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भारत और अमेरिका में 3,000 लोगों को निकालेगी फोर्ड

एक सदी से ज्यादा समय से फोर्ड कारों का बोलबाला रहा है

नई दिल्ली, 23 अगस्त। अपनी पारंपरिक पेट्रोल और डीजल कारों को छोड़ कंपनी ने हाल के सालों में इलेक्ट्रिक कारों का निर्माण बढ़ा दिया है. टेस्ला और कई नई कंपनियां इलेक्ट्रिक कारों के जरिए चुनौती दे रही हैं जिनके कारण पारंपरिक कारों का बाजार सिकुड़ रहा है.

फोर्ड ने जिन लोगों को निकालने की बात कही है उनमें 2,000 पक्के कर्मचारी हैं जिन्हें नियमित वेतन मिलता है जबकि 1,000 कर्मचारी ऐसे हैं जो ठेके पर काम कर रहे हैं. कंपनी का कहना है कि निकाले जाने वाले ज्यादातर कर्मचारी भारत, अमेरिका और कनाडा में हैं. एक प्रवक्ता ने बताया कि फैक्ट्रियों में काम करने वाले लोगों पर इस छंटनी का असर नहीं होगा.

इस प्रवक्ता ने मीडिया को बताया, "हम पिछले कुछ समय से जो बताते आ रहे हैं, यह छंटनी उसी की एक कड़ी है और हम फोर्ड को और ज्यादा सक्षम बनाना चाहते हैं."

दुनियाभर में फोर्ड के एक लाख 82 हजार से ज्यादा कर्मचारी हैं और ऐसी खबरें आ रही थीं कि फोर्ड हजारों छंटनियां करने वाली है. कंपनी के अध्यक्ष और सीईओ जिम फारली ने जुलाई में पत्रकारों से बातचीत में कहा था कि कर्मचारियों की संख्या बहुत ज्यादा हो गई है. उतरी अमेरिका महाद्वीप में कंपनी के 31,000 कर्मचारी हैं जिनमें से करीब 6 प्रतिशत की छंटनी की बात है. हालांकि दुनियाभर की फैक्ट्रियों में काम करने वाले करीब 56,000 मजदूर वर्ग के कर्मचारियों पर इसका असर नहीं होगा.

पढ़ेंः क्या यूरोपीय देशों में इलेक्ट्रिक कारें सफल हो रही हैं?

फारली ने कहा था, "निश्चित तौर पर हमारे यहां कर्मचारी बहुत ज्यादा हो गए हैं और ऐसा काम है जिनमें बदलाव की जरूरत है. ऐसे कौशल हैं जो अब काम के नहीं रहे."

अब ईवी का युग

फोर्ड पहले ही कह चुकी है कि 2026 तक इलेक्ट्रिक कारों के निर्माण पर 50 अरब डॉलर खर्च किए जाएंगे. मार्च में कंपनी ने कहा था कि वह पारंपरिक कारों के निर्माण पर खर्च में सालाना तीन अरब डॉलर तक की कटौती करना चाहती है.

सौ साल से भी ज्यादा पुरानी कार कंपनी का पेट्रोल और डीजल कारों की दुनिया पर लंबे समय तक राज रहा है. लेकिन अब पूरी दुनिया की सरकारें इलेक्ट्रिक वाहनों पर जोर दे रही हैं और उन्हीं को बढ़ावा देने के लिए नीतियां बना रही हैं. जलवायु परिवर्तन पर पेट्रोल और डीजल जैसे जीवाश्म ईंधनों का असर हर ओर दिखने लगा है. हालांकि इसके बावजूद पारंपरिक वाहनों के शोध और विकास पर भी कार कंपनियां लगातार धन खर्च रही हैं.

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फोर्ड ने कहा है कि 2030 तक उसका आधा निर्माण इलेक्ट्रिक कारों का होगा. कंपनी के कार्यकारी अध्यक्ष बिल फोर्ड और सीईओ जिम फारली ने कर्मचारियों को भेजी अपनी ईमेल में कहा है कि जिन कर्मचारियों को काम से हटाया जाएगा उन्हें छंटनी के बदले भुगतान किया जाएगा और नई नौकरियां खोजने में भी मदद की जाएगी. उन्होंने लिखा कि फोर्ड के पास इलेक्ट्रिक वाहनों के नए युग का नेतृत्व करने का मौका है.

ईमेल में कहा गया, "भविष्य के इस निर्माण के लिए कुछ बदलावों की जरूरत है. ये बदलाव उन सारे पहलुओं में करने होंगे जिनमें कंपनी एक सदी से भी ज्यादा समय से काम करती रही है. इसका अर्थ है कि संसाधनों के बंटवारे में बदलाव हो और खर्च में भी."

फारली और फोर्ड ने कहा कि कंपनी ने हर एक विभाग में बदलावों का अध्ययन करने के बाद ही यह फैसला किया है कि कटौती कहां-कहां की जाए. उन्होंने कहा, "कामों को पूरी तरह समाप्त कर रहे हैं और पूरे व्यापार में फेरबदल कर चीजों को सरल बना रहे हैं." कंपनी के प्रवक्ता टी आर रीड ने कहा कि यह कटौती अंतिम नहीं है, और ज्यादा लोगों की नौकरियां जा सकती हैं.

भारत में पिछले साल हुई शुरुआत

भारत में कटौतियों की शुरुआत फोर्ड ने पिछले साल ही कर दी थई जब उसने ऐलान किया था कि फोर्ड कंपनी अब भारत में कारें नहीं बनाएगी. पिछले साल सितंबर में फोर्ड ने कहा था कि बीते 10 साल में उसे दो अरब डॉलर से ज्यादा नुकसान उठाना पड़ा है. 2019 में उसकी 80 करोड़ डॉलर की संपत्ति बेकार हुई. एक बयान में कंपनी के भारत में अध्यक्ष और महाप्रबंधक अनुराग मेहरोत्रा ने कहा, "हम लंबी अवधि में मुनाफा कमाने के लिए एक स्थिर रास्ता खोजने में नाकाम रहे."

फोर्ड की इंजन बनाने वाली और कारों को असेंबल करने वाली फैक्ट्रियां चेन्नई में थीं जिन्हें बंद कर दिया गया या किया जा रहा है. उस बदलाव से करीब चार हजार कर्मचारी प्रभावित हुए थे.

इसी महीने टाटा ने कहा था कि वह फोर्ड का गुजरात संयंत्र खरीद रही है. टाटा मोटर्स की ओर से जारी एक बयान में कहा गया कि इस संयंत्र के लिए 7.26 अरब रुपये यानी लगभग 9.2 करोड़ डॉलर का भुगतान किया जाएगा. इस खरीद में जमीन, इमारतें और साणंद स्थित प्लांट की मशीनें आदि शामिल हैं.

रिपोर्टः विवेक कुमार (एएफपी)

Source: DW

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