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Anchor Boycott: 14 न्यूज एंकरों के कौन से कार्यक्रमों से परेशान हुआ I.N.D.I.A.?

विपक्षी दलों के इंडिया ब्लॉक ने गुरुवार को एक बहुत ही चौंकाने वाला फैसला लिया है। इसने एक ही झटके में टीवी न्यूज चैनलों पर विभिन्न तरह के शो करने वाले 14 एंकरों का बहिष्कार करने का ऐलान किया है।

इंडिया ब्लॉक में शामिल दलों ने ऐलान घोषणा की है कि वे अपने प्रवक्ताओं को लिस्ट में शामिल 14 न्यूज एंकरों के कार्यक्रमों में पक्ष रखने के लिए नहीं भेजेंगे। पहले तो यह जानना जरूरी है कि ये एंकर किस चैनल पर कौन सा प्रोग्राम करते हैं, जो इंडिया ग्रुप के नेताओं को परेशान करता है।

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    14 एंकर और उनके 'लोकप्रिय' टीवी शो
    इंडिया ब्लॉक से बहिष्कार किए जाने वाले 14 एंकरों में पहला नाम भारत एक्सप्रेस में काम करने वाली अदिति त्यागी का है। यह इस टीवी पर 'साहस' नाम का शो करती हैं। दूसरा नाम अमन चोपड़ा का है, जो न्यूज18 से जुड़े हैं और उनके लोकप्रिय कार्यक्रम का नाम है- 'देश नहीं झुकने देंगे'।

    तीसरा नाम अमिश देवगन का है और वे भी न्यूज18 ही जुड़े हैं। इंडिया ब्लॉक को इनका 'आरपार' कार्यक्रम पसंद नहीं आ रहा है। चौथे एंकर आनंद नरसिम्हन भी न्यूज18 से जुड़े हैं, जो 'दी राइट स्टैंड' के नाम से कार्यक्रम करते हैं। पांचवां नाम रिपब्लिक टीवी नेटवर्क के चीफ और जाने-माने पत्रकार अर्णब गोस्वामी का है। उनके तो हर कार्यक्रम से ही विपक्षी गठबंधन को परहेज है।

    छठे नंबर हैं डीडी न्यूज के एंकर अशोक श्रीवास्तव। इंडिया गुट के नेता अब उनके कार्यक्रम में शामिल नहीं होंगे, जो दूरदर्शन पर 'दो टूक' के नाम से शो करते हैं। सातवें स्थान पर हैं आजतक की एंकर चित्रा त्रिपाठी, जो 'दंगल' नाम से डिबेट शो करती हैं। आठवें नंबर हैं गौरव सावंत जो इंडिया टुडे पर '6 पीएम प्राइम' नाम से शो करते हैं।

    9वें नंबर पर हैं नविका कुमार, जो टाइम्सनाउ नेटवर्क की वरिष्ठ पत्रकार हैं। उनका शो 'न्यूजऑवर' के नाम से लोकप्रिय है। 10वें पर हैं इंडिया टीवी की प्राची पाराशर जो 'मुकाबला लाइव' के नाम से शो करती हैं। 11वें पर हैं रुबिका लियाकत जो भारत24 पर कई शो करती हैं और शायद उनके 'दहाड़' कार्यक्रम को लेकर विपक्ष को ज्यादा आपत्ति हो रही है।

    12वें नंबर पर हैं इंडिया टुडे के पत्रकार शिव अरूर जो '5 लाइव विद अरूर' के नाम से शो करते हैं। 13वें स्थान पर हैं आजतक के सुधीर चौधरी जिनका 'ब्लैक एंड व्हाइट' प्रोग्राम विपक्षी गठबंधन को बिलकुल ही पसंद नहीं आ रहा है और आखिरी 14वें नंबर पर हैं, टाइम्सनउ नवभारत के सुशांत सिन्हा जिनके 'पाठशाला' कार्यक्रम को इंडिया ग्रुप बहिष्कार करेगा। हालांकि, वे कहते हैं कि यह कोई डिबेट शो है ही नहीं, फिर विपक्षी गठबंधन ने क्या सोच के ऐसा किया है?

