'32 साल, 32 घंटे, ये फर्क है',अमित शाह से मिलते ही भूपेन बोरा का कांग्रेस पर वार, 8 मार्च तक असम में होगा खेला
Bhupen Borah Amit Shah: चुनावी राज्य असम की राजनीति में आज (21 फरवरी) एक बयान सबसे ज्यादा चर्चा में है- "32 साल बनाम 32 घंटे, फर्क साफ है।" यह बयान किसी आम कार्यकर्ता का नहीं, बल्कि लंबे समय तक कांग्रेस का चेहरा रहे भूपेन बोरा का है। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से मुलाकात के बाद बोरा ने कांग्रेस पर सीधा हमला बोला और संकेत दिया कि यह तो सिर्फ शुरुआत है, आगे और भी नेता बीजेपी का दामन थाम सकते हैं।
करीब तीन दशक तक कांग्रेस से जुड़े रहे भूपेन बोरा ने हाल ही में पार्टी से इस्तीफा दिया। वे 2021 से 2025 तक असम प्रदेश कांग्रेस समिति के अध्यक्ष भी रहे। ऐसे में उनका जाना कांग्रेस के लिए बड़ा झटका माना जा रहा है। 22 फरवरी को वे औपचारिक रूप से बीजेपी में शामिल होने जा रहे हैं।

अमित शाह से मुलाकात के बाद बोरा ने कहा कि 32 साल तक कांग्रेस में रहने के बावजूद उन्हें जो सम्मान नहीं मिला, वह बीजेपी में 32 घंटे के भीतर मिल गया। उन्होंने गृह मंत्री और असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्व सरमा का आभार जताते हुए कहा कि परिवर्तन साफ दिखाई दे रहा है। इस मुलाकात में बैजयंत पांडा भी मौजूद थे।
भूपेन बोरा ने एक्स पर लिखा,
''32 साल बनाम 32 घंटे, ये फर्क साफ दिख रहा है। कल की मीटिंग के लिए गृह मंत्री अमित शाह और एक दिन पहले मेरे घर आने के लिए मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा का धन्यवाद हूं। बदलाव साफ दिख रहा है।''
भूपेन बोरा बोले- '8 मार्च तक और आएंगे नेता'
NDTV चैनल से बातचीत में बोरा ने दावा किया कि 8 मार्च तक कई और कांग्रेस नेता बीजेपी में शामिल होंगे। उन्होंने कहा कि उन्होंने खुद अमित शाह को इस बारे में जानकारी दी है। बोरा ने अमित शाह की रणनीतिक सोच की तारीफ करते हुए कहा कि वे सिर्फ वर्तमान राजनीति नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों को ध्यान में रखकर फैसले लेते हैं।
उन्होंने कांग्रेस सांसद प्रियंका गांधी पर भी टिप्पणी की। बोरा का कहना था कि असम अभियानों के दौरान वे हमेशा उन्हें मुस्कुराते हुए देखते थे, लेकिन इस बार वे चिंतित नजर आईं। वहीं गौरव गोगोई पर उन्होंने आरोप लगाया कि पहले उन्हें पार्टी का मजबूत स्तंभ बताया गया और बाद में उन्हीं पर बेबुनियाद आरोप लगाए गए।
भूपेन बोरा की इस्तीफा का और कांग्रेस की चुनावी रणनीति
असम में चुनावी तैयारियों को धार देने के लिए कांग्रेस ने गौरव गोगोई को अहम जिम्मेदारी दी थी। प्रियंका गांधी, मधुसूदन मिस्त्री और डीके शिवकुमार जैसे नेताओं को भी मोर्चे पर लगाया गया था। इसके बावजूद भूपने बोरा का इस्तीफा कांग्रेस के अभियान की रफ्तार पर असर डालता दिख रहा है। राजनीतिक हलकों में चर्चा है कि बीजेपी ने यह 'ऑपरेशन' कैसे सफल कर लिया।
भूपेन बोरा की एंट्री को बीजेपी पूरी तरह भुनाने के मूड में है। मुख्यमंत्री हिमंता बिस्व सरमा ने मुलाकात के बाद कहा कि भूपेन बोरा कांग्रेस के आखिरी हिंदू नेता थे। यह बयान अपने आप में सियासी संदेश देता है। सरमा पहले भी कह चुके हैं कि जो नेता विकास, स्थिरता और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विजन में भरोसा रखते हैं, वे स्वेच्छा से बीजेपी में आ रहे हैं।
आगे क्या संकेत?
भूपेन बोरा का जाना सिर्फ एक नेता का पाला बदलना नहीं, बल्कि असम की राजनीति में शक्ति संतुलन के बदलने का संकेत माना जा रहा है। खासकर ऊपरी असम में बोरा का प्रभाव बीजेपी को चुनावी बढ़त दे सकता है।
अब निगाहें 22 फरवरी पर टिकी हैं, जब बोरा औपचारिक रूप से बीजेपी में शामिल होंगे। उनका दावा है कि यह सिलसिला यहीं नहीं रुकेगा। ऐसे में सवाल बड़ा है- क्या कांग्रेस असम में इस झटके से उबर पाएगी, या '32 साल बनाम 32 घंटे' वाली लाइन आने वाले चुनावों की नई राजनीतिक कहानी लिख देगी।












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