इन 4 वजहों ने चीन को डोकलाम छोड़ने के लिए मजबूर कर दिया
नई दिल्ली। भारत और चीन के बीच पिछले 70 दिनों से हिमालय पर जमी बर्फ अब आखिरकार पिघल चुकी है। सोमवार को जब भारत के रक्षा मंत्रालय ने बयान जारी कर कहा कि दोनों पक्षों ने आपसी सहमती से डोकलाम विवाद को खत्म कर अपनी-अपनी सेनाओं वापस बुलाने का निर्णय लिया है तब भारत की चीन पर यह बहुत बड़ी कूटनीतिक जीत मानी गई। भारत की कूटनीतिक जीत इसलिए है क्योंकि सीमा पर पहली बार चीन को दबाव में देखा गया। हजार युद्ध की धमाकियों और व्यापारिक रिश्तें खराब करने की बात कहने के बाद भी भारत ने अपना रवैया नहीं बदला और आखिरकार डोकलाम में चीन को समझौते पर राजी होना पड़ा।

ब्रिक्स सम्मेलन में भारत का दबाव
चीन में 3 से 5 सितंबर के बीच ब्रिक्स सम्मेलन होने जा रहा है। इस बीच डोकलाम विवाद दोनों देशों के लिए सामरिक और कूटनीतिक समस्या खड़ी कर रहा था क्योंकि इस सम्मेलन में डोकलाम में चल रहे दोनों देशों के बीच विवाद को लेकर सौ प्रतिशत सवाल खड़ा होने वाला था। अटकलें यहां तक लगाई जा रही थी कि इस विवाद के चलते पीएम मोदी ब्रिक्स सम्मेलन छोड़ भी सकते हैं। वहीं, चीन को भी ब्रिक्स के अन्य देशों के दबाव का डर भी सता रहा था। चीन के शियामेन शहर में होने जा रहे ब्रिक्स शिखर सम्मेलन 2017 की थीम 'सुनहरे भविष्य के लिए मजबूत भागीदारी' है। लेकिन डोकलाम विवाद कहीं न कहीं चीन को शर्मिंदा ही करता।
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कूटनीतिक दबाव
भूटान के इस विवादित जमीन को भले ही चीन ने शुरू से ही अपना ऐतिहासिक हिस्सा बताया है लेकिन अंतरराष्ट्रीय समुदाय से उन्हें कभी समर्थन नहीं मिला। इस विवाद के दौरान यूएस और यूके ने लगातार चीन से कहा था कि बातचीत और द्विपक्षीय वार्ता से जल्द से जल्द इस मामले को सुलझाया जाए। जब चीन ने भारत को डोकलाम से अपनी सेना हटाने को कहा तब यूएस और यूके ने शी जिनपिंग को कई बार शांति से मामला निपटाने की बात कही। इसके अलावा डोकलाम विवाद पर जापान ने तो यहां तक कहा दिया था कि चीन अंतरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन कर रहा है।

भौगोलिक दबाव
डोकलाम विवाद में ऐसा लगा रहा था जैसे चीन इस बार अपने ही जाल में फंस चुका था। डोकलाम में चीन ना सिर्फ कूटनीतक रूप से बल्कि भौगोलिक रूप से दबाव महसूस कर रहा था। दरअसल, चीन की सेना डोकलाम में नीचे की तरफ खड़ी थी और भारतीय सेना इस क्षेत्र के बिल्कुल चोटी पर खड़ी थी। तिब्बत की चुंबी घाटी सिक्किम और भारत के सहयोगी भूटान के बीच एक सैंडविच के तरह है। जब चीन ने उस क्षेत्र पर अपना हाथ मारना चाहा तो वह कूटनीतिक और रणनीतिक रूप से भी फैल हो गया। डोकलाम के ऊपर की तरफ खड़ी इंडियन आर्मी से लड़ना चीन मुश्किल हो रहा था।

सत्ता संघर्ष का दबाव
चीन की कम्युनिस्ट पार्टी की इस साल नवंबर में 19वीं नेशनल कांग्रेस होने जा रही है। इसमें शी दूसरे पांच साल के कार्यकाल के लिए अगले पोलित ब्यूरो और सेंट्रल कमेटी के सदस्य चुने जायेंगे। खुद को सबसे मजबूत राष्ट्रपति साबित करने के लिए शी ने डोकलाम में अपनी पूरी ताकत लगा दी थी लेकिन इस बार मामला बैठा नहीं। दरअसल इन सबके बीच एक महत्वपूर्ण बात यह है कि शी अपनी पार्टी में बड़ा परिवर्तन करने जा रहे हैं। इस बार सिर्फ शी और उनके सहयोगी ले किक्यांग ही दो ऐसे चेहरे हैं जो नई पोलित ब्यूरो में दिखाई देंगे। सत्ता संघर्ष को देखते हुए चीन डोकलाम मुद्दे पर सावधान हो गया है। भारत के रवैये को देखते हुए डोकलाम पर शी जिनपिंग खुद नहीं चाहते कि मामला बढ़े और शर्मिंदगी महसूस करनी पड़ी.












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