अंधविश्वास में फंसे अखिलेश, 2017 तक नहीं जायेंगे नोएडा!

लखनऊ। क्या यूपी के नेताओं को कोई नुयूमी यानि की तांत्रिक बता गया है कि नोएडा जो भी जाएगा, चुनाव हार जाएगा। ये बातें महज अंधविश्वास के इतर कुछ भी नहीं। लेकिन यूपी में जो कोई भी मुख्यमंत्री बनता है उसके मन में हमेशा यह बैठ जाता है कि नोएडा का दौरा करने से कुर्सी छिन सकती है। या यूं कहें कि नोएडा का जिक्र होते ही सत्ताधारियों को कुर्सी छिनने के ख्वाब सताने लगते हैं। फिर चाहे वे मुलायम सिंह यादव हों या राजनाथ सिंह या फिर कोई और, सभी को नोएडा से डर लगता रहा है।

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खैर ऐसा क्यों है, यह जानने के लिये चलते हैं कुछ पार्टियों के दफ्तरों में। जानकारी के मुताबिक बीते दो दशकों से जिस भी मुख्यमंत्री ने यहां का दौरा किया है, उसे कुर्सी गंवानी पड़ी है। शायद इसी कारण दादरीकांड के बाद सूबे के मौजूदा मुखिया अखिलेश यादव ने इखलाक के परिवार से उनके घर (जो कि नोएडा के अंतर्गत आता है) में न मिलकर अपने लखनऊ आवास में ही मिलने का फैसला लिया।

दरअसल नोएडा को लेकर डर की शुरुआत 1988 से शुरू हुई और 1997 आते-आते जब कई मुख्यमंत्रियों के बाद मायावती की कुर्सी छिनी, तब यह डर अंधविश्वास में तब्दील हो गया। और इसी के चलते अखिलेश यादव भी कम से कम 2017 तक नोएडा नहीं जाने वाले। ऐसा क्यो और कैसे हुआ चलिये स्लाइडर में पढ़ते हैं-

कैसे गहराया नोएडा का अंधविश्वास

कैसे गहराया नोएडा का अंधविश्वास

नोएडा के प्रति यूपी के मुख्यमंत्रियों में अंधविश्वास कैसे गहराया, यह हम पढ़ेंगे शुरु की कुछ स्लाइडों में। हम पढ़ेंगे उन नेताओं के बारे में जिनकी कुर्सी नोएडा जाने के तुरंत बाद छिन गई।

वीर बहादुर सिंह

वीर बहादुर सिंह

पूर्व मुख्यमंत्री वीर बहादुर सिंह ने नोएडा का दौरा किया और कुछ ही दिन बाद उनके हाथों से सत्ता फिसल गई।

नारायण दत्त तिवारी

नारायण दत्त तिवारी

1989 में नारायण दत्त तिवारी के साथ भी कुछ इसी तरह हुआ। 1989 में वे नोएडा के विकास कार्यों का जायजा लेने गये थे, उसी के बाद उन्हें मुख्यमंत्री की कुर्सी खोनी पड़ी।

कल्याण सिंह

कल्याण सिंह

1999 में कल्याण सिंह ने वेस्टर्न यूपी में चुनावी सभाओं के दौरान नोएडा में भी जमकर चुनाव प्रचार किया और 12 नवंबर 1999 में मायावती ने उनकी कुर्सी छीन ली।

मायावती

मायावती

1997 में मायावती ने नोएडा का दौरा किया, जिसके बाद सत्ता ने उनकी ओर से कुछ वक्त के लिए मुंह मोड़ लिया। परिणाम स्वरूप लोगों के दिमाग में एक नया मिथक तैयार हो गया। बसपा की पिछली सरकार में मुखिया रहीं मायावती इस अंधविश्वास को मिटाने की कोशिश करने के लिए साल 2011 में फिर से नोएडा गईं लेकिन इस बार भी विधानसभा चुनाव में उन्हें हार का सामना करना पड़ा।

डर बना अंधविश्वास

डर बना अंधविश्वास

मायावती की हार के बाद सभी मुख्यमंत्रियों में यह अंधविश्वास गहरा गया कि नोएडा जाने से कुर्सी छिन जायेगी। यही कारण है कि मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठने वाले लोग नोएडा को पनौती समझने लगे।

दहशत-ए-नोएडा राजनाथ सिंह को भी

दहशत-ए-नोएडा राजनाथ सिंह को भी

2001 में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे राजनाथ सिंह को नोएडा के डीएनडी फ्लाईओवर का उद्घाटन करने के लिए जाना था। लेकिन उन्होंने इस प्रोग्राम से बचते हुए दिल्ली से फ्लाईओवर का उद्घाटन कर दिया।

तो मुलायम को भी लगता था डर

तो मुलायम को भी लगता था डर

दिसंबर 2006 में निठारी कांड का खुलासा हुआ ये तो आप सभी को याद होगा। दरअसल नोएडा की इस घटना ने पूरे देश के कान खड़े कर दिये थे। लेकिन तमाम दबावों के बावजूद भी तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह नोएडा नहीं गए थे।

अखिलेश के डर का सबूत

अखिलेश के डर का सबूत

नोएडा से जुड़ी 3500 करोड़ रूपये की परियोजनाओं का उद्घाटन एवं शिलान्यास हो या फिर यमुना एक्सप्रेस वे का उद्घाटन अखिलेश ने लखनऊ से ही किया। इन सबके इतर एडीबी यानि की एशियन डेवलपमेंट बैंक की अहम बैठक जिसका आयोजन नोएडा में हुआ था उसमें भी अखिलेश नहीं दिखे। इतनी बड़ी परियोजनाओं, बैठकों में मुख्यमंत्री के शामिल न होने की वजह क्या हो सकती है। जबकि सपा प्रवक्ता सीएम की व्यस्तता का हवाला देकर अंधविश्वास में फंसे होने की बात से पल्ला झाड़ने की कोशिश करते हैं।

हार के असली कारण तो ये हैं

हार के असली कारण तो ये हैं

दरअसल नोएडा हार की वजह नहीं बल्कि पत्थरों पर चुनवा दी गई जनता की उम्मीदों के कारण हार का सामना करना पड़ा। हार का सामना करना पड़ा लूट, हत्या, बलात्कार यानि की अपराध के बढ़ते ग्राफ के कारण।

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