Amitabh Bachchan Birthday Special: जानिए अमिताभ बच्‍चन सदी के महानायक क्यों कहलाए

बेंगलुरु। अपनी दमदार आवाज और अभिनय के दम पर दर्शकों को अपना दीवाना बनाने और हिन्दी फिल्म इंडस्ट्री के 'शहंशाह' कहे जाने वाले अमिताभ बच्चन का 11 अक्टूबर को 77वां जन्‍मदिन हैं। सदी के महानायक अमिताभ का जन्‍म 1942 को हुआ था। तमाम सुख-सुविधाओं के बीच रहते हुए भी एक अनुशासित जीवन कैसे जिया जाता है, कई दशकों से अमित जी इसके जीते-जागते साक्ष्य बन हमारे जीवन को प्रेरणा देते रहे हैं। कार्य के प्रति उनकी मेहनत, लगन, निष्ठा और अनुशासन देख अच्छे-अच्छे भी उनके सामने पानी भरते नज़र आते हैं।

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पिछले दिनों भारतीय फिल्म उद्योग के पितामह दादा साहब फाल्के के जन्म शताब्दी वर्ष पर सदी के महानायक अमिताभ बच्‍चन को दादा साहब फाल्के अवार्ड से सम्मानित किया जाना उनको और विशिष्ट बनाता है। अभिनेता के तौर पर अमिताभ ने भी अपना फिल्मी सफर 1969 में ही 'सात हिन्दुस्तानी' से शुरू किया था। अपने जीवन के पिछले पचास वर्षों से वे बॉलीवुड में सक्रिय हैं। यह 'दादा साहब फाल्के पुरस्कार' और अभिनेता के रूप में अमिताभ दोनों का ही गोल्डन जुबली वर्ष रहा।

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आज देश विदेश में बसे करोड़ों प्रशंसक भी अपने इस 77 वर्षीय 'युवा' अभिनेता की कार्य क्षमता और जीवटता की सराहना करते नहीं अघाते। ऐसे में कई नाम हैं जिन्हें बॉलीवुड में आजीवन, अतुलनीय योगदान के लिए दिये जाने वाले 'दादा साहब फाल्के पुरस्कार' के लिए योग्य माना गया होगा और संभव है कि अब तक हर चयन पर आपत्ति उठायी जाती रही लेकिन अमिताभ को यह सम्मान मिलने पर सभी ने प्रसन्‍नता जाहिर की। समझना होगा कि अमिताभ मात्र एक कलाकार ही नहीं बल्कि 'युग' हैं, एक ऐसा युग जिसने युवाओं की सोच बदल दी। एक ऐसा 'एंग्री यंग मैन' जिसके बिना बॉलीवुड अशक्त कहलाएगा। 1913 में 'राजा हरिश्चंद्र' से अब तक का भारतीय सिनेमा के काल में अमिताभ सदी के महानायक क्यों है?

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यह भी जानना जरुरी है कि इतने दशकों से सभी के दिलों पर कोई यूं ही राज नहीं कर लेता। इस क़ाबिल बनने के लिए वर्षों की अपार मेहनत और संघर्ष से गुजरना होता है। अमिताभ भी सारी मुश्किलों को झेलते हुए अपने बुरे समय से जूझकर आगे बढ़ते रहे हैं। इस उम्र में भी कौन बनेगा करोड़पति के अब तक के सभी सीजन की लगातार सफलता सारी कहानी स्वयं ही कह देती है। कौन बनेगा करोड़पति के माध्यम से हिन्दी को घर-घर पहुंचाने का श्रेय भी आपको ही जाता है। अमिताभ बच्‍चन की सक्रियता आज के नौजवानों को सतत प्रेरणा देती है। अमिताभ सदी के महानायक हैं और उन्हें किसी भी परिवार की तीनों पीढ़ियां पसंद करती हैं।

