AIIMS अधिकारी की 63 साल की बहन ने 4 लोगों को दिया जीवन'दान', 2 को मिली रोशनी, जानिए पूरा मामला
नई दिल्ली, 2 अक्टूबर: दिल्ली स्थित एम्स में तैनात एक आईएएस अधिकारी की बुजुर्ग बहन की वजह से ना सिर्फ चार-चार जिंदगियों को नया जीवनदान मिला है, बल्कि दो लोगों की आंखों की रोशनी लौटने का भी भरोसा कायम हुआ है। बुजुर्ग महिला हाल ही में झारखंड के जमशेदपुर में एक हादसे में गंभीर रूप से जख्मी हो गई थीं और डॉक्टरों की लाख कोशिशों के बावजूद उनकी जान नहीं बचाई जा सकी। लेकिन, मौत के बावजूद वो अपने अंगों से कई लोगों को नया जीवन देकर वह काम कर गईं, जिसके लिए वह पूरी उम्र संघर्ष करती आ रही थीं।

63 साल की बुजुर्ग महिला से मिली चार लोगों को नई जिंदगी
दिल्ली के अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) के एक अधिकारी की बुजुर्ग बहन के अंगों से चार लोगों को जीवनदान मिला है और दो लोगों को जिंदगी भर देखने का सपना पूरा हुआ है। इन सबको जिन 63 साल की बुजुर्ग महिला स्नेहलता चौधरी की वजह से नई जिंदगी मिली है, उन्हें कुछ दिन पहले ही ब्रेन डेड घोषित कर दिया गया था। वो आईएएस अधिकारी और एम्स प्रशासन के एडिश्नल डायरेक्टर रबींद्र अग्रवाल की बहन थीं। पिछले महीने मॉर्निंग वॉक के दौरान उनके सिर में गंभीर चोट लग गई थी और इलाज के बावजूद उन्हें जीवित नहीं बचाया जा सका।

30 सितंबर को ब्रेन डेड घोषित किया गया था
न्यूज एजेंसी पीटीआई को एम्स के एक सीनियर डॉक्टर ने बताया कि स्नेहलता चौधरी को शुरू में हेड इंजरी के बाद झारखंड के जमशेदपुर में ही ऑपरेशन किया गया था। लेकिन, बाद में उन्हें बेहतर इलाज के लिए एयरलिफ्ट करके दिल्ली के एम्स ट्रॉमा सेंटर में दाखिल किया गया था। चौधरी अपने स्वास्थ्य को लेकर बहुत ही सजग थीं और पिछले 25 साल नियमित मॉर्निंग वॉक करती थीं। डॉक्टर ने कहा कि 'काफी कोशिशों के बावजूद उनकी हालत में सुधार नहीं हुआ और 30 सितंबर को उन्हें ब्रेन डेड घोषित कर दिया गया।'

मृत महिला ने सारा जीवन अंगदान के लिए किया काम-एम्स डॉक्टर
एम्स के डॉक्टर के मुताबिक वो होम मेकर होने के साथ-साथ एक समाजसेवी भी थीं। उन्होंने कहा, 'वह नेत्र दान अभियान की बहुत बड़ी समर्थक थीं और पूरे जीवन में अंगदान को लेकर काम किया। वह कौन बनेगा करोड़पति के लिए भी क्वालिफाई कर चुकी थीं।' नेशनल ऑर्गेन एंड टिशू ट्रांसप्लांट ऑर्गेनाइजेशन ने जो प्रबंध किया है उसके मुताबिक स्नेहलता चौधरी का हृदय, एक किडनी और कॉर्निया एम्स के मरीजों को दान किया गया है, जबकि उनका लिवर आर्मी के आरआर हॉस्पिटल में इस्तेमाल में लाया जाएगा। जबकि उनकी दूसरी किडनी राम मनोहर लोहिया अस्पताल में एक मरीज को दी गई है।

एम्स ट्रॉमा सेंटर में अप्रैल के बाद से 12 बार अंगदान हुए
एम्स के डॉक्टर ने बताया कि उनके शरीर से अंग-प्रत्यारोपण के लिए जरूरी अंग निकालने की प्रक्रिया पोस्टमॉर्टम के दौरान ही पूरी की गई। आईएएस अधिकारी के परिवार वालों की ओर से अंगदान ऐसे समय में किया गया है, जब सरकार इसके लिए जागरूकता फैलाने की कोशश कर रही है। डॉक्टर ने कहा, 'दिल्ली के एम्स ट्रॉमा सेंटर में अप्रैल के बाद से 12 बार अंगदान हुए हैं, जो कि 1994 के बाद से सबसे ज्यादा है। ब्रेन डेथ सर्टिफिकेट और अंग प्राप्त करने की प्रक्रिया को लेकर ट्रॉमा सेंटर की टीम ने जब से बड़े बदलाव किए हैं, इसकी संख्या में महत्वपूर्ण बढ़ोतरी हुई है।'

हर साल 1.50 लाख लोग सड़क हादसों में तोड़ते हैं दम
एम्स ट्रॉमा सेंटर में अंग प्राप्त करने वाली सेवाओं की अगुवाई न्यूरोसर्जरी विभाग के प्रोफेसर डॉ दीपक गुप्ता कर रहे हैं। एक और डॉक्टर ने कहा कि भारत में सड़क दुर्घटनाओं में प्रति तीन मिनट में एक व्यक्ति की मौत होती है। इस तरह से हर साल 1.50 लाख लोग ऐसे हादसों में दम तोड़ देते हैं। जबकि, सिर्फ 700 अंगदान ही हो रहे हैं। इसलिए अंगदान को लेकर जागरूकता बहुत ज्यादा जरूरी है।(तस्वीरें- प्रतीकात्मक)












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