Assembly Elections: कांग्रेस की हार के लिए सिर्फ क्षेत्रीय नेता जिम्मेदार! किसे बचा रहे हैं राहुल गांधी?

कांग्रेस नेता राहुल गांधी शायद बड़ी आसानी से राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में पार्टी की करारी हार का ठीकरा स्थानीय नेताओं पर फोड़कर बच निकलने की कोशिशों में जुटे हुए हैं।

जबकि, तीनों उत्तर भारतीय राज्यों में जो भी चुनाव परिणाम आया, उसके लिए कांग्रेस का शीर्ष नेतृत्व और खुद राहुल गांधी भी जिम्मेदारी लेने से बच नहीं सकते। खासकर मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में जहां पार्टी अपनी शानदार जीत पक्की मानकर ही मैदान में उतरी हुई थी।

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राहुल गांधी क्षेत्रीय नेताओं पर फोड़ रहे हैं हार का ठीकरा
जानकारी के मुताबिक कांग्रेस वर्किंग कमेटी की बैठक में गुरुवार को राहुल गांधी ने तीनों राज्यों में हार का ठीकरा सीधे क्षेत्रीय नेताओं पर फोड़ दिया। उन्हें लग रहा है कि सहयोगी दलों (इंडिया ब्लॉक) को दरकिनार करने से ही हिंदी भाषी राज्यों में कांग्रेस की मिट्टी पलीद हुई है।

'दूसरों' का वोट क्यों खिसका?
राहुल ने बैठक में कांग्रेस नेताओं से कथित तौर पर कहा है कि पार्टी मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में अपना वोट शेयर बनाए रखने में सफल रही है, लेकिन 'दूसरों' का वोट खिसकने से बीजेपी का वोट शेयर बहुत बढ़ गया है। अब उनके मन में सवाल उठ रहे हैं कि कांग्रेस 'वैसे' वोट जुटाने में क्यों नाकाम रही?

सूत्रों के मुताबिक उन्होंने पार्टी के सामने इसके लिए तेलंगाना का उदाहरण भी रखा, जहां कांग्रेस करीब एक साल में 20% वोट शेयर जुटाने में कामयाब हुई है। उनके हवाले से एक नेता का कहना था कि तीनों राज्यों के क्षेत्रीय नेता नए लोगों को जगह देने के विचार के 'खिलाफ' थे।

बलि का बकरा ढूंढ़ने में जुटे कांग्रेसी नेता?
सीडब्ल्यूसी में पार्टी अध्यक्ष मल्लिकार्जुन समेत कई और नेताओं ने भी एमपी में हार के लिए प्रदेश अध्यक्ष कमलनाथ की आलोचना की। क्योंकि, उनके मुताबिक वही समाजवादी पार्टी को सीट देने को तैयार नहीं हुए। कथित तौर पर एआईसीसी ने उनसे कहा था कि सपा को 4-5 और जेडीयू को 1 सीट दें।

ऐसे में सवाल बनता है कि अगर उस समय सपा चीफ अखिलेश यादव कमलनाथ के बर्ताव से नाराज हुए थे तो राहुल या खड़गे जैसे नेताओं ने सीधे दखल देने की कोशिश क्यों नहीं की?

इसी तरह से कांग्रेस नेताओं ने अपनी राजस्थान यूनिट की भी आलोचना की है। उनको लगता है कि सीपीएम के साथ तालमेल नहीं करने और आदिवासी इलाकों गठबंधन नहीं करने से पार्टी की लुटिया डूब गई है।

वहीं अब छत्तीसगढ़ कांग्रेस के नेता भी पार्टी आलाकमान की आंखों में खटकने लगे हैं। इनके मुताबिक छोटी पार्टियों से दूर रहने का फैसला पार्टी को विधानसभा चुनावों में भारी पड़ गया है।

सवाल है कि क्या कांग्रेस आलाकमान को इन चुनावी रणनीतिक खामियों की भनक पहले नहीं लगी थी? अगर उन्हें पहले आगाह किया गया होता तो क्या कमलनाथ, अशोक गहलोत या भूपेश बघेल जैसे क्षेत्रीय नेताओं में राहुल गांधी या खड़गे के निर्देशों की अनदेखी करने की हिम्मत थी?

क्या कांग्रेस की हार के लिए खुद राहुल नहीं हैं जिम्मेदार?
क्या विधानसभा चुनावों के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ आपत्तिजनक टिप्पणियों के लिए राहुल गांधी जिम्मेदार नहीं हैं? उन्होंने उनके लिए 'पनौती मोदी' और 'जेबकतरा' जैसे आपत्तिजनक शब्दों तक का इस्तेमाल किया था, जिसमें 'जेबकतरा' पर तो दिल्ली हाई कोर्ट ने भी संज्ञान लिया है।

प्रियंका को समझ में आ चुका है नकारात्मक प्रचार का अंजाम?
राहुल को अब जिन (फ्लोटिंग) वोटरों को बीजेपी में जाने का दुख सता रहा है, क्या उन वोटरों में से कुछ को उनका 'आपत्तिजनक' बयान प्रभावित नहीं किया होगा? शायद उनकी बहन प्रियंका गांधी वाड्रा को अब इस 'नकरात्मक' प्रचार का एहसास होने लगा है।

क्योंकि, सीडब्ल्यूसी की बैठक में उन्होंने इस बात पर जोर दिया है कि अब कांग्रेस को नकरात्मक प्रचार से आगे बढ़कर 'सकारात्मक कार्यक्रम आधारित ऐक्शन' पर ध्यान देना चाहिए। बड़ी बात ये है कि कांग्रेस में इस नीतिगत रणनीति में बदलाव की आवाज गांधी परिवार से ही उठी है।

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