India and UNSC: क्या होती है सुरक्षा परिषद की स्थाई सदस्यता, भारत को क्यों नहीं मिली वीटो पॉवर
अमेरिका, फ्रांस, रूस, ब्रिटेन के समर्थन के बावजूद भी संयुक्त राष्ट्र संघ की सुरक्षा परिषद का स्थायी सदस्य बनने में भारत अब तक नाकाम रहा है।

13 मार्च 2023 को ब्रिटेन ने अपनी रक्षा और विदेश नीति समीक्षा रिपोर्ट संसद में पेश की। 'इंटीग्रेटेड रिव्यू रिफ्रेश 2023: रिस्पॉन्डिंग टू ए मोर कंटेस्टेड एंड वोलेटाइल वर्ल्ड' नाम की इस रिपोर्ट में ब्रिटेन सरकार ने भारत को सुरक्षा परिषद में स्थाई सदस्य बनाए जाने का समर्थन किया है। इससे पहले भी ब्रिटिश सरकार की संयुक्त राष्ट्र संघ में स्थाई राजदूत बारबरा वुडवर्ड ने कहा था कि "हम भारत का सुरक्षा परिषद में स्थायी सीट का समर्थन करते हैं।"
गौरतलब है कि ब्रिटेन, संयुक्त राष्ट्र संघ की सुरक्षा परिषद का स्थाई सदस्य है। इसके अलावा, स्थाई सदस्यों में शामिल अमेरिका, रूस और फ्रांस भी कई मौकों पर भारत की स्थायी सदस्यता का समर्थन कर चुके हैं। लेकिन पांचवे स्थायी सदस्य चीन ने अभी तक भारत को अपना समर्थन देने का कोई सार्वजनिक बयान नहीं दिया है।
सितंबर, 2022 में 77वें संयुक्त राष्ट्र महासभा को संबोधित करते हुए रूस के विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव ने कहा था कि भारत को परिषद में स्थायी सदस्यता के लिए शामिल किया जाना चाहिए। वहीं 18 नवंबर 2022 को फ्रांस की उप प्रतिनिधि नथाली ब्रॉडहर्स्ट एस्टीवल ने संयुक्त राष्ट्र में सुरक्षा परिषद में सुधार पर सालाना बहस के दौरान कहा कि फ्रांस स्थायी सीट के लिए भारत की उम्मीदवारी का समर्थन करता है।
साल 2021 में जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अमेरिका के दौरे पर थे, तब राष्ट्रपति जो बाइ़डेन ने सुरक्षा परिषद में स्थायी सीट पर भारत की दावेदारी की वकालत की थी। सितंबर 2022 में भी अमेरिकी राष्ट्रपति ने संयुक्त राष्ट्र में सुधार की वकालत करते हुए स्थायी सीट के लिए भारत की दावेदारी का पूरा समर्थन किया था।
क्या है स्थाई सदस्यता और वीटो पॉवर
द्वितीय विश्व युद्ध के बाद दुनियाभर में शांति एवं सुरक्षा कायम करने के मकसद से संयुक्त राष्ट्र संघ की कल्पना की गयी। इसके लिए एक चार्टर तैयार किया गया, जिसपर 26 जून 1945 को भारत सहित 50 देशों के प्रतिनिधियों ने हस्ताक्षर किये। वहीं पोलैंड ने 15 अक्टूबर 1945 को हस्ताक्षर किये। इस तरह संयुक्त राष्ट्र संघ के भारत सहित 51 संस्थापक सदस्य बने और 24 अक्टूबर 1945 को इसकी स्थापना की गयी।
इस चार्टर के अनुसार संयुक्त राष्ट्र संघ के छह प्रमुख अंगों का गठन किया गया, संयुक्त राष्ट्र सचिवालय, संयुक्त राष्ट्र जनरल एसेंबली (UNGA), अंतरराष्ट्रीय न्यायालय, संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC), संयुक्त राष्ट्र इकोनॉमिक एंड सोशल काउंसिल, और संयुक्त राष्ट्र ट्रस्टीशिप काउंसिल।
संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC), संयुक्त राष्ट्र की एक प्रभावशाली संस्था है और इसके कुल 15 सदस्य होते हैं। इसमें पांच स्थाई सदस्य - फ्रांस, रूस, अमेरिका, यूनाइटेड किंगडम और चीन शामिल हैं। इन्हें वीटो पॉवर दिया गया है। जबकि 10 सदस्य देशों को रोटेशन के तौर पर दो-दो सालों के लिए अस्थायी सदस्यता दी जाती है।
अगर सुरक्षा परिषद में कोई प्रस्ताव आता है और अगर कोई एक स्थायी सदस्य देश उससे सहमत नहीं होता तो वह प्रस्ताव पारित नहीं होगा या अमल में नहीं आ पायेगा। यानि किसी भी प्रस्ताव को सुरक्षा परिषद की मंजूरी लेनी है तो उसके पांचों स्थायी सदस्यों की सर्वसम्मत्ति जरूरी है। कोई एक स्थायी सदस्य भी विरोध करते हुए उसके खिलाफ वोट करेगा तो वह वीटो कहलाता है।
संयुक्त राष्ट्र संघ सुरक्षा परिषद में इसके स्थायी सदस्य किसी प्रस्ताव को रोक सकते हैं या सीमित कर सकते हैं। बता दें कि इसी वीटो पावर की वजह से चीन कई बार संयुक्त राष्ट्र में पाकिस्तान के आंतकियों को ग्लोबल टेररिस्ट घोषित करने से रोकता रहा है। साथ ही जिसके पास वीटो होता है उस देश के खिलाफ कोई ग्लोबल नीति पास नहीं हो पाती है। ऐसा रूस-यूक्रेन जंग के बाद रूस को लेकर देखने को मिला।
