No Confidence Motion: क्या होता है अविश्वास प्रस्ताव, जानें इससे जुड़े नियम
No Confidence Motion: कांग्रेस समेत तमाम विपक्षी दलों ने मोदी सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव (नो कॉन्फिडेंस मोशन) लाने के लिए नोटिस दिया है। जिसे लोकसभा अध्यक्ष ओम बिड़ला ने मंजूरी भी दे दी है। इस अविश्वास प्रस्ताव पर अगले सप्ताह चर्चा होने की उम्मीद जताई गयी है।
दरअसल मणिपुर हिंसा मामले को लेकर 26 दलों के विपक्षी गठबंधन 'इंडिया' की ओर से अविश्वास प्रस्ताव पेश किया है। वैसे अब तक भारतीय राजनीति के इतिहास में 27 बार केंद्र सरकार के खिलाफ संसद में अविश्वास प्रस्ताव लाया जा चुका है। जबकि पीएम नरेंद्र मोदी के खिलाफ केवल एक बार अविश्वास प्रस्ताव जुलाई 2018 में आया था। तब मोदी सरकार ने आसानी से अपना बहुमत साबित कर दिया था।

क्या होता है अविश्वास प्रस्ताव?
जब लोकसभा में विपक्ष के किसी दल को लगता है कि केंद्र सरकार अल्पमत में आ गयी है या फिर सरकार सदन में अपना विश्वास खो चुकी है। तब ऐसी स्थिति में विपक्षी दल, लोकसभा स्पीकर से अविश्वास प्रस्ताव लाने की मांग करते हैं। संविधान में इसका उल्लेख अनुच्छेद 75 में किया गया है। इसके अनुसार केंद्रीय मंत्रिपरिषद लोकसभा के प्रति जवाबदेह है। अगर सदन में बहुमत नहीं है तो प्रधानमंत्री समेत पूरी मंत्रिपरिषद को इस्तीफा देना पड़ता है।
कैसे लाया जाता है अविश्वास प्रस्ताव?
लोकसभा के कानूनी नियमों की प्रक्रिया तथा कार्य संचालन नियमावाली के नियम 198(1) से 198(5) तक में अविश्वास प्रस्ताव कैसे लाया जाता है, इस बारे में पूरी स्पष्ट जानकारी दी गयी है। देश के संविधान में अविश्वास प्रस्ताव या विश्वास प्रस्ताव के लिए कोई विशेष धारा या आर्टिकल नहीं है।
लोकसभा की नियमावली के अनुसार अविश्वास प्रस्ताव लाने की प्रक्रिया
- नियम 198 (1)(ए) के मुताबिक लोकसभा अध्यक्ष अविश्वास प्रस्ताव रखने की अनुमति देने के लिए सदस्यों को बुला सकते हैं।
- नियम 198 (1)(बी) के मुताबिक विपक्षी सदस्यों को प्रस्ताव की लिखित सूचना सुबह 10 बजे तक लोकसभा सचिव को देनी होती है। अगर वह 10 बजे तक नोटिस नहीं देते हैं तो उन्हें अगले दिन 10 बजे तक अपना प्रस्ताव जमा करना होगा।
- नियम 198 (2) के तहत लोकसभा स्पीकर के प्रस्ताव पढ़ने के बाद अविश्वास लाने वाले सदस्यों को अपने स्थान पर खड़े होने को कहा जाता है। अविश्वास प्रस्ताव के पक्ष में कम से कम 50 सदस्यों का समर्थन हासिल होना चाहिए, वरना स्पीकर इसकी अनुमति नहीं देते। अगर प्रस्ताव को 50 सदस्यों का समर्थन हासिल है तो अध्यक्ष प्रस्ताव को स्वीकृत घोषित कर देते हैं। वहीं प्रस्ताव प्रस्तुत करने के 10 दिन के भीतर ही इस पर विचार किया जाता है।
- नियम 198 (3) के मुताबिक अनुमति मिलने के बाद लोकसभा अध्यक्ष प्रस्ताव पर चर्चा के लिए दिन का कोई एक हिस्सा, पूरा दिन या कुछ दिनों की अनुमति दे सकते है।
- नियम 198 (4) के मुताबिक अविश्वास प्रस्ताव पर चर्चा के अंतिम दिन स्पीकर वोटिंग कराते हैं और उसी आधार पर फैसला किया जाता है।
- नियम 198 (5) के अनुसार अध्यक्ष अविश्वास प्रस्ताव पर चर्चा में शामिल होने वाले नेताओं के लिए समय-सीमा निर्धारित कर सकते है।
इस दौरान अगर सदन में अविश्वास प्रस्ताव पास हो जाता है, तब केंद्र सरकार के मंत्रिमंडल को अपना इस्तीफा देना पड़ता है।
वर्तमान में लोकसभा की स्थिति क्या है?
वर्तमान परिस्थिति में लोकसभा में मोदी सरकार बेहद मजबूत स्थिति में है। साथ ही आपको बता दें कि इसमें वोटिंग के लिये केवल लोकसभा के सांसद ही पात्र होते हैं। राज्यसभा के सांसद वोटिंग प्रक्रिया में भाग नहीं ले सकते।
लोकसभा में मोदी सरकार के पास तकरीबन 331 सांसद हैं। जिसमें अकेले बीजेपी के पास ही 303 सांसद हैं। वहीं विपक्षी दलों की ताकत देखें तो नवनिर्मित गठबंधन इंडिया के पास 144 सांसद हैं। जिसमें सबसे ज्यादा कांग्रेस के पास 50 हैं। वहीं डीएमके के पास 24, टीएमसी के पास 23, जेडीयू के पास 16 सांसद हैं। इन सबके बीच बीआरएस, वाईएसआरसीपी और बीजेडी जैसी 'तटस्थ' पार्टियों की संयुक्त ताकत 70 है।
मोदी सरकार के खिलाफ कितने अविश्वास प्रस्ताव?
यहां आपको बता दें कि ये मोदी सरकार के खिलाफ दूसरी बार अविश्वास प्रस्ताव लाया जा रहा है। इससे पहले जुलाई, 2018 में लाया गया था। तब सदन में 11 घंटों की लंबी बहस चली और मोदी सरकार ने सदन में अपना बहुमत साबित कर दिया था। अविश्वास प्रस्ताव के पक्ष में तब 126 वोट लोकसभा में पड़े थे जबकि विपक्ष में 325 वोट।
तब सदन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भविष्यवाणी करते हुए कहा था कि आपको मैं शुभकामनाएं देता हूं कि आप आने वाले चार-पांच सालों में इतनी मेहनत करें कि 2023 में आपको फिर से अविश्वास प्रस्ताव लाने का मौका मिले।












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