झारखंडी महादेव मंदिर: जब कुल्हाड़ी लगते ही पत्थर से बहने लगी थी 'खून की धारा', ऐसे बना आस्था का केंद्र

Jharkhandi Mahadev Temple Gorakhpur: भगवान शिव का सबसे प्रिय माह सावन मंगलवार यानी कल से शुरु होने जा रहा है। इस माह में भगवान शिव की विशेष पूजा अर्चना की जाती है। भगवान शिव के भक्तों के लिए यह महीना बेहद खास माना जाता है। पूरे सावन भर श्रद्धालुओं का शिवालयों में तांता लगा रहता है। आज गोरखपुर स्थित एक ऐसे ही शिवालय की चर्चा कर रहे हैं जिसका अपना ऐतिहासिक महत्व हैं। यह शिव मंदिर झारखण्डी महादेव के नाम से प्रसिद्ध है और श्रद्धालुओं के आस्था का प्रमुख केन्द्र हैं।

जब पत्थर से निकलने लगी थी खून की धारा मंदिर के मुख्य पुजारी शंभू गिरी बताते हैं कि प्राचीन समय में जगह रामग्राम के नाम से प्रसिद्ध था। चारों तरफ सिर्फ घना जंगल ही जंगल था। इस जंगल में लकड़हारे अपनी जीविका के लिए लकड़ी काटने आया करते थे। इसी क्रम में एक दिन एक लकड़हारा जंगल में लकड़ी काट रहा था। इसी बीच उसकी कुल्हाड़ी पत्थर से जा टकराई। उसने पास जाकर देखा तो उस पत्थर से खून की धारा बह रही थी। उसने गांव वालों को पूरी बात बताई। इसके बाद वहां बहुत सारे लोग आ गये। उन्होंने पत्थर को बाहर निकालने का बहुत प्रयास किया लेकिन पत्थर बाहर नहीं निकला। तब से वहां पर लोगों ने दूध व जल से अभिषेक करना प्रारंभ कर दिया। बाद में इस स्थान पर मंदिर का निर्माण कराया गया। देखते ही देखते यह मंदिर लोगों के आस्था का प्रमुख केंद्र बन गया।

gorakhpur

यह भी है मान्यता
एक अन्य मान्यता के मुताबिक, इस क्षेत्र के जमींदार गब्बू दास को रात में भगवान भोले का सपना आया कि झारखंडी में भोले प्रकट हुए हैं। इसके बाद जमींदार और स्थानीय लोगों ने वहां पहुंचकर शिवलिंग को जमीन से बाहर निकालने का प्रयास करने लगे लेकिन वो सफल नहीं हुए। तब से लोगों ने यहां पूजा अर्चना प्रारंभ कर दी।

खुले आसमान के नीचे है शिवलिंग
यह शिवलिंग खुले आसमान के नीचे है। कई बार इस पर छत डालने की कोशिश की गयी लेकिन छत नहीं पड़ सकी। बाद में इसे ऐसे ही छोड़ दिया गया।

विशाल वृक्ष में है शेषनाग की आकृति
इस मंदिर परिसर में सैकड़ों साल पुराना वृक्ष है। इस वृक्ष में शेषनाग की आकृति है जो भक्तों के आकर्षण का प्रमुख केन्द्र है। इस आकृति को देखकर ऐसा लगता है मानों साक्षात नाग देवता यहां प्रकट हों।

गौतम बुद्ध यहां कर चुके है विश्राम
ऐसी मान्यता है कि पूर्व रामग्राम के नाम से प्रसिद्ध यह स्थान भगवान गौतम बुद्ध से संबंधित था। यह बुद्ध की पत्नी यशोधरा का मायका व उनका ससुराल था। माना जाता है कि कुशीनगर जाते समय भगवान बुद्ध यहां दो दिनों तक रुके थे।

नही टिकता था कोई पुजारी मुख्य पुजारी शंभू गिरी ने बताया कि लाल बिहारी दास से पहले यहां कोई भी पुजारी टिक नहीं पाता था। उन्होंने एक पांव पर खड़े रहकर काफी दिनों तक तपस्या की तब जाकर भोले बाबा प्रसन्न हुए और यहां महंत और पुजारियों का टिकना शुरू हुआ।

सीएम योगी का है खास लगाव
उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का इस मंदिर से खासा लगाव है। वह यहां अक्सर पूजा अर्चना करने आते हैं। बहुत कम ही सावन का महीना रहा होगा जब सीएम यहां न आए हों।

आस्था का है प्रमुख केंद्र
महादेव का यह मंदिर भक्तों के आस्था का प्रमुख केंद्र है। यहां सावन माह में लाखों श्रद्धालु भगवान शिव को जलाभिषेक करते हैं। इसके साथ ही बारह महीनों यहां भक्तों की भीड़ लगी रहती है।

सभी की मुरादें होती हैं पूरी
मुख्य पुजारी बताते हैं कि इस मंदिर पर आने वाले सभी भक्तों की भगवान शिव सभी मुरादें पूरी करते हैं। कई भक्तों की मुरादें पूरी होने के बाद वह दोबारा यहां आकर पूजा अर्चना करते हैं। गोरखपुर ही नहीं पूर्वांचल के कई जिलों, बिहार व नेपाल के भक्त भी यहां आते हैं।

लगता है भव्य मेला
सावन माह में मंदिर के सामने स्थित मैदान में भव्य मेले का आयोजन किया जाता है जो कई दिनों तक रहता है।

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