना में बीआरएस की आंधी चली थी।

देश की मौजूदा राजनीतिक माहौल की तस्वीर वाला है परिणाम
उस हिसाब से 2023 के विधानसभा चुनाव के परिणाम पूरी तरह से देश के मौजूदा राजनीतिक माहौल की बड़ी तस्वीर पेश करता है। यह तथ्य है कि ये चुनाव ऐसे समय में हुए हैं, जब केंद्र में दो बार से बीजेपी की पूर्ण बहुमत वाली सरकार है और उसके खिलाफ देशव्यापी 28 दलों का गठबंधन 'इंडिया' बनाया गया है।
पहले चारों राज्यों के चुनाव परिणाम और बीजेपी, कांग्रेस (और इंडिया ब्लॉक में शामिल उसकी सहयोगियों) और विपक्ष की अन्य पार्टियां के प्रदर्शन पर संक्षेप में गौर कर लेते हैं।
बीजेपी के लिए गुजरात की तरह ऐतिहासिक है एमपी की जीत
मध्य प्रदेश में बीजेपी की जीत पिछले साल गुजरात विधानसभा चुनावों के आए परिणामों की तरह ही ऐतिहासिक है। यहां पार्टी कुछ समय को छोड़कर लगातार दो दशकों से सत्ता में है। फिर भी पिछले चुनाव के मुकाबले उसका वोट शेयर करीब 8% बढ़ा नजर आ रहा है। जबकि, राज्य में मुख्य विपक्षी कांग्रेस का वोट शेयर लगभग 40% के आसपास ही बरकरार है।
राजस्थान में भाजपा के वोट शेयर में और बढ़ोतरी
दो दशकों से सत्ता में रहने मौजूद पार्टी पर वोटरों का इतना बड़ा विश्वास सामान्य नहीं है। इसी तरह से राजस्थान में भी भाजपा का वोट शेयर लगभग तीन फीसदी बढ़ा है और वहां सत्ता परिवर्तन का पैटर्न कायम रह गया है। जबकि, यहां भी कांग्रेस का वोट शेयर लगभर पिछली बार की जगह ही स्थिर है।
हिंदी हार्टलैंड में कांग्रेस के सारे दांव हो गए फेल
छत्तीसगढ़ में तो बीजेपी के वोट शेयर में करीब 13% की बढ़ोतरी हुई है। जबकि, कांग्रेस के वोट शेयर में सिर्फ 1% के करीब कमी दर्ज की गई है। यह तीनों वे राज्य हैं, जहां कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने इंडिया ब्लॉक के सबसे बड़े चुनावी एजेंडे जातिगत जनगणना को जमकर भुनाने की कोशिश की है। इसके अलावा कर्नाटक वाली कामयाबी की उम्मीद में जमकर लोक-लुभावन वादे भी किए गए हैं। पुरानी पेंशन स्कीम की चासनी भी लगाने की कोशिश की गई है। लेकिन, सारा दांव उलटा पड़ गया है।
तेलंगाना से कांग्रेस को मिली अच्छी खबर
अलबत्ता, कांग्रेस के लिए तेलंगाना से अच्छी खबर जरूर है। यह कर्नाटक से सटा राज्य है, जहां अपनी पांच चुनावी गारंटियों के दम पर कांग्रेस ने इसी साल बड़ी जीत दर्ज की थी। तेलंगाना चुनाव को कांग्रेस ने पूरी तरह से कर्नाटक कार्ड के दम पर लड़ा है और वहां के सत्ताधारी नेताओं ने पार्टी के लिए राज्य में कड़ी मेहनत भी की है। तथ्य यह भी है कि कर्नाटक की कांग्रेस सरकार के अभी करीब 6 महीने ही पूरे हुए हैं।
तेलंगाना से भी बीजेपी को मिली अच्छी खबर
लेकिन, यहां भी भाजपा के लिए विधानसभा चुनाव शुभ संकेत लेकर आए हैं। राज्य में पार्टी का वोट शेयर करीब दोगुना हो गया है और सीटों के मामले में भी वह अपना पिछला सारा रिकॉर्ड तोड़ चुकी है।
विधानसभा चुनाव बीजेपी के लिए लोकसभा चुनाव को लेकर शुभ संकेत
अगर पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों को 2024 के लोकसभा चुनावों से पहले सत्ता का सेमीफाइनल समझें तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के चेहरे वाली बीजेपी के लिए बहुत बड़ा शुभ संकेत है।
यानि बिहार की तर्ज पर जाति जनगणना वाला कांग्रेसी कार्ड भाजपा ने हिंदी हार्टलैंड में फेल कर दिया है, यह लोकसभा चुनावों के लिए पार्टी की बहुत बड़ी सफलता है।
भाजपा के लिए आखिरी चुनावी कांटा!
लेकिन, कर्नाटक के चुनावों के बाद से एक ट्रेंड लगातार दिख रहा है, जो कि आने वाले लोकसभा चुनावों में भाजपा के लिए बड़ा कांटा साबित हो सकता है। यह कांटा है, मुस्लिम वोट बैंक का पूरी तरह से कांग्रेस के पक्ष में गोलबंद होते नजर आना।
तेलंगाना में कांग्रेस की ओर झुका मुस्लिम वोट!
इसका सबसे बड़ा संकेत तेलंगाना विधानसभा चुनाव के परिणामों में नजर आ रहा है। यहां मुसलमानों की राजनीति करने वाले हैदराबाद के सांसद असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी एआईएमआईएम का वोट शेयर पिछली बार से भी कम रह गया है। वहीं बीआरएस का वोट शेयर भी करीब 9% गिरा है। जबकि, कांग्रेस का वोट प्रतिशत 11% से भी बढ़ गया है।
माना जा रहा है कि तेलंगाना में मुसलमानों का अधिकतर वोट इस बार कांग्रेस में शिफ्ट हुआ है। पहले कर्नाटक में भी यही ट्रेंड नजर आ चुका है। अगले लोकसभा चुनावों में भी यह ट्रेंड जारी रह सकता है और बीजेपी को इसके हिसाब से अपनी रणनीति बनाने की जरूरत पड़ सकती है।












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