Lok Sabha Election 2024: 'फिर आएगा मोदी', किन राज्यों में बीजेपी के लिए ये नारा बनेगा बड़ी चुनौती?
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी मंगलवार से दक्षिण भारत के दो दिनों के दौरे पर हैं। नए साल में 2 और 3 जनवरी को वे तमिलनाडु, केरल और लक्षद्वीप में हजारों करोड़ रुपए की योजनाएं शुरू करेंगे या जनता को समर्पित करेंगे। लोकसभा चुनावों से पहले पीएम मोदी के ये दौरे बहुत ही खास मायने रख रहे हैं।
पीएम मोदी अकेले तमिलनाडु में 20,000 करोड़ रुपए से अधिक के प्रोजेक्ट को या तो लॉन्च करेंगे या फिर राष्ट्र को समर्पित करने वाले हैं। वह राज्यों में अन्य कार्यक्रमों भी शामिल होंगे। लक्षद्वीप में भी वह 1,150 करोड़ रुपए से ज्यादा के प्रोजेक्ट शुरू करने वाले हैं। वह केरल की भी यात्रा पर निकले हैं।

- तमिलनाडु, लक्षद्वीप और केरल के दो दिवसीय दौरे पर पीएम मोदी।
- हजारों करोड़ रुपए के प्रोजेक्ट शुरू करेंगे या राष्ट्र को समर्पित करेंगे।
- दक्षिण भारतीय राज्य बीजेपी के 'मिशन 350' के लिए हैं बड़ी चुनौती।
- दक्षिण भारत में फिर से मजबूत हुई है कांग्रेस।
- बंगाल, बिहार और महाराष्ट्र भी 2024 के लिए अटका रहे हैं 'रोड़े'।
ब्रांड मोदी और 10 साल का कार्यकाल बीजेपी का मुख्य एजेंडा
दरअसल, बीजेपी पीएम मोदी के पिछले 10 वर्षों के कार्यकाल में मिली कामयाबियों को ही आने वाले लोकसभा चुनावों में अपने मुख्य एजेंडे के तौर पर पेश करने वाली है। इन वर्षों में पार्टी ने ब्रांड मोदी के दम पर उत्तर, पूर्वोत्तर और मध्य भारत में अपनी स्थिति काफी मजबूत कर ली है।
दक्षिण भारतीय राज्य बीजेपी के लिए बन गए हैं चुनौती
हाल में संपन्न हुए विधानसभा चुनावों में तीन हिंदी भाषी राज्यों में बीजेपी को मिली अप्रत्याशित सफलता ने इसकी ताकत को और सशक्त बनते देखा है। लेकिन, दक्षिण भारतीय राज्य इस साल भारतीय जनता पार्टी के लिए दुखती रग बनते दिखे हैं। क्योंकि, बीते पांच वर्षों में कांग्रेस अपने पुराने गढ़ में फिर से मजबूत होती नजर आई है।
2019 में भाजपा ने देखा था सबसे अच्छा प्रदर्शन
2019 के लोकसभा चुनाव में यानी मोदी सरकार के पहले कार्यकाल के बाद बीजेपी ने दक्षिण भारत में अबतक का अपना सबसे बेहतर प्रदर्शन देखा था। कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, पुडुचेरी, तमिलनाडु, केरल, तेलंगाना और आंध्र प्रदेश की कुल 130 सीटों में से पहली बार पार्टी 29 सीटें जीतने में सफल रही थी।
दक्षिण के दो राज्यों में कांग्रेस की हुआ जोरदार वापसी
इनमें से अकेले कर्नाटक (28 सीट) में वह 25 और तेलंगाना (17 सीट) में 4 सीटें जीती थी। लेकिन, इस साल मई में कर्नाटक में पार्टी के हाथ से सत्ता निकलकर कांग्रेस के हाथों में चली गई और तेलंगाना में क्षेत्रीय पार्टी बीआरएस को बेदखल कर उसने अपना किला फिर से मजबूत कर लिया है।
अगर लोकसभा चुनावों की नजर से देखें तो इस समय दक्षिण भारत में कांग्रेस बीजेपी की सबसे प्रमुख चैलेंजर बनकर उभरी है। बीजेपी के बारे में कहा जा रहा है कि वह 2024 के लोकसभा चुनावों में इस बार 2019 के 303 सीटों के मुकाबले 350 के मिशन पर काम कर रही है।
कर्नाटक और तेलंगाना में बेहतर प्रदर्शन की जरूरत
