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क्या सरकार को तय करनी चाहिए शादी की सही उम्र

Provided by Deutsche Welle

नई दिल्ली, 20 दिसंबर। सरकार के इस प्रस्ताव का युवा महिलाओं ने ही बल्कि कई महिला अधिकार संगठनों ने यह कहकर स्वागत किया है कि इससे लड़कियों को बराबरी का मौका मिलेगा, वे ज्यादा पढ़ पाएंगी, नौकरी कर पाएंगी और अपना करियर बेहतर ढंग से बना पाएंगी. समिति को यह भी देखना था कि शादी और मातृत्व की उम्र का मां और नवजात शिशु के स्वास्थ्य और अलग-अलग स्वास्थ्य सूचकांक जैसे शिशु मृत्यु दर, मातृ मृत्यु दर, प्रजनन दर और शिशु लैंगिंक अनुपात आदि से कैसा और कितना संबंध है.

लड़कियों के विवाह की न्यूनतम कानूनन उम्र 18 से बढ़ाकर 21 साल करने संबंधी विधेयक के इसी सत्र में पेश किए जाने की उम्मीद है. संसदीय कार्य मंत्री अर्जुन राम मेघवाल के मुताबिक बाल विवाह (रोकथाम) संशोधन विधेयक, 2021 को लोकसभा में पेश करने के बाद चर्चा कर पारित किया जाएगा. यहां से पारित होने के बाद इसे राज्यसभा में पेश किया जाएगा.

उम्र बढ़ाने को लेकर छिड़ी बहस

सरकार के प्रस्ताव के बाद से ही भारतीय समाज और राजनीतिक गलियारों में इसको लेकर बहस छिड़ गई है. कई नेता इसके खिलाफ हैं. लेकिन महिला अधिकार संगठन इस तर्क को नकार रहे हैं. बीते दिनों कुछ सांसदों और खापों ने इस प्रस्ताव के विरोध में बयान दिया. समाजवादी पार्टी के सांसद एसटी हसन ने पत्रकारों से बात करते हुए कहा, "अगर लड़की 18 साल की उम्र में वोट कर सकती है तो शादी क्यों नहीं." वहीं एक और सांसद शफीकुर्रहमान बर्क ने एक विवादित बयान में कहा "लंबे समय से शादी की यही उम्र थी, वरना इससे ज्यादा आवारगी का मौका मिलेगा." विवाद बढ़ने पर उन्होंने अपने बयान से किनारा कर लिया.

बिल के संसद में पेश होने के पहले ही समाज में अलग-अलग विचार सामने आने लगे हैं. महिला अधिकार संगठन इस प्रस्ताव पर अलग मत रख रहे हैं. एक धड़ा इसे प्रगतिशील कदम बता रहा है जिससे महिलाओं का सशक्तिकरण होगा तो वहीं कुछ संगठन प्रस्ताव को लेकर चिंतित नजर आ रहे हैं. उन संगठनों का कहना है कि शादी की उम्र 21 साल बढ़ाने के बावजूद भी गरीब परिवार लड़कियों की शादी 18 से ऊपर करने के लिए मजबूर हो सकते हैं. वे गरीबी और गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य व शिक्षा तक पहुंच की कमी को बड़ी चुनौतियों का हवाला देते हैं. वे कुपोषण और कम उम्र में विवाह जैसी समस्याओं के समाधान के लिए उन चुनौतियों से निपटने की सलाह देते हैं.

