Illegal Migrants: मणिपुर और मिजोरम में ‘अवैध प्रवासियों’ के आंकड़े क्यों जुटा रही है केंद्र सरकार
Illegal Migrants: 28 अप्रैल 2023 को केंद्रीय गृह सचिव अजय कुमार भल्ला ने मणिपुर और मिजोरम राज्यों की सरकारों से 'अवैध प्रवासियों' के बायोग्राफिक और बायोमेट्रिक जानकारियां जुटाने के लिए कहा था। जिसकी समय सीमा 30 सितंबर 2023 तक निर्धारित की गयी थी। इस विवरण में आंखों के रेटिना व आइरिस सहित उंगलियों के निशान (फिंगर प्रिंट्स) भी लेने की बात कही गयी थी। इस बीच बीते दो महीनों से मणिपुर में फैली हिंसा को भी अवैध प्रवासियों से जोड़कर देखा जा रहा है। मणिपुर के मुख्यमंत्री एन. बीरेन सिंह कई बार कह चुके है कि राज्य में जारी हिंसा के पीछे म्यांमार के अवैध प्रवासी शामिल हैं।
सितंबर 2022 में सत्तारूढ़ मिजो नेशनल फ्रंट (एमएनएफ) के राज्यसभा सदस्य के. वनलालवेना ने भी कहा था कि फरवरी 2021 में म्यांमार में सैन्य तख्तापलट के बाद पड़ोसी देश के 40,000 से अधिक शरणार्थियों ने मिजोरम में अवैध शरण ली थी। अब ऐसा कहा जा रहा है कि इन्हीं में से लगभग 4,000 शरणार्थी मणिपुर में प्रवेश कर चुके हैं।

क्या है पूरा मामला?
मणिपुर दो महीनों से भी ज्यादा समय से हिंसा की चपेट में है। जबकि मणिपुर के पहाड़ी इलाकों में म्यांमार से आये अवैध प्रवासी बसे हैं। राज्य सरकार इन अवैध घुसपैठियों के कब्जों को वापस अपने अधिकार में लेने के अभियान चला चुकी है। इसी क्रम में केंद्र सरकार ने मणिपुर के साथ-साथ मिजोरम में शरण लेने वाले अवैध प्रवासियों का आंकड़ा जुटाने की पहल की है। इससे पहले भी मणिपुर में एनआरसी लागू करने की बात कही गयी थी, तब इसका भारी विरोध हुआ था। जिसके बाद यह मामला ठंडे बस्ते में चला गया।
मणिपुर की 'हां', मिजोरम की 'ना'
केंद्र सरकार के निर्देश पर मणिपुर सरकार ने इस सर्वे के लिए सहमति दे दी है। राज्य सरकार ने अवैध प्रवासियों की पहचान शुरू कर दी है। गौरतलब है कि हिंसा शुरू होने से पहले तक लगभग ढाई हजार से ज्यादा अवैध प्रवासियों की पहचान कर ली गयी थी। जबकि दूसरी ओर मिजोरम के मुख्यमंत्री जोरमथंगा ने कहा है कि राज्य सरकार को केंद्र का यह प्रस्ताव मंजूर नहीं है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भेजे गये एक पत्र में उन्होंने लिखा कि हम म्यांमार में फैले मानवीय संकट के चलते उनकी अनदेखी नहीं कर सकते। विदेश नीति से जुड़े कुछ मुद्दों पर भारत को सावधानी से आगे बढ़ने की जरूरत है। वहीं एमएनएफ के राज्यसभा सांसद के. वानलालवेना का कहना है कि म्यामांर से आने वाले शरणार्थी उनके परिवार की तरह हैं।
कब शुरू हुई भारत में घुसपैठ?
