अमित शाह कर्नाटक की जिस पहेली को अब तक नहीं सुलझा पाए

दक्षिण भारत में कर्नाटक एकमात्र राज्य है, जहाँ बीजेपी सत्ता में है और यहां उसकी मज़बूत मौजूदगी है. लेकिन इस बार की लड़ाई कई सामाजिक समीकरणों में उलझती दिख रही है.


  • लिंगायत कर्नाटक की आबादी के 16 से 17 प्रतिशत हैं
  • वोक्कालिगा की तादाद लगभग 12-14 प्रतिशत है
  • ओबीसी, एससी, एसटी और अल्पसंख्यकों की आबादी लगभग 60 प्रतिशत है
  • लिंगायत उत्तर और मध्य कर्नाटक का प्रमुख समुदाय है
  • तटीय कर्नाटक में बड़े पैमाने पर ओबीसी और अनुसूचित जाति की आबादी है
  • लिंगायतों के सबसे बड़े नेता बीएस येदियुरप्पा माने जाते हैं
  • वर्तमान मुख्यमंत्री बोम्मई भी लिंगायत हैं
  • वोक्कालिगाओं के सबसे बड़े नेता पूर्व प्रधानमंत्री एचडी देवेगौड़ा माने जाते हैं
  • ओबीसी के सबसे बड़े नेता पूर्व सीएम सिद्धारमैया माने जाते हैं.
  • दलितों के सबसे बड़े नेता कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे माने जाते हैं

यह अजीब लग सकता है, लेकिन कर्नाटक की सत्तारूढ़ पार्टी पिछले पाँच साल में दूसरी बार आरक्षण सिंड्रोम से पीड़ित हुई है.

पाँच साल पहले यही हाल कांग्रेस का था. उस समय उसे लिंगायत समुदाय को अल्पसंख्यक धर्म का दर्जा देने के प्रस्ताव के लिए विरोध का सामना करना पड़ा था.

विधानसभा चुनाव के कुछ ही हफ़्ते पहले बीजेपी ओबीसी की आरक्षण नीति में बदलाव की सिफ़ारिश करने के साथ अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के कोटे के भीतर कई जातियों के लिए आरक्षण प्रतिशत में बदलाव करने के अपने फ़ैसले से परेशान है.

शुरू में, कांग्रेस और जनता दल सेक्युलर (जेडीएस) ने आरक्षण कोटे से छेड़छाड़ के लिए बीजेपी पर हमले किए तो पार्टी बचाव की मुद्रा में आ गई. आरोप लगा कि 'एक समुदाय को दूसरे समुदाय के ख़िलाफ़ खड़ा किया जा रहा है.

केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने पिछड़े वर्गों की सूची से मुसलमानों को चार प्रतिशत का कोटा हटाने के लिए जब मुख्यमंत्री बासवराज बोम्मई की जमकर तारीफ़ की, तब उन्हें हिम्मत मिली.

पिछले लगभग एक साल में ऐसा पहली बार हुआ, जब शाह ने बोम्मई की पीठ थपथपाई. यह अन्य समुदायों के लिए भी एक अहम संदेश था.

मुसलमानों के चार प्रतिशत कोटा को वोक्कालिगा और लिंगायत समुदायों के बीच बराबर बराबर दो प्रतिशत में बांट दिया गया. हालांकि यह क़दम धार्मिक नेताओं को पसंद नहीं आया क्योंकि इन दोनों समुदायों की मांग दो प्रतिशत से कहीं अधिक की थी.

ऐसे में अमित शाह की तारीफ़ के बाद भी यह विवाद ख़त्म नहीं हुआ बल्कि यह और बड़ा हो गया है. इसका कारण मु​सलमानों का कोटा ख़त्म करना नहीं बल्कि इसलिए है कि इन फ़ैसलों से बीजेपी को वोट देने वाले अन्य वर्ग भ्रमित हो गए हैं.

बीजेपी के एक नेता ने नाम न छापने की शर्त पर बीबीसी हिंदी को बताया, ''हमें नहीं पता कि हम अपने लोगों को ठोस शब्दों में कैसे समझाएं कि जो किया गया है, उससे उन्हें लाभ होगा.''

मूल मुद्दे क्या हैं?

मूल रूप से दो मुद्दे हैं. पहला, अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति से संबंधित है और दूसरा मुद्दा, लिंगायत समुदाय के सबसे बड़े संप्रदाय पंचमसाली लिंगायतों से जुड़ी है.

सबसे पहला मुद्दा यह कि सरकार ने एससी के लिए आरक्षण प्रतिशत को 15 से बढ़ाकर 17 और एसटी के लिए तीन से बढ़ाकर सात प्रतिशत करने का फ़ैसला किया. लेकिन ऐसा करने से 50 प्रतिशत आरक्षण की सीमा पार हो गई. अब राज्य में कुल आरक्षण 56 प्रतिशत हो गया.

चूंकि एससी और एसटी के लिए तय सीमा का उल्लंघन किया गया, इसलिए अन्य जातियों ने ओबीसी श्रेणी के तहत अतिरिक्त कोटे की मांग करनी शुरू कर दी.

