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West Bengal Congress: कुछ नहीं कहना चाहता, इससे कोई फर्क नही पड़ता, शुभंकर की नियुक्ति पर बोले अधीर रंजन चौधरी

West Bengal Congress: अधीर रंजन चौधरी ने शुभांकर सरकार को पश्चिम बंगाल प्रदेश कांग्रेस कमेटी का अध्यक्ष बनाने पर बड़े ही अनमने अंदाज़ में अपनी प्रतिक्रिया दी है। पत्रकारों के सवाल का जवाब देते हुए कहा कि मैं कुछ नहीं कहना चाहता। कोई भी अध्यक्ष बन सकता है। मुझे कोई आपत्ति नहीं है। पार्टी अध्यक्ष बदलने से कोई फर्क नही पड़ता। प्रदेश पार्टी अध्यक्ष चुनने का अधिकार पार्टी आलाकमान को है।

टीएमसी और ममता बनर्जी के खिलाफ बेहद मुखर रहने वाले अधीर रंजन चौधरी ने अपने एक्स खाते पर भी शुभांकर सरकार को बधाई नहीं दी है। इससे उनके भीतर का असंतोष साफ़ झलक रहा है। ज्ञात हो कि पश्चिम बंगाल में कांग्रेस पार्टी ने अधीर रंजन चौधरी की जगह शुभांकर सरकार को पश्चिम बंगाल प्रदेश कांग्रेस कमेटी का अध्यक्ष बनाने की घोषणा की है। यह बदलाव अधीर रंजन चौधरी के इस्तीफे के तुरंत बाद हुआ है, जो टीएमसी के नए चेहरे और पूर्व क्रिकेटर यूसुफ पठान द्वारा बहरामपुर निर्वाचन क्षेत्र से लोकसभा चुनावों में उनकी हार के बाद हुआ था।

दरअसल अधीर रंजन चौधरी ममता बनर्जी के पक्के विरोधी हैं। लोकसभा चुनावों के दौरान उन्हें इंडी गठबंधन में शामिल करने से नाराज थे, जब पार्टी अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने सार्वजनिक रूप से बयान दिया था कि कि अगर जरूरत पड़ी तो अधीर को बाहर रखा जाएगा, जिससे वो नाराज थे। तभी से अधीर रंजन चौधरी के पीसीसी चीफ पद छोड़ने के कयास लगाये जा रहे थे, क्योंकि वह केंद्रीय नेतृत्व के साथ सामंजस्य नहीं बैठा पा रहे थे।

बहरहाल टीएमसी के प्रति उनके रुख के बारे में पूछे जाने पर, पश्चिम बंगाल कांग्रेस के नवनियुक्त अध्यक्ष शुभंकर सरकार कहते हैं। जब कोई कांग्रेस कार्यकर्ता पार्टी का झंडा लेकर आगे बढ़ रहा है, तो वह झंडा ऊंचा रखने के लिए किसी का भी विरोध करेगा। जो भी आंख उठाएगा कांग्रेस के झंडे के खिलाफ, हम इसका विरोध करेंगे।

अधीर रंजन चौधरी का राजनीतिक सफर

अधीर रंजन चौधरी का राजनीतिक सफर उल्लेखनीय रहा है, जिसकी पहचान 1991 में राजीव गांधी के प्रभाव में राजनीति में उनके प्रवेश से होती है। 2 अप्रैल, 1956 को पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद जिले के बहरामपुर में जन्मे चौधरी की प्रारंभिक शिक्षा उनके गृहनगर में ही हुई। नबाग्राम विधानसभा सीट पर हार के साथ अपने राजनीतिक जीवन में शुरुआती झटके का सामना करने के बावजूद, उन्होंने 1996 में उसी सीट से जीत हासिल करते हुए मजबूत वापसी की।
इस जीत ने केंद्रीय राजनीति में उनके लंबे समय तक चलने वाले जुड़ाव की नींव रखी, जिसकी शुरुआत 1999 में बहरामपुर से उनकी पहली लोकसभा जीत से हुई। पिछले कुछ वर्षों में चौधरी पश्चिम बंगाल के राजनीतिक परिदृश्य में एक प्रमुख व्यक्ति रहे हैं, 2012 में राज्य कांग्रेस अध्यक्ष का पद संभाला और 2009 के लोकसभा चुनाव जीत के बाद रेल मंत्री के रूप में महत्वपूर्ण योगदान दिया।
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