    'लोकप्रिय' कार्यक्रमों के बायकॉट से विपक्ष को फायदा मिलेगा?
    मीडिया को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहा जाता है। टीवी पर होने वाले कार्यक्रम जनता तक अपनी बात पहुंचाने का विपक्ष के पास बहुत बड़ा माध्यम है। ऐसे में विपक्षी दलों के गठबंधन ने अगर 14 एंकरों को बायकॉट करने का फैसला किया है, तो इसमें नुकसान किसका है? अगर वे कार्यक्रम लोकप्रिय हैं, तो इनके जरिए विपक्ष जनता तक अपनी बातें ही तो पहुंचा रहा था।

    विपक्ष ऐसा करके किसका नुकसान करना चाहता है?
    अब जब वे उन कार्यक्रमों में होंगे ही नहीं तो जनता तो एकतरफा सत्तापक्ष के लोगों की बातें ही सुनेगी। विपक्षी दलों को अगर लगता है कि कोई एंकर उनकी बातों को दबा रहा है तो उन्हें तो खुला मंच मिलता है, उनकी बातों को काटने के लिए। अब जब वे उसमें भाग ही नहीं लेगें तो नुकसान किसका करेंगे?

    इंडिया ब्लॉक अपने पहले वाले एजेंडे में नाकाम रहा?
    आज सोशल मीडिया काफी मजबूत है। जनता को बरगलाना इतना आसान नहीं है। क्योंकि, जिन एंकरों के बहिष्कार की घोषणा की गई है, उन्हें विपक्षी दलों की ओर से पिछले कुछ वर्षों से 'गोदी मीडिया' या 'गोदी पत्रकार' कहकर तंज कसा जाता रहा है। अब अगर उनका बायकॉट कर रहे हैं तो इसका मतलब है कि इंडिया ब्लॉक के लोग अपने पहले वाले एजेंडे में नाकाम हो चुके हैं।

    पत्रकारों को सवाल पूछने से रोकने की कोशिश नहीं है?
    सवाल ये है कि क्या ये पत्रकारों को सवाल पूछने से रोकने की कोशिश नहीं है? क्या जब विपक्षी दलों की सरकारें थीं तो पत्रकारों पर पक्षपात के आरोप नहीं लगते थे? क्या ये तथ्य नहीं है कि बड़े-बड़े चैनलों के पत्रकार रातों-रात एजेंडा चलाने के बाद नेता बन गए? टिकट लेकर चुनाव नहीं लड़ा? चुनाव में जमानतें जब्त कराने के बाद बड़ी पार्टियों के प्रवक्ता नहीं बनाए गए? सक्रिय पत्रकारिता से सीधे प्रधानमंत्री के मीडिया सलाहकार नहीं बने? फिर विपक्ष क्या साबित करना चाहता है?

    मीडिया को बांटने की साजिश ?
    क्या ये सही नहीं है कि एक जमाने में मीडिया पर खास दलों या गठबंधनों का एजेंडा चलाने वाले कुछ पत्रकार आज यूट्यूबर बनकर कुछ दलों के आधिकारिक प्रवक्ताओं से भी आगे निकलने की होड़ में नहीं लगे हुए हैं? अब ऐसी ही यूट्यूबर पत्रकार एंकरों के बायकॉट पर विपक्षी दलों की डफली नहीं बजाने लगे हैं? तो क्या यह मीडिया को बांटने की साजिश नहीं है?

    आपातकाल का भय दिखाने की कोशिश नहीं है?

    अगले साल लोकसभा चुनाव होने वाले हैं। उससे पहले विपक्षी दलों की ओर से जो कदम उठाया गया है, क्या वह परोक्ष रूप से 'दबाव बनाने की कोशिश' नहीं है? क्या यह इंडिया ब्लॉक की एक तरह से 'मीडिया सेंसरशिप' नहीं है? भविष्य में यदि सत्ता परिवर्तन होता है तो क्या यह उससे पहले मीडिया को 'आपातकाल का भय' दिखाने की कोशिश की तरह नहीं है?

    100 बात की एक बात ये है कि विपक्षी दलों ने जो कदम उठाया है, वह एक तरह से मीडिया पर 'हमले' की तरह है। अगर सरकार देश-विरोधी गतिविधियों में लगे मीडिया से जुड़े लोगों से सवाल भी पूछे तो यही विपक्ष हाय-तौबा मचाने लगता है, लेकिन आज खुलेआम मीडिया पर 'दबाव' बनाने की कोशिशों में जुटा हुआ लगता है।

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