Indo pak war 1971: डराने की कोशिश की थी अमेरिका ने, युद्धपोत भेजकर रूस ने बढ़ाई हमारी हिम्मत
कोलकाता। भारत आज विजय दिवस मना रहा है, चूंकि आज भारत-पाक के बीच हुई 1971 की जंग जीतने की 50वीं वर्षगांठ है। उस जंग में हमने पाकिस्तान को करारी शिकस्त दी थी, और नए मुल्क बांग्लादेश का जन्म हुआ। यह वही जंग थी, जिसमें भारत को दो मोर्चों पर लड़ना पड़ा। एक तो युद्ध के मैदान में और दूसरे संयुक्त राष्ट्र के मंच पर। अमेरिका, जिसे दुनिया का सबसे पुराना लोकतंत्र कहते हैं..उस समय (1971 में ) उसने खुलकर पाकिस्तान का पक्ष लिया था। 1947 में भारत से पाकिस्तान के साथ अलग हुए बंगाल के एक हिस्से में पाकिस्तानी हुकूमत और फौज जमकर कहर ढा रही थी। उसकी करतूतें रोकने के बजाए, अमेरिका भारत से उलझ गया। पाक वहां नरसंहार कर रहा था और औरतों का बलात्कार किया जा रहा था। लूट-पाट हो रही थी। अमेरिका ने तब लोकतंत्र का सच्चा संरक्षक बनने के बजाए भारत पर ही प्रतिबंध लगाने और युद्ध का सबक सिखाने की धमकी दी।

आज 1971 की जंग जीतने की 50वीं वर्षगांठ
पाकिस्तान अमेरिका समेत पश्चिम के अन्य देशों की सह से बांग्लादेश (जिसे तब पूर्वी पाकिस्तान कहते थे) में लोकतंत्र और मानवता की बर्बर हत्या कर रहा था, उस विकट स्थिति में भारत ने न केवल आवाज उठाई, बल्कि पाकिस्तानियों को खदेड़ना शुरू कर दिया। पाकिस्तान भारत पर कई तरफ से हमले की शुरूआत कर चुका था और 3 दिसंबर 1971 के दिन घोषित तौर पर जंग छिड़ गई। अमेरिका ने भारत पर दवाब बनाया कि युद्ध रोक दिया जाए। तब इंदिरा गांधी भारत की प्रधानमंत्री थीं। भारत पाकिस्तान, चीन (अघोषित समर्थन) और परमाणु-बमधारी देश अमेरिका (US) के आगे अकेला पड़ गया था। उस समय में रूस, जिसे तब सोवियत यूनियन (USSR) कहा जाता था, ने भारत का पक्ष लिया। रूस ने संयुक्त राष्ट्र में अमेरिकी प्रस्ताव पर वीटो किया, उसके अलावा हिंद महासागर में भी मोर्चा संभाला।
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डराने की कोशिश की थी अमेरिका ने, रूस ने साथ दिया
पत्रकार मुकेश कौशिक लिखते हैं- ''उस जंग में पाकिस्तान से हथियार डलवाने के लिए भारत जल्द से जल्द ढाका पर कब्जा करना चाहता था। ऐसा इसलिए था ताकि अमेरिका को हस्तक्षेप का मौका न मिले। मगर, अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति निक्सन पाकिस्तान को बचाने की हर कोशिश कर रहे थे। अमेरिका ने भारत को डराने के लिए अपने 7वें जंगी बेडे को हिंद महासागर में भेज दिया। उनका 7वां बेड़ा मल्लका जलसंधि से बंगाल की खाड़ी की ओर बढ़ने लगा। तब भारत ने रूस की ओर देखा। रूस ने फिर मित्रता निभाई। रूस ने फौरन अपने विध्वंसक युद्धपोत और पनडुब्बी हिंद महासागर में भेजे। उन्होंने अमेरिकी बेड़े का रास्ता रोकने की कोशिश की।

ढाका से 1 हजार मील दूर था अमेरिकी बेड़ा
इधर, ढाका के पास भारत-पाकिस्तानी फौजों के बीच लड़ाई चल रही थी, वहीं दक्षिण में रूस अमेरिका के 7वें युद्धक बेड़े की निगरानी करता रहा। एक अच्छी बात यह थी कि, अमेरिका उस समय वियतनाम युद्ध में फंसा हुआ था। और, भारत की सहायता के लिए रूसी संघ के दखल के बाद वह हिंद महासागर में चिटगांव से लगभग 1 हजार मील दूर रुकने पर मजबूर हो गया। उसके आस-पास रूसी पनडुब्बियां और युद्धपोत मंडरा रहे थे। ऐसे में अमेरिका चाह कर भी पाकिस्तान की मदद नहीं कर पा रहा था। तब महज 3-4 दिनों बाद ही पाक को आत्मसर्मपण करना पड़ा।

