क्या है OPEC और कैसे यह दुनियाभर में तेल की कीमतों को करता है प्रभावित?
सऊदी अरब, इराक और कुवैत समेत कई देशों ने अचानक तेल उत्पादन में कटौती की घोषणा की है। इसके बाद दुनियाभर के तेल आयातक देशों में उथल-पुथल मच गयी है।

सऊदी अरब और पेट्रोलियम निर्यातक देशों के संगठन ने प्रतिदिन लगभग 1.16 मिलियन बैरल की उत्पादन में कटौती की घोषणा की है। इस फैसले के बाद तेल की कीमतों को लेकर दुनियाभर के देशों की चिंता बढ़ गई है। सऊदी अरब ने कहा कि वह मई से 2023 के अंत तक उत्पादन में प्रति दिन 5 लाख बैरल प्रतिदिन की कटौती करेगा। इराक 2 लाख 11 हजार बैरल प्रतिदिन की कटौती करेगा। इसके अलावा संयुक्त अरब अमीरात, ओमान, कुवैत और अल्जीरिया भी उत्पादन कम करने जा रहे हैं।
इस मामले पर वाशिंगटन पोस्ट की एक रिपोर्ट कहती है कि यह कदम अधिकांश देशों के लिए आश्चर्यजनक है क्योंकि 'ओपेक' प्लस ने कहा कि उनकी नीतियों में कोई बदलाव करने का इरादा नहीं था, लेकिन अचानक से की गई इस घोषणा ने दुनियाभर के तेल आयातक देशों में उथल-पुथल मचा हुआ है। भारत में इसे लेकर चिंताएं बढ़ गई हैं। तेल उत्पादन में यह कटौती ओपेक प्लस के सदस्य देशों ने की है।
दुनियाभर में कुल कच्चे तेल का 40 प्रतिशत उत्पादन ओपेक समूह देशों में ही होता है। सऊदी अरब की अधिकारिक समाचार सेवा अरब न्यूज के मुताबिक सऊदी अरब ने एक बयान में कहा है कि यह कदम तेल बाजार की स्थिरता को ध्यान में रखते हुए एहतियातन उठाया जा रहा है। अब यहां सवाल उठता है कि आखिर यह ओपेक क्या है? इसका उद्देश्य क्या है और कैसे यह तेल की कीमतों को नियंत्रित कर सकता है?
क्या है ओपेक?
14 सितंबर 1960 में ईरान, इराक, कुवैत, सऊदी अरब और वेनेजुएला ने बगदाद में ओपेक की स्थापना की थी और बाद के सालों में इसका आकार बढ़ता घटता रहा। इसका गठन अपने सदस्यों की पेट्रोलियम नीतियों के समन्वय और सदस्य राज्यों को तकनीकी और आर्थिक सहायता प्रदान करने के लिए किया गया था।
ओपेक के फिलहाल कुल 14 देश ईरान, इराक, कुवैत, संयुक्त अरब अमीरात (यूएई), सऊदी अरब, अल्जीरिया, लीबिया, नाइजीरिया, गैबॉन, इक्वेटोरियल गिनी, कांगो गणराज्य, अंगोला, इक्वाडोर और वेनेजुएला सदस्य हैं।
इसी तरह 2016 में ओपेक ने ओपेक+ बनाने के लिए अन्य तेल उत्पादक देशों के साथ गठबंधन किया। ओपेक प्लस 10 देशों का गठबंधन है। जिसमें अजरबैजान, बहरीन, ब्रुनेई, कजाखस्तान, मलेशिया, मैक्सिको, ओमान, रूस, सूडान, दक्षिण सूडान शामिल है।
ओपेक का मुख्य उद्देश्य
ओपेक का मुख्य उद्देश्य है कि सभी सदस्य देशों के बीच पेट्रोलियम नीतियों का समन्वय और एकीकरण करना। साथ ही पेट्रोलियम उत्पादकों के लिए उचित और स्थिर मूल्य सुनिश्चित करना और उपभोक्ता देशों को पेट्रोलियम की नियमित आपूर्ति भी तय करना। ओपेक यह भी सुनिश्चित करता है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतें बिना किसी बड़े उतार-चढ़ाव के स्थिर रहे।
कैसे कीमतों को प्रभावित करता है ओपेक?
वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम के मुताबिक ओपेक के सदस्य देश दुनिया का लगभग 40 प्रतिशत तेल का उत्पादन करते हैं, और उनका निर्यात दुनियाभर के पेट्रोलियम व्यापार का लगभग 60 प्रतिशत है। साल 2021 में ओपेक ने अनुमान लगाया कि उसके सदस्य देशों के पास दुनिया के तेल भंडार का लगभग 80 प्रतिशत से अधिक हिस्सा है।
दुनियाभर के तेल बाजारों में ओपेक और ओपेक प्लस की बड़ी हिस्सेदारी है। इस वजह से ये वैश्विक कीमतों को सीधा प्रभावित करते हैं। वैश्विक बाजारों में सामूहिक रूप से कितना कच्चा तेल बेचना है, ये निर्णय करने के लिए ओपेक के सदस्य समय-समय पर नियमित रूप से मिलते रहते हैं। ओपेक का काम करने का तरीका ऐसा है कि जब बाजार में तेल की मांग घट जाती है तो वह तेल का उत्पादन कम करके बाजार में कीमतों को गिरने नहीं देता है। जबकि वह चाहे तो बाजार में ज्यादा तेल देकर या नियमित उत्पादन करके तेल की कीमतों को कम कर सकता है।
मतलब यह कह सकते हैं कि तेल बाजार पर ओपेक का सबसे शक्तिशाली उपकरण है 'तेल उत्पादन में कटौती'। जब ओपेक के सदस्य देशों को लगता है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें गिर रही हैं तो इस समूह के सभी देश अपने आवंटित तेल के कोटे में कमी कर देते हैं जिससे कि पूरे विश्व में तेल की आपूर्ति कम हो जाती है और तेल के दाम डिमांड के हिसाब से स्थिर रहेंगे या फिर से बढ़ने लगते हैं। इस तरह ओपेक तेल की कीमतों को प्रभावित करता है।
ये देश करेंगे बीपीडी (बैरल पर डे) में कटौती
यूएई ने कहा कि वह अपने उत्पादन में 144,000 बीपीडी की कटौती करेगा। वहीं कुवैत ने 128,000 बीपीडी की कटौती का ऐलान किया है। इसी तरह इराक ने घोषणा की है कि वह 211,000 बीपीडी की कटौती करेगा। ओमान 40,000 और अल्जीरिया अपने उत्पादन में 48,000 बीपीडी की कटौती करने की बात कही है।
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