ख़ुद को भारतीय साबित करने के लिए क्यों लड़नी पड़ी लंबी लड़ाई

शेफाली रानी दास
DILIP SHARMA
शेफाली रानी दास

"पुलिस मुझे पकड़ने के लिए कई घंटे हमारे घर के सामने बैठी रही. मैं तब घर पर ही थी, लेकिन पुलिस को देखने के बाद पीछे के दरवाजे से भाग गई और गांव से दूर एक मुसलमान परिवार के घर दिन भर छिपी रही. बच्चों के लिए रात को घर तो आना पड़ा लेकिन डर से न तो खाना पेट में उतरता था. न ही रातों को नींद आती थी."

लगभग पांच साल की अनथक भाग-दौड़ और लंबी लड़ाई के बाद शेफाली रानी दास ने खोई नागरिकता तो फिर से हासिल कर ली है लेकिन वो बुरा समय उनके मन-मष्तिष्क में घर कर गया.

गुवाहाटी हाई कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद 42 साल की शेफाली दास पिछले माह फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल (एफटी) के सामने अपनी नागरिकता का दावा साबित करने में कामयाब रहीं, जिस अधिकार पर साल 2017 में प्रश्न चिन्ह लगा दिया गया था. अब वे फिर से एक भारतीय नागरिक हैं.

असम में फ़ॉरेनर्स ट्रिब्यूनल्स में जिन लोगों की नागरकिता को लेकर मामले चल रहे हैं उन्हें शहरियत साबित करने के लिए पहली जनवरी 1966 से पहले के भारत में रहने से संबंधित दस्तावेज जमा करवाने पड़ते हैं.

हालांकि 15 अगस्त, 1985, को भारत सरकार और असम आंदोलन के नेताओं के बीच जो असम समझौता हुआ था उसमें विदेशियों का पता लगाने और निर्वासित करने की कट-ऑफ़ तारीख़ 25 मार्च, 1971 तय की गई थी. लेकिन अब असम समझौते का क्लॉज 6 लागू कर दिया गया है जिसके बाद भारतीय नागरिकता के लिए पहली जनवरी 1966 या उससे पहले के क़ागज़ दिखाने पड़ते हैं.

कछार ज़िले के मोहनखाल गांव की शेफाली दास के विरूद्ध नागरिकता को लेकर पहला मामला साल 2012 में दर्ज हुआ और फिर ये फॉरेन ट्राइब्यूनल में चला गया.

शेफाली गांव में अपने विकलांग पति और तीन बच्चों के साथ रहती हैं. लेकिन पुलिस उन्हें तलाश करते-करते इस अंदरूनी इलाके तक आ पहुंची.

https://www.youtube.com/watch?v=gSm3n4RTA7Y

अचानक बांग्लादेशी कैसे बन गए?

वे कहती हैं, "साल 2017 में जब पुलिस पहली बार हमारे घर आई थी तो मैं और मेरे पति घर नहीं थे. पुलिस ने मेरे छोटे बेटे को डरा धमकाकर क़ागज़ थमाने की कोशिश की लेकिन उसने मना कर दिया. थोड़ी देर बाद तब वो (मेरा बेटा) अमराघाट गया तो पुलिस ने उसे वहां पकड़ लिया और कागज़ पकड़ा दिया.

"नोटिस पढ़कर जब हमें पता चला कि हमें विदेशी, बांग्लादेशी क़रार दे दिया गया है तो ये सुनकर मेरा शरीर कांपने लगा, मैं सोचने लगी कि अगर मैं जेल चली गई तो मेरे बेटों और नन्ही सी बेटी को कौन संभालेगा? उस दिन घर पर किसी ने खाना नहीं खाया.

"यहीं जन्मी, पढ़ी-लिखी तो आज अचानक से हम बांग्लादेशी कैसे बन गए? बार-बार यही सवाल मन में कौंधते रहे."

इस बीच फॉरनर्स ट्राइब्यूनल ने सितंबर 2017 में 'एकतरफा' फ़ैसला सुनाते हुए शेफाली को विदेशी नागरिक घोषित कर दिया.

एफ़टी ने दो पन्ने के आदेश में लिखा कि शेफाली के मुक़दमे में फ़रवरी से सितंबर (2017) के बीच कुल पांच सुनवाइयां हुईं लेकिन शेफाली दास उसमें ग़ैर-हाज़िर रहीं. अदालत ने इसे घोर लापरवाही का मामला बताया.

