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Gwalior News: ग्वालियर में रखी है फारसी में लिखी 468 साल पुरानी रामायण, अकबर ने कराया था अनुवाद

Gwalior News: मध्य प्रदेश के ग्वालियर पड़ाव स्थित गंगादास की बड़ी शाला में 468 साल पुरानी अरबी भाषा में अनुवादित रामायण मौजूद हैं। एक ऐसी फारसी में अनुवादित सालों पुरानी दुर्लभ वाल्मीकि रामायण है। जिसे उन्होंने श्रृद्धा भाव से सहेजकर रखा है। यह भारत की गंगा-जमुनी तहजीब की अनूठी मिसाल है।

अकबरकाल की 468 साल पुरानी हस्तलिखित अरबी भाषा में अनुवादित रामायण ग्वालियर के पड़ाव स्थित गंगादास की बड़ी शाला में मौजूद है। इसी जगह पर झांसी की रानी लक्ष्मीबाई अंग्रेजों से लड़ते हुए शहीद हुई थीं।

Persian Ramayana Gwalior ,

किदवंति है कि जब अकबर ग्वालियर के प्रवास पर आए थे। तब उन्होंने गंगादास की शाला के महंत से शिक्षा ली थी तो महंत ने उनसे कहा था कि आप केवल एक धर्म को मानने वाले हैं। सभी धर्म को मानो तब आपको शिक्षा देंगे इसके बाद अकबर ने दिन ए इलाही धर्म की स्थापना की थी और महंत से रामायण का अरबी भाषा में अनुवाद कराया था तभी से यह रामायण गंगा दास की शाला में संरक्षित तरीके से रखी गई है। खास बात यह है कि सालों बीत जाने के बावजूद इस रामायण के अक्षर अभी भी सोने से चमकते हैं। जो किसी चमत्कार से काम नहीं है।

भगवान राम के जीवन चरित्र को समझने फारसी में कराया गया था अनुवाद

गंगा दास की बड़ी शाला के महंत श्री राम सेवक महाराज का कहना है कि भगवान श्रीराम के पूरे जींवन चरित्र को समझने के लिए पूरी रामायण का अरबी में अनुवाद कराया था। फिर इसे ग्वालियर में संतों के मठ में सुरक्षित रखवाया था। उन्होंने बताया कि जब 468 साल पहले जब ग्वालियर में अकबर आया था तो संतों की ख्याति सुनकर वह गंगा दास की इस शाला पर भी आया था। यहां रुककर उसने अरबी विद्वानों को संतों के साथ समन्वय करवाया और संस्कृत भाषा के ग्रंथ रामायण का अरबी में अनुवाद करवाया ताकि वह स्वयं पढ़कर इसे समझ सके और अन्य मुस्लिम शासक और कारिंदे भी जान सकें।

इसके बाद उसने रामायण की यह अरबी में अनुवादित प्रति को सम्मान पूर्वक मठ के महंतों को सौंपा ताकि यह सुरक्षित रह सके। यहां यह ग्रंथ आज भी सुरक्षित है। यह रामदरबार में संरंक्षित करके रखी गई है। महंत का कहना है कि उस समय की स्याही इतनी पक्की है कि शब्द सैकड़ों साल बाद भी मोती की तरह चमकते हैं।

संवाद सूत्र: पंकज श्रीमाली, ग्वालियर/मध्य प्रदेश

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