अब विचार हो रहा है कि राज्य सरकार केंद्र से कहे कि आरक्षण सीमा में किए गए संशोधन को संविधान की नौवीं सूची में डाल दिया जाए. ऐसा करने से यह मामला सुप्रीम कोर्ट के 'ज्यूडिशियल रिव्यू' से बाहर हो जाएगा.

दूसरा मामला यह है कि लिंगायतों में सबसे बड़ा संप्रदाय 'पंचमसाली लिंगायत' नाराज़ है.

उनकी नाराज़गी का कारण है कि ओबीसी की '2ए' श्रेणी के तहत जिन 101 जातियों को शामिल किया गया, उनमें इस संप्रदाय को भी शामिल करने की मांग नहीं मानी गई.

सरकार पंचमसालियों की उपेक्षा नहीं कर सकती क्योंकि उनका फैलाव पूरे राज्य में है. राज्य की 224 विधानसभा सीटों में से लगभग 75 में यह संप्रदाय अच्छी तादाद में है.

बीजेपी की परेशानी का कारण दक्षिणी कर्नाटक के बड़े समुदाय वोक्कालिगा भी हैं.

वोक्कालिगा अपने आरक्षण को तिगुना यानी चार से बढ़ाकर 12 प्रतिशत करने की मांग करते रहे हैं. बीजेपी दक्षिण कर्नाटक में अपने पैर पसारने की कोशिशों में जुटी है. इसलिए इनकी मांग को नज़रअंदाज़ करना संभव नहीं.

सरकार ने जनवरी में वोक्कालिगा को श्रेणी '3ए' से हटाकर नई बनी श्रेणी '2सी' में स्थानांतरित कर दिया. वहीं लिंगायत जैसे समुदाय को श्रेणी '3बी' से हटाकर '2डी में स्थानांतरित कर दिया.

इन दोनों समुदायों का कोटा वही रहा यानी वोक्कालिगा को चार फ़ीसदी और लिंगायत को पांच फ़ीसदी.

इस निर्णय ने पंचमसाली लिंगायतों के आंदोलन को और तेज़ कर दिया. इस मसले से निपटने के लिए सरकार ने एक और निर्णय लिया.

सरकार ने क्या फ़ैसला लिया?

27 मार्च को सरकार के एक आदेश में कहा गया कि श्रेणी एक में छोटे समुदायों के लिए चार प्रतिशत का आरक्षण जारी रहेगा. वहीं श्रेणी 2ए में लगभग 101 पिछड़े वर्ग के समुदायों के लिए 15 प्रतिशत का आरक्षण होगा.

श्रेणी 2सी में वोक्कालिगा का कोटा चार से बढ़ाकर छह प्रतिशत कर दिया गया जबकि श्रेणी 2डी में लिंगायत का कोटा पांच से बढ़ाकर सात प्रतिशत कर दिया गया. इसमें वीरशैव लिंगायत, पंचमसाली लिंगायत आदि शामिल थे.

वहीं इस बात का कोई स्पष्टीकरण नहीं दिया गया है कि श्रेणी 2बी को शून्य प्रतिशत के साथ G.O. में क्यों रखा गया है जबकि मुसलमानों को इस श्रेणी से हटा दिया गया है.

वोक्कालिगा और लिंगायत के लिए दो-दो प्रतिशत कोटे की वृद्धि मुस्लिम कोटा को आर्थिक रूप से कमज़ोर वर्गों (ईडब्ल्यूएस) की श्रेणी में डालने से हुई है.

एसी और एसटी के मामले में सरकार ने कहा है कि एजे सदाशिव समिति की सिफ़ारिश अब प्रासंगिक नहीं, इसलिए कैबिनेट उप-समिति की सिफ़ारिश मंज़ूर करने का फ़ैसला किया जाता है.

मंत्रिमंडल ने 'आंतरिक आरक्षण' करार देते हुए एससी के वामपंथी संप्रदाय या मदिगा के लिए छह प्रतिशत आरक्षण को मंजूरी दी है. वहीं होलेया और तीन अन्य जातियों, जिन्हें दक्षिणपंथी संप्रदाय कहा जाता है, के लिए 5.5 प्रतिशत का आरक्षण देने का निर्णय लिया गया है.

बंजारे, भोविस, कोराचा और कोरामा के लिए 4.5 प्रतिशत आरक्षण देने का एलान किया गया है. वहीं कम आबादी वाली सभी जातियों, अछूतों और 89 जातियों की श्रेणी 4 के लिए एक प्रतिशत आरक्षण दिया गया है.

क़ानूनी जानकारों के अनुसार, इस आदेश में एक अहम बिंदु है.

इसके अनुसार, ''आंतरिक आरक्षण के साथ अनुसूचित जाति के समुदायों को निम्नलिखित समूहों में बांटने और भारत के संविधान में उपयुक्त बदलाव करने के लिए कर्नाटक के राज्यपाल की स्वीकृति से भारत सरकार से सिफ़ारिश की जाती है.''