अदालत तक जाना ख़र्चीला काम

शेफाली ने बीबीसी से कहा, "हमारे पास दो वक़्त ठीक से खाना खाने तक की व्यवस्था नहीं है. केस लड़ने के लिए पैसा चाहिए. मैं शुरू में कई सुनवाई के दौरान सारे कागज़ात लेकर अदालत गई. लेकिन प्रत्येक सुनवाई में गांव से सिलचर आने-जाने का ख़र्चा, वकील की फ़ीस, ये सब जुगाड़ कर पाना मुश्किल होता जा रहा था.

शेफाली बताती हैं कि उन्होंने मुक़दमे के लिए पैसे जमा करने को लेकर लोगों के घर झाड़ू-पोंछा तक किया, विकलांग पति ने ईंटें तक ढोईं, फिर भी कभी-कभी उनके पास एक रुपया तक नहीं होता था.

नाम न छापने की शर्त पर फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल के एक मेंबर-जज ने बताया कि, "विदेशी अधिनियम के तहत किसी मामले को निपटाने के लिए ट्राइब्यूनल को 60 दिनों का वक़्त मिलता है. लेकिन अधिकतर मामले सालों तक चलते हैं. समय दिया जाता है ताकि अभियुक्त नागरिकता से जुड़े सभी दस्तावेज़ पेश कर सकें. लेकिन लोग हाज़िर नहीं हो पाते और अंत में एक तरफ़ा फ़ैसले के तहत विदेशी घोषित कर दिया जाता है."

एफ़टी के ऑर्डर की कॉपी
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एफ़टी के ऑर्डर की कॉपी

फॉरेनर्स ट्राइब्यूनल

असम गृह और राजनीतिक विभाग की वेबसाइट के अनुसार राज्य में इस समय कुल 100 ट्राइब्यूनल कार्यरत हैं. यह एक अर्ध-न्यायिक व्यवस्था है.

फॉरेनर्स ट्राइब्यूनल एक्ट, 1941 और फॉरेनर्स ट्राइब्यूनल ऑर्डर 1964 के तहत जजों और एडवोकेट्स को ट्राइब्यूनल के सदस्य के रूप में नियुक्त किया जाता है.

पहले राज्य में 11 अवैध प्रवासी निर्धारण न्यायाधिकरण (आईएमडीटी) थे. लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने साल 2002 आईएमडीटी क़ानून को रद्द कर दिया था. बाद में इन्हें फॉरेनर्स ट्राइब्यूनल में परिवर्तित कर दिया गया.

जब 2014 के बाद काम-काज बढ़ा तो ट्राइब्यूनल में बड़ी संख्या में वकीलों को एफ़टी मेंबर के तौर पर नियुक्त किया गया. तबसे ट्राइब्यूनल का कामकाज सवालों के घेरे में है.

आरोप है कि भारतीय नागरिकता से जुड़े उचित दस्तावेज़ होने के बावजूद लोगों को ख़ासकर बंगाली भाषी हिंदू और मुसलमानों को एकतरफा फ़ैसले के ज़रिए विदेशी घोषित कर दिया जाता है.

शेफाली के मामले में क्या लिखा गया?

शेफाली रानी दास के आदेश में लिखा गया है कि वो (शेफाली) 1971 के बाद बांग्लादेश से भारत आई हैं. वो अवैध नागरिक हैं. इसलिए शेफाली रानी दास को भारत के क्षेत्र में रहने का कोई अधिकार नहीं है, बल्कि उन्हें तुरंत निष्कासित किया जा सकता है.

आदेश में शेफाली की मुक़्त आवाजाही पर रोक लगाने, और क़ानून के अनुसार आवश्यक क़दम उठाते हुए उनका नाम मतदाता सूची से हटाने की बात भी कही गई है.

ट्राइब्यूनल का काम

हालांकि ट्राइब्यूनल की एक महिला सदस्य का कहना है कि आदेश में इन बातों को लिखने की कोई ज़रूरत नहीं होती.

महिला सदस्य कहती हैं कि जब भी किसी को ट्राइब्यूनल में किसी को विदेशी नागरिक घोषित किया जाता है तो बॉर्डर पुलिस वहां मौजूद रहती है और वो तुरंत घोषित व्यक्ति को अपनी हिरासत में ले लेती है.

वे कहती हैं कि ट्राइब्यूनल का काम ये देखना होता है कि बॉर्डर पुलिस की तरफ़ से जिस व्यक्ति की नागरिकता को लेकर मामला भेजा गया है उसके पास भारतीय नागरिकता से जुड़े सभी दस्तावेज़ हैं या नहीं.

प्रबोध रंजन दास
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प्रबोध रंजन दास

शेफाली के पति का मामला अब तक नहीं सुलझा

60 प्रतिशत हिंदू आबादी वाले गांव मोहनखाल में 15 ऐसे हिंदू परिवार है जिनकी नागरिकता को लेकर मामले चल रहे हैं. शेफाली दास के पति प्रबोध रंजन दास उनमें से एक हैं.