भारत-म्यांमार सीमा के आसपास रहने वाले लोगों का रहन-सहन और खान-पान एकसमान है। इस वजह से अवैध घुसपैठियों की पहचान कर पाना थोड़ा मुश्किल है। सीमा के दोनों ओर बसे लोग ज्यादातर कुकी-चिन समुदाय के हैं और इनकी आपसी रिश्तेदारियां भी हैं। इस वजह से मणिपुर के कुकी जनजाति के लोग सीमा पार से आने वाले लोगों को शरण भी देते हैं।
यूएस डिपार्टमेंट ऑफ स्टेट की जनवरी 2023 में जारी प्रेस रिलीज के मुताबिक एक फरवरी 2021 को म्यांमार में सैन्य तख्तापलट के बाद राजनैतिक, आर्थिक और मानवीय संकट गहरा गये थे। घरेलू हिंसा में लगभग 3,000 लोग मारे गये और 17,000 के आसपास लोगों को हिरासत में लिया गया था। साथ ही 15 लाख से अधिक लोगों को विस्थापित होना पड़ा था।
इकॉनोमिक्स टॉइम्स की 'लीगल वर्ल्ड' वेबसाइट के मुताबिक इसी दौरान भारत में हजारों की संख्या में म्यांमारवासी भागकर मिजोरम, मणिपुर व अन्य राज्यों में शरण लेने लगे। फिर मार्च 2021 में गृह मंत्रालय ने नागालैंड, मणिपुर, मिजोरम और अरुणाचल प्रदेश के मुख्य सचिवों को पत्र लिखकर 'म्यांमार से भारत में अवैध घुसपैठ को रोकने के लिए कानून के अनुसार उचित कार्रवाई करने' के लिए कहा था। तब कहा गया है कि राज्य सरकारों के पास किसी भी 'विदेशी' को 'शरणार्थी' का दर्जा देने की कोई शक्ति नहीं है, क्योंकि भारत 1951 के संयुक्त राष्ट्र शरणार्थी सम्मेलन और इसके 1967 प्रोटोकॉल का हस्ताक्षरकर्ता नहीं है।
अवैध प्रवासियों की चार जिलों में 41 बस्तियां
इस बीच, मणिपुर मंत्रिमंडल की एक उप-समिति की रिपोर्ट सामने आ गयी। जिसके अनुसार म्यांमार से आये 2,187 अवैध घुसपैठियों ने राज्य के चार जिलों में 41 स्थानों पर बस्तियां बसा दी है। उप-समिति का नेतृत्व जनजातीय मामलों और पहाड़ी विकास मंत्री लेटपाओ हाओकिप के अधीन है।
रिपोर्ट में कहा गया है कि सबसे अधिक 1,147 घुसपैठिये तेंगनौपाल में रह रहे है। इसके बाद चंदेल में 881, चुराचांदपुर में 154 और कामजोंग में भी बाकी मौजूद है। खबरों के मुताबिक 3 मई 2023 को जातीय हिंसा भड़कने से पहले, मणिपुर सरकार ने म्यांमार से आये घुसपैठियों की पहचान करने का फैसला किया था, जिन्होंने पहले राज्य में शरण मांगी थी।
इस पहचान अभियान के दौरान, म्यांमार से आये घुसपैठियों की बस्तियों को हटाकर उन्हें राज्य सरकार ने आश्रय गृह में स्थानांतरित करने का सुझाव दिया था। मगर इन अवैध आप्रवासियों ने इस प्रस्ताव पर अपनी आपत्ति जताई थी। हाल ही में भड़की हिंसा के पीछे यह भी एक कारण बताया जा रहा है।
कुकी समुदाय का आरोप
कुकी सिविल सोसाइटी संगठन (सीएसओ) बीते कुछ सालों से आरोप लगा रहे है कि मणिपुर सरकार अवैध अप्रवासियों की पहचान करने के नाम पर भारतीय नागरिकों को भी परेशान कर रही है। उनका कहना है कि वे दशकों से मणिपुर की ऊपरी पहाड़ी इलाकों में रह रहे है। यहां तक कि उन्होंने अंग्रेजों के खिलाफ लड़ाईयां भी लड़ी थीं। जिसे एंग्लो-कुकी युद्ध (1917-1919) के रूप में जाना जाता है।












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