Assam ONGC gas leak से मचा हड़कंप, भोटियापार से 700 लोग विस्थापित, क्या दोहराई जा रही है बागजान की कहानी?

Assam ONGC gas leak: असम के शिवसागर जिले के भोटियापार क्षेत्र में स्थित ऑयल एंड नेचुरल गैस कॉरपोरेशन (ओएनजीसी) के एक पुराने कुएं में 12 जून को दोपहर करीब 12 बजे एक विस्फोट के बाद गैस का अनियंत्रित रिसाव शुरू हो गया। घटना के बाद से अब तक स्थिति पूरी तरह नियंत्रित नहीं हो सकी है।

यह कुआं रुद्रसागर तेल क्षेत्र के रिग नंबर एसकेपी 135 का हिस्सा है और इसे निजी कंपनी एसके पेट्रो सर्विसेज द्वारा संचालित किया जा रहा था। गैस रिसाव की गंभीरता को देखते हुए जिला प्रशासन ने तत्काल एक किलोमीटर के दायरे में घेराबंदी कर दी है।

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इसके साथ ही सुरक्षा को देखते हुए क्षेत्र में रहने वाले करीब 700 से अधिक लोगों को सुरक्षित स्थानों पर भेज दिया गया है। राहत और बचाव कार्य ओएनजीसी, अग्निशमन, और आपातकालीन सेवाओं की सहायता से प्रशासन द्वारा समन्वय में जारी है।

अब तक क्या-क्या हुआ?

शिवसागर के जिला उपायुक्त आयुष गर्ग ने मीडिया को जानकारी दी कि नियमित कार्य के दौरान अचानक कुएं से गैस निकलने लगी, जिससे रिसाव और संभावित विस्फोट की स्थिति बनी। वहीं ओएनजीसी (ONGC) द्वारा जारी एक विज्ञप्ति में कहा गया है कि "देश की सबसे अनुभवी संकट प्रबंधन टीम" स्थिति को संभालने में लगी है और विशेषज्ञों को देश के विभिन्न हिस्सों से बुलाया गया है।

घटना जिस कुएं (RDS-147) में हुई, वह फिलहाल निष्क्रिय था और उसमें उत्पादन नहीं हो रहा था। बताया जा रहा है कि उस समय कुएं में 'जोन ट्रांसफर' के लिए छिद्र तैयार करने का काम चल रहा था, तभी विस्फोट के साथ गैस का रिसाव शुरू हो गया।

2020 बागजान त्रासदी की यादें फिर हुई ताजा

यह घटना एक बार फिर 2020 के बागजान गैस लीक की भयावह यादें ताजा कर गई है, जब असम के तिनसुकिया जिले में स्थित ऑयल इंडिया लिमिटेड (OIL) के एक कुएं से गैस का अनियंत्रित रिसाव होने लगा। यह रिसाव करीब 173 दिनों तक चलता रहा और अंततः आग लगने से तीन कर्मचारियों की मौत हो गई थी। उस समय प्रभावित क्षेत्र डिब्रू सैकाओवा राष्ट्रीय उद्यान और मगुरी-मोटापुंग बील जैसे जैव विविधता वाले क्षेत्रों के नजदीक था।

बागजान त्रासदी के बाद असम सरकार ने एक व्यक्ति की जांच आयोग नियुक्त किया था, जिसने अपनी रिपोर्ट में बताया कि उस आपदा में लगभग ₹25,000 करोड़ का पारिस्थितिक नुकसान हुआ। रिपोर्ट के अनुसार, पारिस्थितिक बहाली और कार्बन अनुशमन (Carbon Sequestration) के जरिए अनुमानित ₹18,234 करोड़ की कार्बन आय (Carbon Credit) की संभावना जताई गई थी, जिससे कुल ₹6,800 करोड़ की नेट पारिस्थितिकीय देनदारी सामने आई।

कार्बन अनुशमन की योजनाएं, लेकिन व्यावहारिकता पर सवाल

रिपोर्ट में 12 से 20 करोड़ पौधे लगाने और 500 से 750 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में वनीकरण करने की सिफारिश की गई थी। इसके लिए ₹2,000 करोड़ की लागत अगले 10 वर्षों में निर्धारित की गई थी। लेकिन विशेषज्ञों जैसे कि असम यूनिवर्सिटी, सिलचर के अरुण ज्योति नाथ ने सवाल उठाए कि इतनी बड़ी संख्या में पौधों की रोपाई के लिए जमीन और संसाधन कहां से आएंगे? क्या यह कार्य पूर्वोत्तर भारत में ही किया जाएगा? निगरानी तंत्र कैसा होगा?

पारिस्थितिकीय क्षति केवल पर्यावरण तक सीमित नहीं होती, यह स्थानीय समुदायों के जीवन, आजीविका, और भविष्य पर भी गहरा असर डालती है। अब यह ज़रूरी है कि ऐसे हादसों से सबक लिया जाए और दीर्घकालिक, सतत और न्यायसंगत नीतियों के ज़रिए आगे बढ़ा जाए।

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