AAP के दो पार्षदों पर पार्किंग संचालक से 10 लाख रुपए रिश्वत मांगने का आरोप, एक गिरफ्तार
आम आदमी पार्टी के दो पार्षदों पर सूरत में एक पार्किंग संचालक से 10 लाख रुपए रिश्वत मांगने का आरोप है। भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो (एसीबी) ने खुलासा किया है कि पार्षदों ने शिकायतकर्ता के साथ फोन पर बातचीत के दौरान पैसे के लिए 'दस्तावेज' जैसे कोड का इस्तेमाल किया। इस आरोप में एक पार्षद विपुल सुहागिया को गिरफ्तार कर लिया गया है, जबकि उसके साथी जितेंद्र कछाड़िया की तलाश जारी है।
एसीबी ने नगरपालिका वार्ड नंबर 17 के पार्षद सुहागिया और वार्ड नंबर 16 के पार्षद कछड़िया के खिलाफ एफआईआर दर्ज होने के बाद सुहागिया को गिरफ्तार किया। फोरेंसिक वॉयस स्पेक्ट्रोग्राफी टेस्ट समेत कई सबूतों के आधार पर उनपर केस बना है। एसीबी के पुलिस उपाधीक्षक जीवी पढेरिया ने बताया कि कछड़िया का पता लगाया जा रहा है।

सूरत नगर निगम ने एक टाउन प्लानिंग स्कीम के तहत एक मल्टी-लेवल पार्किंग सुविधा विकसित की थी और इसे संचालित करने के लिए शिकायतकर्ता से एक करार किया था। इस पार्किंग सुविधा के बगल में एक सब्जी बाजार के लिए जगह आवंटित की गई थी। दोनों पार्षदों ने साइट का दौरा किया और ठेकेदार पर सब्जी बाजार के लिए निर्धारित भूमि पर अतिक्रमण करने का आरोप लगाया।
कथित तौर पर पार्षदों ने ठेकेदार को धमकी दी कि अगर उसने उनकी मांगें पूरी नहीं की तो वे उसका करार रद्द कर देंगे और पुलिस में शिकायत दर्ज करा देंगे। उन्होंने ठेकेदार को कथित अवैध अतिक्रमण के बारे में माफीनामा लिखने के लिए मजबूर किया और शुरू में 11 लाख रुपए की रिश्वत मांगी। आखिरकार, फोन पर चर्चा करने के बाद वे 10 लाख रुपए पर सहमत हुए।
ठेकेदार ने इन बातचीतों को रिकॉर्ड किया और कॉल रिकॉर्डिंग वाली सीडी के साथ एसीबी से संपर्क किया। इस साक्ष्य के आधार पर, अधिकारियों की ओर से प्रारंभिक जांच शुरू की गई। बाद में आरोपी ने स्वीकार किया कि 'दस्तावेज' वास्तव में पैसे के लिए एक कोड शब्द था।
फोरेंसिक साइंस लेबोरेटरी (FSL) ने एक प्रमाण पत्र जारी किया जिसमें पुष्टि की गई कि शिकायतकर्ता की ओर से दी की गई सीडी के साथ कोई छेड़छाड़ नहीं की गई थी। इन रिकॉर्डिंग की सामग्री ने उन दावों की पुष्टि की कि पार्षदों ने रिश्वत की मांग की थी। FSL में किए गए वॉयस स्पेक्ट्रोग्राफी परीक्षण ने पुष्टि की कि दोनों पार्षदों ने अपने मोबाइल फोन पर ठेकेदार से बात की थी।
इन सभी सबूतों ने उनके खिलाफ शिकायत में अहम रोल निभाया, जिसके कारण भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के प्रावधानों के तहत एफआईआर दर्ज की गई। एसीबी ने कहा कि ये निष्कर्ष यह स्थापित करने में महत्वपूर्ण थे कि सुहागिया और कछाड़िया ने वास्तव में ठेकेदार से 10 लाख रुपये की मांग की थी।
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