भारत रह चुका है अस्थायी सदस्य
सुरक्षा परिषद के गठन के समय तब कुल 6 अस्थायी सदस्य होते थे लेकिन 1965 में इसका विस्तार कर इनकी संख्या 10 की गयी। तब से लेकर अबतक भारत कुल 8 बार सुरक्षा परिषद का अस्थायी सदस्य रह चुका है।
इसके लिए हुए चुनावों में भारत को साल 1950-51 में 58 वोट में से 56 वोट मिले थे। साल 1967-68 में 119 वोट में से 82 वोट मिले थे। साल 1972-73 में 116 वोट में से 107 वोट मिले थे। साल 1977-78 में 138 वोट में से 132 वोट मिले थे। साल 1984-85 में 155 वोट में 142 वोट मिले थे। साल 1991-92 में 154 वोट में से 141 वोट मिले थे। साल 2011-12 में से 191 वोट में से 187 वोट मिले थे। साल 2021-22 में 192 वोट में से 184 वोट मिले थे।
भारत को स्थायी सदस्यता क्यों नहीं मिली
संयुक्त राष्ट्र में सुरक्षा परिषद का गठन यूएन चार्टर के तहत किया गया था। इसमें पांच देशों को स्थायी सदस्यता मिली थी। अब चार्टर में बिना संशोधन के कोई बदलाव या कोई नया सदस्य नहीं बन सकता है। जबकि भारत को स्थायी सदस्यता के लिए पांचों देशों की सहमति जरूरी है। अगर कोई देश भारत के लिए प्रस्ताव रखता है और चार देश पक्ष में है और एक देश भी प्रस्ताव के खिलाफ वोट कर देता है तो प्रस्ताव गिर जायेगा। इन्हीं शर्तों की वजह से भारत को यूएनएससी में स्थायी सदस्यता नहीं मिल पा रही है, क्योंकि पहले चीन भारत को स्थायी सदस्य बनाने का विरोध कर रहा है।
जब गरजे थे पीएम मोदी
सितंबर 2022 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने संयुक्त राष्ट्र महासभा के 75वें सत्र को संबोधित किया था। तब पीएम मोदी ने यूएनएसी की स्थायी सदस्यता के लिए भारत की दावेदारी को पुरजोर तरीके से उठाया। उन्होंने कहा था कि "भारत के लोग संयुक्त राष्ट्र के रिफॉर्म्स को लेकर जो प्रोसेस चल रहा है उसके पूरा होने का बहुत लंबे समय से इंतजार कर रहे है। आज भारत के लोग चिंतित हैं कि क्या यह प्रोसेस कभी एक लॉजिकल एंड पर पहुंच पाएगा। आखिर कब तक भारत को संयुक्त राष्ट्र के डिसिजन मेकिंग स्ट्रक्चर से अलग रखा जाएगा? आखिर कब तक इंतजार करना पड़ेगा।"
बदलाव की पहली कोशिश
1997 में संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के अध्यक्ष रजाली इस्माइल (मलेशिया) ने एक प्रस्ताव पेश किया कि सुरक्षा परिषद के स्थाई सदस्यों की संख्या पांच से बढ़ाकर 10 और अस्थाई सदस्यों की संख्या 10 से बढ़ाकर 14 कर देनी चाहिए। इस प्रकार सुरक्षा परिषद् के कुल सदस्यों की संख्या 15 से 24 किया जाने का उन्होंने समर्थन दिया था।
स्थाई सदस्यों के लिए रजाली इस्माइल ने किसी देश का सीधे तौर पर नाम नहीं लिया। उन्होंने बस इतना ही कहा कि अफ्रीका, एशिया, लैटिन अमेरिका या कैरिबियन में से एक-एक और दो सदस्य औद्योगिक देशों (industrialised States) से शामिल किये जा सकते हैं।
न्यूयॉर्क टाइम्स के अनुसार तब यह अनुमान लगाया गया था कि औद्योगिक देशों की सीटें जर्मनी और जापान को चली जायेगी। बाकि की तीन सीटों में मैक्सिको, ब्राजील और अर्जेंटीना को लैटिन अमेरिका से, एशिया से भारत, पाकिस्तान और इंडोनेशिया और अफ्रीका से नाइजीरिया, इजिप्ट और दक्षिण अफ्रीका की दावेदारी मजूबत रहेगी। हालांकि, इस प्रस्ताव से पहले से मौजूद एक भी स्थायी सदस्य खुश नहीं था।
कोफी अन्नान भी थे बदलाव के पक्ष में
संयुक्त राष्ट्र संघ के महासचिव रहते हुए कोफी अन्नान ने साल 2005 में एक रिपोर्ट पेश की. जिसके अनुसार उन्होंने सुरक्षा परिषद में बदलाव के कई रास्ते सुझाए। उनका पहला सुझाव था कि अफ्रीका से दो और एशिया से दो, यूरोप से एक और दक्षिण एवं उत्तरी अमेरिका से एक सदस्य स्थाई बनाया जा सकता है। इस प्रकार कुल छह नये सदस्य जोड़े जा सकते हैं।
जबकि दूसरा उनका मॉडल था कि स्थाई सदस्यता ही समाप्त कर देनी चाहिए और उसके स्थान पर आठ देशों की एक नयी कैटगरी बनायी जा सकती है। यह सभी देश चार साल के लिए रोटेशन के तौर पर सदस्य बनेंगे। लेकिन उनके प्रस्ताव से भी स्थायी सदस्य खुश नहीं थे।












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