62 साल के दास के पास 1978 में मैट्रिक पास करने का सर्टिफिकेट है. वे दावा करते हैं कि उनके पास असम सरकार से उनके पिता को 1960 में दिया गया शरणार्थी पंजीकरण प्रमाण-पत्र भी मौजूद है.

दास कहते हैं, "हमने मोदी सरकार को ये सोचकर वोट दिया था कि उनके शासन में खुशी से रहेंगे. परंतु हमारे पास भारत में पैदा होने के सारे प्रमाण होने के बावजूद विदेशी का टैग लगाकर पुलिस परेशान कर रही है. पांच साल की परेशानी के बाद अब शेफाली (पत्नी) की नागरिकता का मामला सुलझा है. लेकिन मेरा मामला अबतक लंबित है. मुझे उम्मीद है कि मोदी सरकार हिंदुत्ववादी होने के कारण हमारी रक्षा करेगी."

दास कहते हैं कि उन्होंने पिता का रजिस्ट्रेशन कार्ड, ख़ुद का मैट्रिक सर्टिफिकेट, निवास प्रमाण पत्र और मेरी मां, मेरे भाई के नाम पर मौजूद 1971 की लेगेसी जमा करवा रखी है, फ़िर भी ट्राइब्यूनल ने उनके मामले को लटका रखा है.

भारतीय जनता पार्टी के चुनावी घोषणा-पत्र में हिंदू बांग्लादेशी शरणार्थियों को नागरिकता देने का वादा किया गया था. लेकिन नागरिकता क़ानून अभी तक लागू नहीं हो पाया है.

शेफाली रानी दास के विधानसभा क्षेत्र धोलाई से चुने गए मौजूदा विधायक परिमल शुक्लबैद्य असम की बीजेपी सरकार में लगातार दूसरी बार मंत्री हैं.

असम के पर्यावरण और वन विभाग मंत्री शुक्लबैद्य का कहना है कि बीजेपी की सरकार राज्य में 2016 में बनी है लेकिन लोगों को नोटिस पहले से ही भेजा जा रहा था. लोगों को पता ही नहीं है कि उन्हें 'डी' वोटर बना दिया गया है. कछार ज़िले में भी बहुत जगह एक तरफ़ा विदेशी घोषित किया गया.

शुक्लबैद्य कहते हैं कि ये न्याय से जुड़ी बात है. इसलिए हमने ऐसे लोगों की क़ानूनी मदद के लिए एक मोर्चा भी तैयार किया है.

वे कहते हैं कि नरेंद्र मोदी सरकार सीएए लाई है. जब इसके नियम बनकर लागू हो जाएंगे तो बहुत सारे लोगों के लिए एफ़टी की परेशानी ख़त्म हो जाएगी.

शेफाली का मामला लड़ने वाले वकील मोहितोष दास
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शेफाली का मामला लड़ने वाले वकील मोहितोष दास

शेफाली का मामला लड़ने वाले वकील मोहितोष दास कहते हैं, "शेफाली जब मेरे पास आईं तो उसके पास वो सारे कागज़ात थे जिससे नागरिकता साबित की जा सकती है. हमने पिछले साल गुवाहाटी हाई कोर्ट के समक्ष बात रखी जिसने शेफाली को दोबारा एफ़टी में अपना पक्ष रखने का मौक़ा दिया."

17 जनवरी को ट्राइब्यूनल-6 ने सारे कागजातों की जांच के बाद अपने पुराने आदेश को रद्द करते हुए शेफाली को भारतीय नागरिक घोषित कर दिया.

लंबी मशक्कत के बाद शेफाली ख़ुद को फ़िर से भारतीय साबित करने में कामयाब तो हो गई हैं लेकिन चिंता है कि लाख़ों का क़र्ज़ जो इस भागदौड़ के लिए लेना पड़ा वो कैसे चुकता होगा.

इस बीच बच्चों की पढ़ाई भी छूट गई.

शेफाली कहती हैं, "किसी भी व्यक्ति के लिए नागरिकता से बढ़कर कुछ नहीं होता. मेरे परिवार ने, मेरे बच्चों ने पिछले पांच साल जिस दहशत में गुज़ारे हैं उससे बड़ा कष्ट जीवन में शायद ही कुछ हो. मैं पूरी जिंदगी इस वेदना को नहीं भूल पाऊंगी. लेकिन अभी तो एक और लड़ाई लड़नी है पति को भारतीय साबित करने की.

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