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China Iran Relations: ईरान और चीन के मजबूत होते रिश्ते, जानें भारत पर क्या होगा असर

कुछ दिनों पहले, ईरान के राष्ट्रपति इब्राहिम रईसी ने तीन दिवसीय बीजिंग दौरा किया। इस दौरे ने ईरान और चीन के संबंधों को जितना मजबूत किया उतनी ही भारत के लिए कूटनीतिक उलझन पैदा कर दी है।

what will impact strengthening relationship between Iran and China on India?

China Iran Relations: हाल ही में, चीन के राष्ट्रपति शी जीनपिंग के निमंत्रण पर ईरान के राष्ट्रपति इब्राहिम रईसी बीजिंग के तीन दिवसीय दौरे पर थे। बीते 23 सालों में किसी ईरानी राष्ट्रपति का यह पहला चीनी राजकीय दौरा था। दरअसल, साल 2000 में मोहम्मद खातमी (1997-2005) चीन गए थे। इसके बाद, राष्ट्रपति महमूद अहमदीनेजाद (2005-2013) और हसन रूहानी (2013-2021) ने चीन का दौरा किया, लेकिन वह राजकीय न होकर बस अंतरराष्ट्रीय शिखर सम्मेलन अथवा खेल आयोजन में हिस्सा लेने तक सीमित था।

वहीं, राष्ट्रपति शी जीनपिंग साल 2016 में मध्य पूर्व के देशों की यात्रा के दौरान ईरान जा चुके हैं। दोनों राष्ट्राध्यक्षों की सितम्बर 2021 में उजबेकिस्तान के समरकंद में शंघाई कोऑपरेशन आर्गेनाईजेशन की बैठक में भी मुलाकात हो चुकी है।

चीन यात्रा पर जाने से पहले राष्ट्रपति रईसी ने बीजिंग के सरकारी समाचार पत्र में एक लेख लिखा था। इस लेख में उन्होंने दोनों देशों को तानाशाही व्यवस्था और एकपक्षवाद के खिलाफ बताया। साथ ही, लेख में इस बात पर बल दिया गया है कि इस्लामी गणराज्य ईरान दुनिया के सभी देशों के साथ विशेषकर चीन जैसे मित्र देशों के साथ मजबूत संबंध चाहता है।

गौरतलब है कि ईरान और चीन के बीच राजनयिक संबंध 55 साल पुराने है। अक्टूबर 1971 में फारसी साम्राज्य के 2500 वर्ष पूर्ण होने के उपलक्ष्य में आयोजित समारोह में चीन को भी आमंत्रित किया गया था। 1979 में ईरान की इस्लामिक क्रांति से पहले चीन की कम्युनिस्ट पार्टी के शीर्ष नेता हुआ गुओफेंग ने शाह रजा पहलवी के शासनकाल में ईरान का दौरा भी किया था। ईरान में जब इस्लामिक क्रांति के बाद नयी सरकार बनी तो चीन ने उसे शीघ्र ही मान्यता दे दी थी। अब इन संबंधों को वैश्विक रूप में एक नये तरीके से देखा जाने लगा है।

ईरानी राष्ट्रपति के दौरें की खास बातें

चीन की अपनी पहली यात्रा के दौरान राष्ट्रपति रईसी के साथ ईरान के केंद्रीय बैंक के गवर्नर सहित छह केंद्रीय मंत्रियों का एक दल भी शामिल था। जिनका आर्थिक, पेट्रोलियम, विदेशी मामले, व्यापार, ट्रांसपोर्ट, शहरी विकास और खेती से सरोकार था।

इसके अलावा, चीनी राष्ट्रपति ने ईरान के न्यूक्लियर प्रोग्राम के जल्दी और उचित समाधान का भी वादा किया है। अब चीन इस मामले में ईरान की पूरी मदद करने के लिए तैयार है। गौरतलब है कि ईरान को न्यूक्लियर हथियार बनाने के लिए यूरेनियम की जरुरत है लेकिन अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों के चलते वह ऐसा करने में असमर्थ है। यहीं नहीं, अमेरिका ने ईरान के न्यूक्लियर प्रोग्राम के चलते ईरान के तेल एवं पेट्रोलियम व्यापार पर भी प्रतिबंध लगाए हुए हैं।

