हिमाचल प्रदेश चुनाव में बीजेपी 20% MLA का टिकट काट सकती है, इस आधार पर होगा फैसला
शिमला, 21 अप्रैल: हिमाचल प्रदेश में इसी साल के आखिर में गुजरात के साथ विधानसभा चुनाव होने वाले हैं। यहां भी बीजेपी की सरकार है। लेकिन, पिछले साल नवंबर में हुए उपचुनाव में सत्ताधारी पार्टी को बहुत बड़ा झटका लग चुका है। इसलिए पार्टी विधानसभा चुनावों में कोई जोखिम नहीं लेना चाहती। पार्टी की ओर से संकेत मिल रहे हैं कि जिस भी विधायकों के प्रदर्शन को लेकर आशंका है, उनका पत्ता कट सकता है। ऐसे कम से कम 20 फीसदी एमएलए हो सकते हैं, जिसे पार्टी दोबारा से टिकट नहीं देगी और नए चेहरों पर दांव लगाना चाहेगी।

हिमाचल में 20% विधायकों का टिकट काट सकती है बीजेपी
दि प्रिंट की एक रिपोर्ट के मुताबिक इस साल होने वाले विधानसभा चुनाव में बीजेपी अपने 20 फीसदी सीटिंग एमएलए का टिकट काटने पर विचार कर रही है। इस फैसले का आधार विधायकों की परफॉर्मेंस रिपोर्ट होगी। भाजपा सूत्रों के मुताबिक इस सिलसिले में पार्टी ने पहले ही एमएलए के कार्यों की कई तरह से समीक्षा करवा ली है। पार्टी सूत्रों का कहना है कि इस बात पर विचार किया जा रहा है कि जिन विधायकों का प्रदर्शन अच्छा नहीं है, उनकी जगह पर नए चेहरों को टिकट दिया जाएगा, ताकि एंटी-इंकंबेंसी दूर की जा सके। गौरतलब है कि बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा प्रदेश में मुख्यमंत्री का चेहरा बदलने की अटकलों को पहले ही खारिज कर चुके हैं और साफ किया है कि चुनाव सीएम जय राम ठाकुर की अगुवाई में ही लड़ा जाएगा।

'समीक्षा की अंतिम प्रक्रिया जारी'
वैसे हिमाचल प्रदेश में पिछले तीन दशकों से कोई भी सरकार चुनाव के बाद दोबारा सत्ता में लौटकर नहीं आई है। लेकिन, हाल ही में उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश में इस ट्रेंड को बदल चुकी भारतीय जनता पार्टी को उम्मीद है कि हिमाचल प्रदेश में वह दोबारा सत्ता में आने में सफल होगी। राज्य में विधानसभा की 68 सीटें हैं, जिनमें से 2017 में बीजेपी 44 पर और कांग्रेस 21 सीटों पर जीती थी। हिमाचल में पार्टी प्रभारी अविनाश राय खन्ना ने भी माना है कि बीजेपी में 20 फीसदी विधायकों का टिकट काटने पर मंथन चल रहा है। खन्ना ने कहा, 'समीक्षा की अंतिम प्रक्रिया जारी है और नॉन-परफॉर्मिंग एमएलए को नहीं उतारा जाएगा।' वो बोले कि 'अंतिम फैसला जल्द लिया जाएगा।'

पहले भी कई राज्यों में कर चुकी है ऐसा फैसला
एंटी-इंकंबेंसी से निपटने के लिए भाजपा यह प्रयोग गुजरात में पीएम नरेंद्र मोदी के मुख्यमंत्री रहते समय से ही कर रही है और दूसरे राज्यों में भी इसे कई बार अपना चुकी है। 2022 के यूपी विधानसभा चुनाव में भी पार्टी के अंदर इसी तरह के फैसले की सुगबुगाहट के बीच जब पार्टी के विधायकों ने दूसरे दलों में शामिल होना शुरू किया तो पार्टी को अपनी रणनीति बदलनी पड़ गई। एक वरिष्ठ बीजेपी नेता ने कहा, 'गुजरात में एंटी-इंकंबेंसी से निपटने के लिए विधानसभा चुनाव से पहले मुख्यमंत्री समेत पूरी कैबिनेट बदल दी गई। लोग बीजेपी को मौका देना चाहते हैं, लेकिन वे वही पुरानें चेहरों से थक भी चुके हैं।' वो बोले कि, 'कई बार सीटिंग विधायक लापरवाह हो जाते हैं और परफॉर्म करना बंद कर देते हैं। हमारा अनुभव कहता है कि लोग एक ही व्यक्ति को दोबारा वोट नहीं देते हैं।'

हिमाचल में एंटी-इंकंबेंसी बड़ा फैक्टर है!
हिमाचल प्रदेश में सत्ताधारी बीजेपी के लिए एंटी-इंकंबेंसी बड़ा फैक्टर है। क्योंकि, यह पिछले साल नवंबर में हुए उपचुनाव में मंडी लोकसभा और तीन विधानसभा हार चुकी है। यह हार भाजपा को इसलिए भी परेशान कर रहा है, क्योंकि पार्टी अध्यक्ष नड्डा और केंद्र में दबदबे वाले मंत्री अनुराग ठाकुर का यह गृह राज्य भी है। पार्टी ने जब उपचुनाव में हार की समीक्षा की तो पता चला कि इसके पीछे गुटबाजी और जीतने वाले उम्मीदवारों को नजरअंदाज करना मुख्य कारण रहा, लेकिन राज्य सरकार के प्रति एंटी-इंकंबेंसी भी हार की वजहों में शामिल थी।












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