नागरिकता संशोधन कानून के बाद VHP ने उठाई Article 29-30 में बदलाव की मांग
नई दिल्ली- नागरिकता संशोधन कानून पास होने के बाद उसके खिलाफ देश के कई हिस्सों में हिंसक प्रदर्शन हो रहे हैं। इसी दौरान विश्व हिंदू परिषद ने आर्टिकल 29-30 में बदलाव की मांग की शुरुआत कर दी है। इस आर्टिकल के जरिए संवैधानिक तौर पर अल्पसंख्यक समुदायों को अपनी पसंद के शिक्षण संस्थान स्थापित करने और चलाने की इजाजत मिली हुई है। लेकिन, अब वीएचपी चाहती है कि संविधान के इन दोनों आर्टिकल्स में बदलाव कर बहुसंख्यक समुदाय को भी इसी तर्ज पर अपनी पसंद के शिक्षण संस्थान चलाने की इजाजत मिले। वीएचपी का कहना है कि बहुसंख्यकों के शिक्षण संस्थानों पर सरकारी दखल बहुत ज्यादा होता है, इसलिए उन्हें भी स्वायत्तता मिलनी चाहिए।

आर्टिकल- 29 और 30 में बदलाव की मांग
विश्व हिंदू परिषद अब अल्पसंख्यक संस्थानों की तरह ही बहुसंख्यक शिक्षण संस्थान चलाने के लिए भी संवैधानिक प्रावधान की मांग कर रही है। इसके लिए वीएचपी के लोगों ने 'सांसद संपर्क' अभियान के तहत दो पन्नों के दस्तावेज के साथ सभी दलों के सांसदों से मुलाकात की प्रक्रिया शुरू की है। वीएचपी की ओर से सांसदों से यह गुजारिश की जा रही है कि संविधान की धारा-29 और 30 के तहत जिस तरह से अल्पसंख्यक समुदायों को अपना पसंदीदा शिक्षण संस्थान स्थापित करने और उसके संचालन की आजादी है, उसका विस्तार करके अब वही आजादी हिंदुओं को भी दी जाए। वीएचपी से जुड़े पदाधिकारियों ने बताया है कि उसके 250 सदस्यों ने इस संबंध में पिछले दो हफ्तों में अलग-अलग राजनीतिक दलों के 400 सांसदों से मुलाकात की है।

'बहुसंख्यक संस्थान भी सरकारी दखल से मुक्ति चाहते हैं '
दरअसल, वीएचपी की दलील है कि बहुसंख्यक संस्थानों को ऐसे प्रावधान के अभाव में काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है। वीएचपी महासचिव मिलिंद परांदे ने ईटी से बातचीत में कहा है, 'आर्टिकल-30 के चलते देश के ज्यादातर हिस्सों में अल्पसंख्यक समुदायों को अपना संस्थान चलाने की पूरी स्वायत्तता मिली हुई है और उन्हें सरकारी दखलंदाजी नहीं झेलनी पड़ती। हम यही अधिकार दूसरों को भी दिलाना चाहते हैं।' उन्होंने कहा, 'हम समझते हैं कि यही कारण है कि लिंगायत समुदाय, आर्य समाजी और यहां तक कि रामकृष्ण मिशन भी इसी तरह के प्रावधानों की मांग कर रहे हैं, क्योंकि हिंदू संगठनों को हमेशा सरकारी दखल का शिकार बनाया जाता है।'

सभी दलों के सांसदों से मिले वीएचपी के लोग
वीएचपी के ही एक और नेता विनोद बंसल के मुताबिक पिछले संसद सत्र में वीएचपी के सदस्यों ने सभी राजनीकि दलों के सांसदों से इस संबंध में मुलाकात की है, जिसमें बीजेपी के अलावा पीडीपी, बीएसपी, कांग्रेस और नेशनल कांफ्रेंस के सांसद भी शामिल हैं। उनके मुताबिक, 'सांसदों की प्रतिक्रिया बहुत ही स्वागत योग्य रहा और हमनें उनसे कहा है कि पार्टी लाइन से ऊपर उठें और इसपर विचार करें। अगर ये प्रावधान अच्छे हैं तो इसमें दूसरों को भी क्यों नहीं शामिल किया जाना चाहिए? '

'संविधान को बदलना चाहती है वीएचपी'
कानून के कुछ जानकारों ने इस तरह की मांग की आलोचना की है। उनका कहना है कि अल्पसंख्यकों को यह अधिकार इसलिए मिला हुआ है ताकि वे ऐतिहासिक वजहों से विश्वास के साथ अपने शिक्षण संस्थान स्थापित कर सकें और उनका संचालन कर सकें। हैदराबाद के नलसार विधि विश्वविद्यालय के वाइस चांसलर फैजान मुस्तफा ने पिछले साल एक लेख में लिखा था कि अल्पसंख्यकों के अधिकारों को संविधान की मूल संरचना का हिस्सा माना जाता है। उनका कहना था कि कश्मीर, पंजाब और कुछ उत्तर-पूर्वी राज्यों में हिंदू भी ऐसे संस्थान चलाते हैं। वहीं सुप्रीम कोर्ट के वकील महमूद प्राचा का आरोप है कि वीएचपी की मुहिम का लक्ष्य 'संविधान को बदलना' है।
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