अपने परमाणु प्रोग्राम को फिर से शुरू करने के अलावा ईरान की अपेक्षा है कि चीन उसे बीजिंग शंघाई सहयोग संगठन यानी एससीओ (Shanghai Cooperation Organisation) का सदस्य बनाने में मदद करे। पिछले साल इस संदर्भ में ईरान ने एक मेमोरेंडम पर भी हस्ताक्षर किये है। ईरान अभी इस संगठन की बैठकों में ऑब्जर्वर के नाते शिरकत करता है। एससीओ के अलावा, ईरान ने चीन से उसे ब्रिक्स में भी सदस्य देश के नाते शामिल करवाने की गुहार लगाई है।

चीन की बीआरआई योजना

चीन की अतिमहत्वाकांक्षी योजना बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव परियोजना (बीआरआई) 2013 में शुरू की गयी थी। इस परियोजना के माध्यम से चीन खुद को सड़क, रेल एवं जलमार्गों के माध्यम से यूरोप, अफ्रीका और मध्य एशिया से जोड़ रहा है। गौरतलब है कि बीआरआई योजना विश्व की 70 प्रतिशत जनसंख्या तथा 72 प्रतिशत ज्ञात ऊर्जा भंडारों को चीन से सीधे जोड़ देगी। बीआरआई के तहत दो मार्गों का निर्माण किया गया है। पहला, न्यू सिल्क रोड इकोनोमिक बेल्ट और दूसरा मैरीटाइम सिल्क रोड है। ईरान अपनी भौगोलिक अवस्थिति की वजह से इस परियोजना के लिए चीन के लिए महत्वपूर्ण हो जाता है। राष्ट्रपति रईसी ने अपने चीनी दौरे में इस बीआरआई योजना का ईरान में स्वागत किया।

बीआरआई के तहत ईरान को इनर मंगोलिया से जोड़ने वाली रेलवे की माल ढुलाई सेवाओं की घोषणा की जा चुकी है। अब इस बीआरआई ढांचे के अंतर्गत चीन ने ईरान के साथ 25 सालों के सहयोग हेतु एक समझौता किया है। समझौते पर 27 मार्च 2021 को चीन के विदेश मंत्री वांग यी और ईरान के विदेश मंत्री मोहम्मद जवाद जरीफ ने हस्ताक्षर किये। समझौते को आजतक सार्वजनिक नहीं किया गया लेकिन इसके एक ड्राफ्ट के मुताबिक ईरान में 400 बिलियन अमेरिकी डॉलर का निवेश बीआरआई परियोजना के तहत किया जायेगा। चीन केवल तेल और ऊर्जा में ही नहीं बल्कि अन्य क्षेत्रो में भी निवेश करेगा।

एक प्रमुख आर्थिक सहयोगी बना ईरान

अमेरिका द्वारा ईरान पर आर्थिक प्रतिबंध लगाए जाने के बाद चीन इस देश का सबसे बड़ा आर्थिक सहयोगी बन रहा है। एक प्रकार से ईरान अब चीन पर बहुत हद तक निर्भर हो चुका है। अब चीन, ईरान का सबसे बड़ा तेल खरीदने वाला देश बन गया है। आर्थिक प्रतिबंधों के चलते ईरान में महंगाई बढ़ने और विकास दर गिरने लगी थी। ऐसे में चीन ने ईरान का साथ दिया और साल 2022 में दोनों देशो के बीच साल 2022 में $15.8 बिलियन का व्यापार हुआ था। यह संख्या साल 2021 में हुए कुल व्यापार से सात गुना अधिक थी। यह आंकड़ें चीन के कस्टम प्रशासन द्वारा जारी किये गए थे।

हालांकि, इस व्यापारिक लेनदेन में तेल की खरीददारी शामिल नहीं है। दरअसल, ईरान पर आर्थिक प्रतिबंधों के चलते चीन सीधे ईरानी तेल नहीं खरीद रहा है। अमेरिका चाहता है कि ईरान का कुल तेल निर्यात जीरो हो जाए। मगर चीन ईरानी तेल को चीन रीब्रैंड कर मलेशिया और यूनाइटेड अरब अमीरात के माध्यम से खरीद रहा है। यूनाइटेड अगेंस्ट न्यूक्लियर ईरान वेबसाइट के मुताबिक जब से जो बिडेन अमेरिका के राष्ट्रपति बने है तब से जनवरी 2023 तक चीन ने ईरान से लगभग $47 बिलियन तेल खरीद लिया है।