अलग-अलग मत

एचएक्यू-सेंटर फॉर चाइल्ड राइट्स की एनाक्शी गांगुली डीडब्ल्यू से कहती हैं सरकार हर चीज को "हम बनाम उन" के तौर पर देखती हैं. वे कहती, "निश्चित तौर पर महिलाओं और लड़कियों के सशक्तिकरण की जरूरत है. और हम उस हद तक सरकार के साथ हैं कि लड़कियों को मौके मिलने चाहिए, पढ़ाई-लिखाई पर ज्यादा जोर देना होगा. उनको आगे बढ़ने का मौका मिलना चाहिए. हमारा सरकार के साथ इन मुद्दों पर कोई मतभेद नहीं है. लेकिन जो उनका कदम है और जो वे सोच रहे हैं उसपर हमारा मतभेद है." इन मतभेदों के लिए गांगुली कुछ कारण भी बताती हैं, "जिन लड़कियों की बेहद कम उम्र में शादी कराई जाती है, उसको लेकर हमारे पास पहले से ही कानून है. एनसीआरबी के आंकड़े देखें तो बाल विवाह के मामले इतने कम क्यों नजर आते हैं. अगर इतनी बड़ी समस्या है जिसके लिए सरकार बोल रही है कि उम्र बढ़ाने की जरूरत है, तो मामले तो उतने बढ़ नहीं रहे हैं बल्कि घट रहे हैं. हमारे पास जो मौजूदा कानून है कम उम्र में शादी कराने को लेकर को वह पर्याप्त है. लेकिन उस कानून का पालन उतना नहीं हो रहा है. कई बार माता-पिता जब कम उम्र में शादी कराते हैं तो उस कानून का पालन नहीं होता लेकिन जब लड़की घर से भाग जाती है तो उसी कानून का कड़ाई से पालन होता है."

सेंटर फॉर सोशल रिसर्च की रंजना कुमारी कहती हैं कि उन्होंने लंबे समय तक शादी की उम्र बराबर करने को लेकर अभियान चलाया. डीडब्ल्यू से बातचीत में वे कहती हैं, "अब यह कदम उठाया जा रहा है तो हम इसका स्वागत करते हैं. इससे लड़कियों की शिक्षा की संभावना बढ़ेगी. ग्रैजुएशन के स्तर तक पढ़ाई करने के बाद शादी होती है तो निश्चित तौर पर उनको इसका लाभ मिलेगा." कुमारी कहती हैं, "लड़कियों की शादी की उम्र बढ़ाने से वे फैसले लेने में अधिक सक्षम हो पाएंगी और वे प्रजनन को लेकर भी फैसले कर पाएंगी. परिपक्व उम्र में शादी होने से वे सजग हो पाएंगी और उनके पास संभवनाएं ज्यादा होंगी."

दूसरी ओर गांगुली कहती हैं कि उम्र बढ़ाने से युवा लोगों का अपराधीकरण बढ़ जाएगा ना कि समाज सुधार होगा. गांगुली सवाल करती हैं, "जब 18 साल की उम्र में कोई मतदान कर सकता है, गाड़ी चला सकता है और अपराध के लिए खुद जिम्मेदार हो सकता है तो फिर 18 साल की उम्र में सेक्स और शादी क्यों नहीं कर सकता है." साथ ही वह सलाह भी देती हैं कि सरकार को 360 डिग्री दृष्टिकोण अपनाना चाहिए और युवाओं से बात करनी चाहिए.

मीडिया में कहा जा रहा है कि कांग्रेस, सीपीएम, एआईएमआईएम जैसी पार्टियों ने इस बिल के विरोध का फैसला कर लिया है. सीपीएम का कहना है कि सरकार को लड़कियों की शिक्षा और पोषण पर अधिक ध्यान देना चाहिए. तो वहीं कांग्रेस बिल की समीक्षा के लिए इसे स्टैंडिंग कमेटी में भेजने की मांग कर रही है.

सरकारी आंकड़ों से पता चलता है कि कानूनी प्रावधानों के बावजूद भारत में महिलाओं की शादी होने की औसत उम्र बढ़कर 22.1 साल हो गई है. लेकिन 20 से 24 साल की उम्र की 23.3 प्रतिशत महिलाओं की शादी अभी भी 18 साल से पहले हो जाती है.

गांगुली कहती हैं, "जो लड़कियां कम उम्र में शादी करती हैं वह भी हताश स्थिति से निकालने के लिए करती हैं, वे गरीबी से भाग रही होती हैं, घर की हिंसा से भाग रही होती हैं. उनको लगता है कि शादी करने से स्थिति बदल जाएगी. उनकी जिंदगी को बदलना है तो परिस्थिति को बदलना होगा ना कि कानून को बदलने से परिस्थिति बदल जाएगी."

Source: DW

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