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कश्मीर: हुर्रियत के दोनों धड़ों पर लग सकता है प्रतिबंध

नई दिल्ली, 23 अगस्त। मीडिया में आई खबरों में दावा किया जा रहा है कि हुर्रियत के दोनों धड़ों पर यूएपीए के तहत प्रतिबंध लगाने की तैयारी चल रही है. इस तरह के प्रतिबंध लगाने के बाद सरकारी एजेंसियां ना सिर्फ इन दोनों धड़ों को मिलने वाली आर्थिक मदद रोक पांगी, बल्कि उन्हें इनके नेताओं और सदस्यों को गिरफ्तार करने में भी मदद मिलेगी.

Provided by Deutsche Welle

ऑल पार्टी हुर्रियत कॉन्फ्रेंस का जन्म नौ मार्च 1993 को हुआ था. उस समय इसके बैनर तले कश्मीर के 26 राजनीतिक, सामाजिक और धार्मिक संगठन साथ आए थे. इनका सभी संगठनों का उद्देश्य था कि कश्मीर को भारत से अलग करने की मांग को आगे बढ़ाया जाए.

खत्म होता वर्चस्व

दशकों तक हुर्रियत के कहने पर आम कश्मीरी कश्मीर को ले कर केंद्र की नीतियों के खिलाफ सड़कों पर उतर आते थे. इस तरह के प्रदर्शन कश्मीर में 2016 तक भी हुआ करते थे. हालांकि बीते दो दशकों में हुर्रियत काफी कमजोर हुई है. 2003 में यह दो अलग अलग धड़ों में बंट गई और अभी तक बंटी हुई है.

एक धड़े का नेतृत्व मिरवाइज उमर फारूक करते हैं, जिन्हें कश्मीरियों के सबसे बड़े आध्यात्मिक नेता के रूप में देखा जाता है. इस धड़े को मॉडरेट या नरम धड़े के रूप में जाना जाता है. मिरवाइज कश्मीरियों के अपना भविष्य खुद तय करने की अधिकार की मांग को लेकर दिल्ली से बातचीत करने का समर्थन करते हैं.

दूसरे धड़े को हार्डलाइन या कट्टर धड़ा कहा जाता है. इसका नेतृत्व हाल तक सैय्यद अली शाह गिलानी करते थे. 2010 में उन्हें उनके ही घर में नजरबंद कर दिया गया था और तब से उनका अधिकांश जीवन नजरबंदी में ही बीता है. जुलाई 2020 में उन्होंने खुद को हुर्रियत से अलग कर लिया था.

क्या होगा असर

इसके अलावा 2018 में केंद्रीय एजेंसियों ने हुर्रियत के कई नेताओं और उनसे जुड़े प्रमुख लोगों के खिलाफ धन शोधन के आरोपों की जांच शुरू की जिसके बाद छापों और गिरफ्तारियां का एक ऐसा सिलसिला चला जो अभी तक जारी है.

जून 2021 में कश्मीरी नेताओं से मिलते प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी

पांच अगस्त 2019 को केंद्र ने जम्मू और राज्य को विशेष राज्य का दर्जा देने वाले भारतीय संविधान के अनुच्छेद 370 को प्रभावशाली रूप से निष्क्रिय कर दिया और राज्य का दो केंद्र शासित प्रदेशों में विभाजन कर दिया. इसके बाद कश्मीर की राजनीति में हुर्रियत की भूमिका और भी ज्यादा सिमट गई.

इसलिए कुछ जानकारों का कहना है कि मृत शैय्या पर पड़े इस संगठन पर जा कर बैन लगा देने से कुछ विशेष हासिल नहीं होगा. वरिष्ठ पत्रकार जफर इकबाल ने डीडब्ल्यू से कहा कि अव्वल तो अभी इस बारे में केवल अटकलें लग रही हैं और इसे लेकर ना कोई सरकारी अधिसूचना जारी हुई है ना बयान आया है.

फिर पनपेगा आतंकवाद?

इकबाल ने यह भी कहा कि यासीन मालिक, शब्बीर शाह, आसिया अंद्राबी जैसे हुर्रियत के चोटी के नेता पहले से जेल में हैं और गिलानी बहुत बूढ़े हो गए हैं. ऐसे में अगर हुर्रियत पर बैन लगता भी है तो इसका क्या असर होगा यह अभी कहा नहीं जा सकता.

गांदेरबल में असम राइफल की महिला कर्मी आने जाने वालों की चेकिंग करते हुए

हालांकि कुछ और लोगों की राय इससे अलग है. श्रीनगर में रहने वाले पत्रकार रियाज वानी मानते हैं कि संगठन पर बैन लगा देने के कई दुष्परिणाम हो सकते हैं. उनका कहना है कि बैन लगा देने से केंद्र से नाराज कश्मीरी युवाओं के पास आतंकवाद के अलावा और कोई रास्ता नहीं बचेगा.

वानी का यह भी अनुमान है कि ऐसा करने से कश्मीरी अलगाववादियों में सरकार से बातचीत करने वाला कोई नहीं बचेगा और ऐसे में पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में बैठे अलगाववादियों का कश्मीर में हस्तक्षेप बढ़ जाएगा.

यूएपीए के भाग 35 के तहत भारत सरकार संगठनों को आतंकवादी गतिविधियों में शामिल होने के लिए प्रतिबंधित कर सकती है. इस समय 42 ऐसे संगठन हैं जिन पर ऐसे बैन लागू हैं. इनमें अल कायदा, इस्लामिक स्टेट, लश्कर-ए-तैयबा, हिज्बुल मुजाहिदीन, एलटीटीई, बब्बर खालसा, सीपीआई (माओवादी), उल्फा, सिमी जैसे संगठन शामिल हैं.

Source: DW

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