फिल्मों में अश्‍लीलता की झलक नहीं

फिल्मों में अश्‍लीलता की झलक नहीं

अमिताभ एक ऐसे कलाकार हैं जिनकी फिल्मों के दृश्यों और संवादों में अश्लीलता की झलक तक नहीं मिलती! इनकी फिल्में कभी भी, कहीं भी सपरिवार देखी जा सकती हैं। आजकल की तरह इनकी फिल्मों में प्रेम के नाम पर, कभी देह नहीं परोसी गई। अभिमान समेत अन्‍य सैकड़ो फिल्‍में आज भी लोगों के दिलों पर राज कर रही हैं। अमिताभ की रोमांटिक फिल्‍में सभी पीढ़ी पसंद करती आयी हैं।

बच्‍चन की फिल्मों ने अव्‍यवस्‍थाओं के खिलाफत लड़ना सिखाया

बच्‍चन की फिल्मों ने अव्‍यवस्‍थाओं के खिलाफत लड़ना सिखाया

भारतीय संस्कृति में मां का दर्जा सदैव ऊपर रहा है लेकिन अमिताभ की फिल्म 'दीवार' के एक डायलॉग 'मेरे पास मां है' (शशि कपूर द्वारा बोला गया) को आज भी मंत्र की तरह बोला जाता है! इनकी लगभग सभी फिल्मों में 'मां' की महत्ता बताई गई है। 'जंजीर' ने हिन्दी फिल्मों में वर्षों से चली आ रही प्रेम की सत्ता को तोड़ एक ऐसे युवा की छवि पेश की, जो व्यवस्था से लड़ने के लिए खड़ा होता है। उसके बाद इनकी ऐसी कई फिल्में आईं जिन्होंने देश के युवाओं को सच्चाई और ईमानदारी के साथ खड़े होकर समाज में चल रही अव्यवस्थाओं के विरुद्ध लड़ने के लिए प्रेरित किया।

रोमांटिक फिल्मों में अमिताभ

रोमांटिक फिल्मों में अमिताभ

अमिताभ रोमांटिक फिल्मों के दौर में परिवर्तन तो लाये लेकिन जब-जब प्रेमी बनकर रुपहले पर्दे पर उतरे तो दर्शकों के दिलों में जैसे सदा के लिए बस गए। सिलसिला, कभी-कभी, त्रिशूल में उनके धीर-गंभीर प्रेमी रूप को खूब सराहना मिली। रोमांस और एक्शन में अपने को स्थापित करने के साथ-साथ कॉमेडी में भी इन्होंने बड़े-बड़े कॉमेडियन को पीछे छोड़ दिया. ये ऐसे नायक के रूप में अवतरित हुए जो हर क्षेत्र में पारंगत था। 'कुली' की शूटिंग के दौरान हुए हादसे में मौत के मुंह से वापिस आये अमिताभ ने स्वास्थ्य सम्बन्धी कई कठिनाइयां झेलीं और अब भी उनसे जूझ रहे हैं लेकिन इससे उनके कार्य के प्रति समर्पण और लगन में रत्ती भर भी कमी नहीं आई और उन्होंने यह सिद्ध कर दिया कि वे सिर्फ फिल्मों के ही 'विजय' नहीं बल्कि असल जीवन से भी जूझना जानते हैं।

जीवन में कभी नहीं मानी हार

जीवन में कभी नहीं मानी हार

एक समय ऐसा भी आया जब उन्हें आर्थिक रूप से परेशानियों का सामना करना पड़ा। इस कष्टकारी दौर में भी उन्होंने संघर्ष जारी रखा और टीवी की ओर उन्मुख हुए। यह उनकी परिस्थितियों के अनुसार स्वयं को ढाल लेने की क्षमता बताता है। इसने युवाओं को विफलताओं के आगे घुटने न टेकने की सीख भी दी। उस समय कलाकार टीवी से फिल्मों में जाया करते थे और अमिताभ के इस निर्णय की चौतरफा आलोचना हुई। आने वाले समय ने उन सभी आलोचनाओं के मुंह बंद कर दिए और आज हर बड़ा हीरो/हीरोइन टीवी पर छाने को बेताब है। अमिताभ का यह कदम तथाकथित 'इडियट बॉक्स' के लिए भी सहायक सिद्ध हुआ। अमिताभ बच्‍चन भारतवर्ष के उन चुनिंदा लोगों में से हैं जिन्हें सुनकर भी हिंदी सीखी जा सकती है। भाषा की सभ्यता और बोलने का सलीका क्या होता है।

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