इन फ़ैसलों से जुड़ी क़ानूनी अड़चनें?

राज्य के पिछड़ा वर्ग आयोग के पूर्व अध्यक्ष और पूर्व एडवोकेट जनरल प्रो रवि वर्मा कुमार ने बीबीसी हिंदी से बातचीत की.

उन्होंने बताया, ''सुप्रीम कोर्ट ने हाल में महाराष्ट्र में मराठों के आरक्षण को इस आधार पर रद्द कर दिया कि इस तरह के आरक्षण को उचित ठहराने के लिए कोई बुनियादी आंकड़े नहीं हैं. ध्यान रहे कि यह महाराष्ट्र द्वारा पारित एक क़ानून था, जो किसी सरकारी आदेश से कहीं ऊपर होता है.''

वो कहते हैं, ''चाहे किसी पिछड़े वर्ग (मुस्लिम) को हटाना हो या किसी पिछड़े वर्ग (पंचमाली लिंगायत) को जोड़ना. उसके लिए उस समुदाय की सामाजिक-आर्थिक और शैक्षणिक स्थिति से जुड़े आंकड़ों का होना जरूरी है. सुप्रीम कोर्ट ने जाटों के लिए आरक्षण ख़त्म करने की भी यही वजह बताई थी. यहां आंकड़े जुटाने के लिए कोई सर्वे नहीं हुआ है.''

उनके अनुसार, सरकार का कहना है कि उसका निर्णय पिछड़ा वर्ग आयोग की एक अंतरिम रिपोर्ट पर आधारित है.

वो कहते हैं, ''15 मार्च को आयोग के अध्यक्ष ने स्वयं कहा कि पंचमसाली लिंगायतों से जुड़े आंकड़े जुटाना अभी बाक़ी है. ऐसे में अंतरिम रिपोर्ट के आधार पर फ़ैसले लेने का तर्क क्यों दे रही है? राज्य सरकार के पास पिछड़े वर्ग को ईडब्ल्यूएस श्रेणी में ट्रांसफर करने की शक्ति कहां से मिली?''

प्रो कुमार इस वजह से ताज़ा फ़ैसले को 'आंखों में धूल झोंकने वाला' बताते हैं.

उन्होंने कहा, ''न तो वोक्कालिगा और न ही लिंगायत समुदाय ने मुसलमानों को मिल रहे आरक्षण के ख़िलाफ़ शिकायत की. यह प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन है.''

उन्होंने एससी समुदाय की जातियों के लिए दिए गए आंतरिक आरक्षण को एक 'नौटंकी' बताया.

वे कहते हैं, ''सरकारी आदेश में कहा गया है कि राज्यपाल अपने हस्ताक्षर वाला एक मेमोरेंडम केंद्र को भेजेंगे. कर्नाटक की कुछ अनुसूचित जातियों के बारे में संविधान में कोई प्रावधान नहीं है. यह एक अवैध आदेश है. असल में यह वोट हासिल करने की एक राजनीतिक चाल है.''

लिंगायत
GOPICHAND TANDLE
लिंगायत

वहीं पिछड़ा वर्ग आयोग के पूर्व सदस्य केएन लिंगप्पा कहते हैं, ''सरकार ने दावा किया है कि मुसलमानों को पिछड़े वर्गों की सूची से हटाने का निर्णय आंध्र प्रदेश उच्च न्यायालय के फ़ैसले पर आधारित है. उस फ़ैसले में कहा गया था कि धार्मिक अल्पसंख्यकों को पिछड़े वर्गों वाला आरक्षण नहीं मिल सकता... सच तो यह है कि हाईकोर्ट के आदेश को चुनौती मिलने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि आरक्षण जारी रहना चाहिए. मतलब, मामला अभी सुप्रीम कोर्ट में लंबित है.''

सरकार अनुसूचित जातियों को दिए आंतरिक आरक्षण को लेकर भी आलोचना के दायरे में आ गई है.

एक दलित कार्यकर्ता इंदुधारा होन्नापुरा बीबीसी हिंदी को बताती हैं, ''ऐसी सिफ़ारिश राज्य सरकार नहीं कर सकती. कोई न्यायिक समिति या विशेषज्ञों का पैनल ही केंद्र सरकार को अपनी सिफ़ारिशें भेज सकता है. इसके लिए सबसे पहले एक सामाजिक-आर्थिक अध्ययन कराने की आवश्यकता है. सरकार 2011 की जनगणना के आधार पर कोई फ़ैसला कैसे ले सकती है?''

अज़ीम प्रेमजी यूनिवर्सिटी में राजनीति विज्ञान के प्रोफेसर ए नारायण ने बीबीसी हिंदी को बताया, ''इसने किसी भी सामाजिक समूह को प्रसन्न करने से अधिक भ्रम पैदा किया है. पंचमसालियों की एक नई श्रेणी बनाने के अलावा कुछ भी नहीं दिया गया. यदि यह प्रयास सच्चा हो, तो यह पंचमसालियों के वोटों के बिखराव को रोक सकता है.''

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