1 लाख पाकिस्तानियों ने मांगी थी जान की भीख
वरिष्ठ शिक्षक चरणदास शर्मा ने कहा, 'आज यानी 16 दिसंबर के ही दिन 1971 में पाकिस्तान ने भारतीय सेना के सामने अपने एक लाख लड़ाकों की जान की भीख मांगी थी। इसीलिए, भारत के साथ ही बांग्लादेश आज 'विक्ट्री डे' मनाता है। ढाका और उसके आस-पास के इलाकों में उस समय लिबरेशन वॉर चला था। हुआ ये था कि, पाकिस्तानी तानाशाह याहिया ख़ाँ द्वारा 25 मार्च 1971 को बांग्ला में सेना को हमले का फरमान दिया गया था। तब पाकिस्तानी सैनिकों ने वहां करीब 30 लाख लोगों का कत्लेआम किया। 2 लाख महिलाएं दुष्कर्म की शिकार हुईं। लाखों बच्चे भी मौत के घाट उतार दिए थे। चीन द्वारा तिब्बत को कब्जाने जैसा ये द्वंद पश्चिमी पाकिस्तान द्वारा बांग्ला में मचा था।
दिसंबर 1971 आते-आते पाकिस्तान को जब लगा कि भारत हस्तक्षेप कर सकता है, तो पाक-हुकूमत के आदेश पर पाकिस्तानी वायुसेना ने 3 दिसंबर को भारत के उत्तर-पश्चिम में पहला हमला कर दिया। जिसके उपरांत भारतीय सेना भी बांग्लाई मुक्ति मोर्चा के साथ खड़ी हो गई।

भारत-पाक के बीच यह युद्ध 13 दिनों तक चला
वर्ष 1965 की जंग के बाद यह दूसरा मौका था, जब दोनों देशों की फौजें आमने-सामने थीं। शेख मुजीर्बुर रहमान उस दौर में बांग्ला के शीर्ष राजनेता थे और उन्हें पश्चिमी पाकिस्तान की हकूमत किसी भी कीमत पर मंजूर नहीं थी। जब उनके अनुरोध पर भारत ने जवाबी कार्रवाई शुरू की तो पाकिस्तान ने अमेरिका के हाथ जोड़े। तब अमेरिका ने प्रशांत महासागर में तैनात अपनी नौसेना का 7वां बेड़ा हिंद महासागर भेजा। ऐसा उसने भारत को डराने के लिए किया, वहीं, उससे बचाव के लिए रूस ने भी अपने पोत और पनडुब्बियों को बंगाल की खाड़ी में भेज दिया था। तब रूस ने भारत का पक्ष लिया। भारत-पाक के बीच यह युद्ध 13 दिनों तक चला। जनरल मॉनेक-शा, लेफ़्ट.जन. जगजीत सिंह अरोड़ा और कई कुशल सैन्य अधिकारियों के नेतृत्व में पाकिस्तानी सेना की शर्मनाक हार हुई।

'अपने आप को मुझे सौंप दो, तुम्हारा ख़्याल रखूँगा'
जिस दिन जीत मिली, उस रोज भारतीय सेना के मेजर जनरल गंधर्व नागरा ने पाकिस्तानी सेना के प्रमुख जनरल नियाज़ी के लिए एक नोट लिखा लिखा था- 'प्रिय अब्दुल्लाह, मैं यहीँ पर हूँ। खेल ख़त्म हो चुका है। मेरी एडवाइज है कि तुम अपने आप को मुझे सौंप दो और मैं तुम्हारा ख़्याल रखूँगा।'' पाकिस्तान के 90 हजार सैनिकों समेत काफी सिविलियन लड़ाकों को भारतीय सेना ने विभिन्न ठिकानों पर बंदी बनाया।

दुनिया ने सबसे बड़ा आत्मसमर्पण देखा
तब दुनिया ने न सिर्फ उस युद्ध को किन्ही दो बड़े देशों के बीच सबसे कम समय तक चले युद्ध के तौर पर देखा बल्कि आत्मसमर्पण के लिहाज से सेकेण्ड वर्ल्ड वॉर के बाद की सबसे बड़ी जीत माना। हालांकि, पाकिस्तान की हार होने तक इस जंग में करीब 30 लाख लोग मारे गए थे। तकरीबन 80 लाख से एक करोड़ हिंदू-मुसलमानों ने भागकर भारत में शरण ली थी।

आज वहां ‘विक्ट्री डे’ मना रहे हैं हमारे राष्ट्रपति
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सत्ता में आने के बाद जून 2015 में दोनों देशों के बीच 161 एनक्लेवों का आदान-प्रदान किया गया। जिनमें से 111 सीमाई एनक्लेव (10 हजार एकड़ जमीन) बांग्लादेश को हस्तांतरित किए गए, जबकि 51 एनक्लेव (500 एकड़ भूमि) भारत को मिले। अब दोनों देशों के बीच 4,096 किलोमीटर लंबा बॉर्डर है, जो विश्व में 5वीं सबसे लंबी भू-सीमा मानी जाती है। आज भारत के राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद बांग्लादेश में ही हैं, और वहां वह 'विक्ट्री डे' मना रहे हैं।
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