लेकिन, यह तभी संभव है, जब कर्नाटक में उसका प्रदर्शन बरकरार रहे और तेलंगाना में वह अपनी सीटें और बढ़ा सके। इसी वजह से उसने कर्नाटक में जेडीएस से गठबंधन किया है और तेलंगाना में हाल ही केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने पार्टी को कम से कम 10 सीटें जीतने का टारगेट दिया है।
बीजेपी को तमिलनाडु में भी सीट जीतने की चुनौती
तमिलनाडु में बीजेपी पहले लोकसभा चुनाव जीत चुकी है। इस बार भी रामेश्वरम और कन्याकुमारी समेत कम से कम 4 सीटों पर जीत का लक्ष्य बनाकर चल रही है। इसके लिए वह अपनी पुरानी सहयोगी एआईएडीएमके के दोनों गुटों में फिर से तालमेल बिठाने की भी कोशिश कर रही है, जिनके साथ वह फिर से गठबंधन भी कर सकती है।
केरल में पहला 'कमल' खिलाने का चैलेंज
आंध्र प्रदेश में पार्टी ने पवन कल्याण की जन सेना से भी गठबंधन किया है। वहीं केरल में पार्टी ने जिस तरह आरएसएस के सहयोग से अपने जमीनी संगठन को मजबूत किया है और चर्च के दिलों में जगह बिठाने की कोशिश की है, उससे वह यहां भी पहली बार एक-दो सीटों पर कमल खिलने की आस लगा रही है।
महाराष्ट्र में पिछली बार जैसा प्रदर्शन कायम रखने की चुनौती
2019 में महाराष्ट्र ने भाजपा को अबतक की सबसे बड़ी बहुमत दिलाने में मदद की थी। राज्य में यूपी की 80 के बाद सबसे ज्यादा 48 सीटें हैं। पार्टी अभी भी वहां सरकार में है और शिवसेना और एनसीपी के टूटे हुए गुटों के साथ उसका गठबंधन चल रहा है।
राज्य में पार्टी पिछली बार 25 सीटों पर लड़कर 23 सीटें जीती थी और संयुक्त शिवसेना को 18 सीटें मिली थीं। इस तरह से एनडीए को मिली कुल 41 सीटों का आंकड़ा कायम रखने के लिए पार्टी अबकी बार ज्यादा सीटों पर लड़ने की तैयारी में है।
बाकी बची सीटें वह सीएम एकनाथ शिंदे की अगुवाई वाली शिवसेना और अजित पवार की अगुवाई वाली एनसीपी को ऑफर करना चाहती है। लेकिन, राज्य में मराठा आरक्षण की मांग, ओबीसी नेताओं की ओर से इसका विरोध और किसानों की समस्या उसकी राह का बड़ा रोड़ा बन रहे हैं।
बिहार और बंगाल ने भी बीजेपी की चिंता बढ़ा रखी है
भारतीय जनता पार्टी के लिए इस बार बिहार और पश्चिम बंगाल भी बहुत बड़े बाधक बन गए हैं। पश्चिम बंगाल में पार्टी पिछली बार 42 में से 18 सीटें जीत गई थी।
लेकिन, विधानसभा चुनावों के बाद जिस तरह पार्टी से नेताओं पलायन शुरू हुआ और पार्टी आंतरिक गुटबाजी का शिकार हो रही है, वह 'मिशन 350' के लिए बड़ा संकट खड़ा कर रहा है। वैसे अमित शाह ने यहां 35 सीटें जीतने का टारगेट सेट किया है।
बिहार भी भाजपा के लिए बन गया है सवाल
बिहार वह राज्य है, जहां भाजपा को पिछली बार गुजरात की तरह 100% सफलता मिली थी। जेडीयू-एलजेपी के साथ उसके गठबंधन ने लालू यादव की 'लालटेन' का तेल निकाल दिया था। लेकिन, नीतीश कुमार के पलटी मारने के बाद पूरा चुनावी समीकरण ही बदल चुका है।
हालांकि, बीजेपी ने भी वहां सोशल इंजीनियरिंग पर बहुत काम किया है और लालू-नीतीश के जातिवादी एजेंडे की हवा निकालने के लिए काफी गोटियां सेट करने की कोशिशें की हैं।
राज्य के कुछ विधानसभा उपचुनावों में मिली सफलता ने उसकी उम्मीदें बढ़ाई भी हैं। लेकिन, फिर भी एनडीए राज्य में 40/39 सीटों वाली कामयाबी हासिल कर सकेगा, यह बहुत बड़ा सवाल है।












Click it and Unblock the Notifications