हिमाचल चुनाव में धूमल और वीरभद्र की कमी का लाभ लेने की फिराक में आम आदमी पार्टी
शिमला, 27 अप्रैल। हिमाचल प्रदेश में इस साल के अंत में होने वाले चुनावों के लिये राजनीतिक माहौल अभी से गरमा गया है। प्रदेश में हालांकि भाजपा और कांग्रेस बारी बारी से सत्ता में काबिज होते रहे हैं। लेकिन इस बार आम आदमी पार्टी के मैदान में कूदने से दोनों ही पारंपरिक राजनीतिक दलों को बेचैन कर दिया है। यही नहीं चुनावी परिदृश्य में इस बार भाजपा के कद्दावर नेता प्रेम कुमार धूमल और कांग्रेस के वीरभद्र सिंह की गैरमौजूदगी भी चुनावी माहौल को बदल रही है। इसी का लाभ लेने की फिराक में आम आदमी पार्टी है।

दरअसल, पूर्व सीएम वीरभद्र सिंह का निधन हो चुका है। और भाजपा नेता प्रेम कुमार धूमल सत्तर पार कर चुके है। उन्हें पार्टी चुनावी मैदान में उतारेगी कि नहीं, इस पर संशय बरकरार है। लेकिन पंजाब में आम आदमी पार्टी की सरकार बनने के बाद चुनावी सरगर्मियां तेज हैं। शिमला से लेकर पंजाब से सटे कांगड़ा के मैदानी इलाकों में यही चर्चा है कि इस बार आम आदमी पार्टी भाजपा और कांग्रेस की चुनावी संभावनाओं में खलल डाल देगी। हिमाचल प्रदेश में इस बार के चुनावों में आम आदमी पार्टी भी अपना दांव लगाने की पूरी कोशिश में जुटी है। पंजाब में सभी प्रमुख राजनीतिक दलों के गढ़ों को ध्वस्त करने के बाद, आम आदमी पार्टी अब इस साल के अंत में होने वाले विधानसभा चुनाव में हिमाचल प्रदेश जीतने की तैयारी कर रही है।

पंजाब में अकालियों, भाजपा और कांग्रेस के पारंपरिक राजनीतिक संगठनों को खत्म करने वाली पार्टी के लिए यहां परिस्थितियां विपरीत नहीं हैं। प्रदेश में सत्तारूढ़ भाजपा के खिलाफ एक मजबूत सत्ता-विरोधी लहर दिखाई पड़ रही है। इसका एक उदाहरण अक्टूबर 2021 के उपचुनावों में दिखा जब तीन विधानसभा और एक संसदीय सीट पर भाजपा को हार का सामना करना पड़ा था। ऐसे में वीरभद्र सिंह व धूमल जैसे अनुभवी मुख्यमंत्री चेहरों की अनुपस्थिति आम आदमी पार्टी के लिए काम कर सकती है जो पहले से ही दो राज्यों में शासन कर रही है।
राजनीतिक जानकार मानते है कि मौजूदा समय में कांग्रेस के वीरभद्र सिंह और भाजपा के प्रेम कुमार धूमल प्रदेश के राजनीतिक मानचित्र से बाहर हैं। सिंह की मृत्यु हो चुकी है, जबकि धूमल पिछले विधानसभा चुनावों में अपनी हार के बाद वस्तुतः राजनीतिक निर्वासन में हैं। ऐसे में आप के लिए स्थिति कमोबेश स्पष्ट है, जिसने अभी तक राज्य के निकाय चुनावों में भी अपनी उपस्थिति दर्ज नहीं कराई है। पहाड़ी राज्य में पारंपरिक राजनीतिक दल कांग्रेस और भाजपा दोनों 1985 से से वैकल्पिक रूप से राज्य पर शासन कर रहे हैं।हिमाचल प्रदेश में पारंपरिक रूप से कांग्रेस का दबदबा था और 1977 में जब जनता पार्टी सत्ता में आई, तब उन्होंने अपना पहला गैर-कांग्रेसी मुख्यमंत्री शांता कुमार देखा। अब तक राज्य में दो दलों का ही प्रभुत्व देखा गया है। कांग्रेस और भाजपा दोनों के मुट्ठी भर विद्रोही समय-समय पर उभर रहे हैं, लेकिन बड़े राजनीतिक परिदृश्य पर अपनी उपस्थिति दर्ज करने में विफल रहने के बाद, वे या तो पिछली पार्टी में विलय हो गए। या दूसरी पार्टी में शामिल हो गए।
ऐसे में पंजाब फतह कर अपना लोहा मनवा चुकी आम आदमी पार्टी कुछ असंतुष्टों के लिए एक विकल्प हो सकती है। आप राज्य में पहली बार सक्रिय नहीं है। इसने 2014 का लोकसभा चुनाव लड़ा था। पंजाब की जीत के बाद, वे अति सक्रिय हैं। विशेषज्ञों की मानें तो कांग्रेस आप की गतिविधियों से सबसे ज्यादा प्रभावित है। उन्हें अपने नेताओं के आप में जाने का डर है। यही कारण है कि पांच राज्यों में चुनावी हार के बाद कांग्रेस अब हिमाचल में एक्टिव दिख रही है।
कांग्रेस नेता ब्रज मोहन सोनी मानते हैं कि पार्टी को इस समय वीरभद्र सिंह जैसे कद्दावर नेता की कमी महसूस हो रही हैं। बकौल उनके वीरभद्र सिंह सर्वमान्य नेता थे व अपने ही दम पर वह पार्टी को चुनावी जीत दिलवा देते थे। लेकिन पार्टी उनके निधन के बाद अभी तक यह स्पष्ट नहीं कर पाई है कि चुनाव किसके नेतृत्व में लड़ा जाये। इसी का लाभ आम आदमी पार्टी लेने की फिराक में है। लेकिन प्रतिभा सिंह को कांग्रेस की कमान मिलने से एक उम्मीद कार्यकताओं में जगी है।












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