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नज़रिया: 'पद्मावत' क्यों पद्मावती के ख़िलाफ़ है?

By Bbc Hindi
नज़रिया: 'पद्मावत' क्यों पद्मावती के ख़िलाफ़ है?

फ़िल्म 'पद्मावत' देखकर सिनेमा हॉल से बाहर आई तो ऐसा लग रहा था कि ख़ुद आग से निकलकर आई हूँ.

दिल और दिमाग भभक रहा था. कुछ गुस्से से, कुछ उलझन से और कुछ हिंसक तस्वीरों के प्रहार से.

फ़िल्म के आख़िरी पंद्रह मिनट में जौहर के लिए रानी पद्मावती का सैकड़ों राजपूतानियों को प्रेरित करना.

आग की ओर बढ़तीं, लाल साड़ियां पहनें, सुनहरे गहनों से लदीं वो औरतें. उनमें से एक गर्भवती भी थी. और उनके पीछे भूखी, वहशी, गुस्सैल आंखों वाला अलाउद्दीन ख़िलजी.

काले कपड़ों और खुले केश के साथ दौड़ता, हांफता. किले की सीढ़ियों को पागल की तरह नापता. और आख़िर में जौहर का वो दृश्य.

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https://www.facebook.com/BBCnewsHindi/videos/1875491399149093/

इतिहास में दर्ज

अपने समाज और पति की आन-बान-शान को बचाने के लिए आग के आग़ोश में जाती रानी पद्मावती को देखना, बलात्कार जैसी यौन हिंसा को देखने से कम नहीं था.

इस हिंसा को फ़िल्म किसी भी तरीके से ग़लत या पुरानी विचारधारा का प्रतीक इत्यादि नहीं बताती, बल्कि इसे पूजनीय दिखाया गया है. ऐसा त्याग जो महान है.

जंग जीतने वाले से बचने के लिए, हारे हुए मर्दों की औरतें खुद को जलाने पर मजबूर हो जाती थीं और जौहर करती थीं, ये इतिहास में दर्ज ज़रूर है.

पर सती प्रथा की ही तरह ये उनकी स्वेच्छा से लिया हुआ फ़ैसला नहीं बल्कि एक सामाजिक दबाव का नतीजा था.

उसका महिमा मंडन, सती-प्रथा का गुणगान करने से कम नहीं.

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उसका कोई वजूद नहीं...

मैं हैरान हूँ कि फ़िल्म का विरोध इस बात पर नहीं हो रहा कि ये एक बार फिर 'इज़्ज़त' का बोझ औरत के सिर पर डालकर कहती है कि अपनी जान देकर इसे बचाओ.

इज़्ज़त की इस 'झूठी' परिभाषा के आगे औरत की जान की कोई कीमत नहीं है बल्कि जौहर कर अपनी जान देने के लिए भी रानी पद्मावती अपने पति से आज्ञा लेती हैं!

फ़िल्म में रानी के चित्रण पर बहस ज़रूर छिड़नी चाहिए पर मेरे कारण, करणी सेना की शिकायतों से बिल्कुल उलट हैं.

क्योंकि वो महज़ एक ख़ूबसूरत वस्तु की तरह दिखाई गई है, जिसे एक राजा हासिल कर उसकी रक्षा करना चाहता है, वहीं दूसरा हथिया कर अपना बनाना चाहता है.

शादी के बाद उसका कोई वजूद नहीं है और उसकी ज़िंदगी की धुरी सिर्फ़ पति और जातीय आन के इर्द-गिर्द घूमती है.

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राजपूत आन सुरक्षित है...

एक ऐतिहासिक काव्य पर बनी इस फ़िल्म में रूढ़िवादिता कूट-कूट कर भरी है. औरत जंग की वजह भी है, उसका तोहफ़ा भी और उसकी कीमत भी.

रानी का रूप ही उसका वजूद है. बहस वही पुरानी कि औरत को इतने छोटे चश्मे से ना देखा जाए. करणी सेना के समर्थक बेकार ही डर रहे थे. राजपूत आन सुरक्षित है.

'पद्मावत' फ़िल्म में ना हिंदू रानी और मुस्लिम राजा के बीच प्रेम प्रसंग है, ना ख़्वाब के ज़रिए दिखाए कोई अंतरंग दृश्य.

ना रानी पद्मावती अलाउद्दीन ख़िलजी या किसी अनजान आदमी के सामने नाचती हैं ना ऐसी पोशाक पहनती हैं जिससे उनके शरीर के अंग ज़्यादा दिखें.

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औरत की इज़्ज़त

दरअसल, डर या गुस्से की वजहों की परिभाषा में ही गड़बड़ है. ये भी उसी ख़ूबसूरती के आइने के आगे ना देख पाने की वजह से है.

ढँके तन, घूंघट और चारदीवारी में रह रही रानी के किरदार ने मेरे अंदर सिर्फ़ घुटन पैदा की. फ़िल्म हर तरह की बननी चाहिए और उन पर बहस की गुंजाइश भी रहनी चाहिए.

पर कितना अच्छा हो गर औरत के नाम पर बनी फ़िल्में सचमुच औरत की इज़्ज़त और दर्जे का सही मतलब पर्दे पर उतार सकें.

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English summary
Approach Why Padmavat is against Padmavati

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