चाबहार में भारत बनाम चीन

चाबहार पोर्ट दक्षिण-पूर्व ईरान के सिस्तान-बलूचिस्तान प्रांत में स्थित है। चाबहार में दो अलग अलग बंदरगाह शामिल हैं जिन्हें शाहिद कलंतरि और शाहिद बहिश्ती के नाम से जाना जाता हैं। गौरतलब है कि चाबहार और पाकिस्तान के ग्वादर पोर्ट के बीच लगभग 170 किलोमीटर यानी 92.98 नौटिकल माइल्स की दूरी है। फिलहाल ग्वादर पूरी तरह से चीन के कब्जे में है।

चाबहार बंदरगाह, हिन्द महासागर के मुहाने पर स्थित और ओमान की खाड़ी से एकदम सटा हुआ है। यहां से न सिर्फ ईरान, बल्कि अफगानिस्तान और पाकिस्तान सहित मध्य एशिया के लैंडलोक देशों जैसे तुर्कमेनिस्तान और उज्बेकिस्तान तक भी पहुंच संभव है। गौरतलब है कि अमेरिकी प्रतिबंधों से इस बंदरगाह को अलग रखा गया है।

भारत और ईरान के बीच चाबहार बंदरगाह को विकसित करने की योजना साल 2003 में बनी। मगर संयुक्त राष्ट्र संघ के ईरान पर लगाये प्रतिबंधों के चलते योजना में कोई खास प्रगति नहीं हुई। हालांकि, इस योजना को मुख्य आकर्षण तब मिला जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ईरानी राष्ट्रपति हसन रूहानी से वादा किया कि भारत इस बंदरगाह को विकसित करने में $500 मिलियन का निवेश करेगा। वास्तव में, भारत का यह कदम चीन द्वारा साल 2013 में घोषित बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव परियोजना (बीआरआई) के खिलाफ एक कूटनीतिक कदम था।

फिलहाल, चाबहार बंदरगाह के एक हिस्से शाहिद बहिश्ती का ऑपरेटिंग दायित्व भारत के पास साल 2018 में ही आ गया था। अगस्त 2022 में केंद्रीय पत्तन, पोत परिवहन और जलमार्ग एवं आयुष मंत्री सर्बानंद सोनोवाल शाहिद बहिश्ती बंदरगाह के विकास की प्रगति की समीक्षा करने के लिए दौरा भी कर चुके है। भारत की अगली योजना अब बंदरगाह को मुंबई से जोड़ने की है। जिससे सड़क के रास्ते चाबहार से भारत कैस्पियन सागर स्थित एक और ईरानी बंदरगाह, बंदर-ए-अंजली से जुड़ जायेगा। फिर जहाज के रास्ते बंदर-ए-अंजली से रूस में स्थित अस्तराखान बंदरगाह तक भारत की पहुंच हो जाएगी। उसके बाद, अस्तराखान से रूस के अन्य क्षेत्रों और आगे रूसी रेलवे से यूरोप तक माल की आवाजाही संभव हो सकेगी।

इस बीच, प्रतिबंधों के बाद से ईरान सरकार ने इस बंदरगाह के लिए अन्य विकल्प तलाशने शुरू कर दिए हैं। दक्षिण-पश्चिमी ईरान में सिस्तान-बलूचिस्तान प्रांत के बंदरगाहों और समुद्री विभाग के महानिदेशक, बेहरोज अघाई ने तेहरान टाइम्स को दिए एक साक्षात्कार कहा कि "चाबहार बंदरगाह के विकास में चीन का योगदान इस बंदरगाह को एक बड़े व्यापारिक केंद्र के रूप में स्थापित करने में मदद करेगा क्योंकि चीन वर्तमान में समुद्री और बंदरगाह उद्योगों के मामले में दुनिया के सबसे उन्नत देशों में से एक है।"

दरअसल, भारत वर्तमान में इस बंदरगाह में एक ऑपरेटर के रूप में ईरान के साथ काम कर रहा है और इस बंदरगाह के किसी भी हिस्से पर भारत का विशेष अधिकार नहीं है। जबकि चीन के साथ बढ़ते व्यापारिक एवं कूटनीतिक ईरानी रिश्तों का सीधा असर इस क्षेत्र में भारत के खिलाफ जाने की संभावना है। ईरान पहले ही ग्वादर को चाबहार से जोड़ने का एक प्रस्ताव चीन को दे चुका है।

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