Albinism: क्या है ऐल्बिनिजम या त्वचा रंगहीनता, जानें इसके कारण
Albinism: ऐल्बिनिजम यानी रंगहीनता एक ऐसी दुर्लभ और अनुवांशिक स्थिति है जो जन्म के समय से ही होती है। यह संक्रामक नहीं है। यह किसी पीड़ित व्यक्ति से अन्य को नहीं फैलती है। इस रोग से पीड़ित व्यक्ति के शरीर में मिलेनिन का निर्माण या तो कम होता है या होता ही नहीं है। इस रोग से पीड़ित व्यक्ति के शरीर की त्वचा का रंग एकदम सफेद होने लगता है। भारत की बात करें तो देश में प्रतिवर्ष लगभग 100 से 1000 ऐल्बिनिजम के मामले दर्ज किए जाते हैं। कई मामलों में इस रोग का इलाज नहीं किया जा सकता क्योंकि इसके असली कारण अनुवांशिक गुण होते हैं।
लोगों को करना पड़ता है संघर्ष
रंगहीनता पर संयुक्त राष्ट्र संघ (UNO) की स्वतंत्र मानवाधिकार विशेषज्ञ मुलूका ऐन मिटि-ड्रमंड ने कहा कि इस बीमारी के साथ जीवन जीने वाले लोगों को गरिमामय जीवन व समानता हासिल करने के लिए व्यापक व कठिन संघर्ष करना पड़ता है। इस वर्ष यह दिवस 'समावेशन शक्ति है' की थीम के साथ मनाया गया। इसमें रंगहीनता वाले समुदाय के भीतर और बाहर की विविधता की महत्ता को रेखांकित किया गया।

संयुक्त राष्ट्र के अनुसार, वैसे रंगहीनता या अवर्णता की स्थिति अफ्रीका क्षेत्र में कुछ ज्यादा देखी गई है। वहां तंजानिया में सर्वाधिक 1400 लोगों में एक व्यक्ति इससे प्रभावित है। रंगहीनता से प्रभावित लगभग सभी लोग दृष्टि बाधित होते हैं और उन्हें त्वचा का कैंसर होने की भी बहुत सम्भावना होती है। उन्हें अपने त्वचा रंग के कारण, भेदभाव का भी सामना करना पड़ता है। जिसका मतलब है कि उन्हें अक्सर दृष्टिबाधिता के साथ त्वचा रंग के आधार पर अनेक तरह के अन्य भेदभावों का सामना करना पड़ता है।
एल्बिनिजम से पीड़ित व्यक्ति के साथ खाना खाने, उठने-बैठने, छूने या गले लगाने से दूसरे व्यक्ति को यह रोग नहीं लगता है। संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 18 दिसंबर 2014 को रंगहीनता के शिकार लोगों के साथ विश्व में होने वाले भेदभाव के विरुद्ध जागरूकता फैलाने के उद्देश्य से प्रतिवर्ष 13 जून को अंतरराष्ट्रीय रंगहीनता जागरूकता दिवस मनाने की घोषणा की थी। तब से यह दिन एल्बिनिजम के शिकार लोगों के लिए खास तौर पर मनाया जाता है।
भारत में जागरूकता की आवश्यकता
ऐल्बिनिजम या रंगहीनता से पीड़ित लोगों को सामाजिक तिरस्कार और भेदभाव का सामना करना पड़ता है। गोरी त्वचा के दीवाने देश में हम इस स्थिति वाले लोगों के लिए एक अनुचित प्रतिक्रिया देखते हैं। ऐल्बिनिजम एक अत्यंत दुर्लभ स्थिति है। भारत में अक्सर ऐसे व्यक्तियों को 'अंग्रेज' कहकर चिढ़ाया जाता है। एक ऐसे देश में जहां फेयरनेस क्रीम का विज्ञापन किया जाता है और सांवली या काली त्वचा से परहेज किया जाता है, वहां इस तरह की बीमारी का लोग मजाक बनाते हैं।
कैंसर का जोखिम अधिक
इसे ऐक्रोमिया, ऐक्रोमेसिया, या ऐक्रोमेटोसिस भी कहते हैं। संयुक्त राष्ट्र के अनुसार ऐल्बिनिजम यानी रंगहीनता से पीड़ित व्यक्तियों को त्वचा कैंसर का उच्च जोखिम होता है जो कम-से-कम 80 प्रतिशत मौतों के लिए जिम्मेदार है। यह जोखिम इतना अधिक है कि ऐल्बिनिजम से पीड़ित 98 प्रतिशत लोग 40 वर्ष की आयु से अधिक जीवित नहीं रहते हैं। यह अनुमान लगाया गया है कि उत्तरी अमेरिका और यूरोप में प्रत्येक 17,000 से 20,000 लोगों में से एक में किसी न किसी रूप में यह बीमारी देखने को मिलती है।
क्यों रंगहीन हो जाता है इंसान
आपकी जानकारी के लिए बता दें कि मेलेनिन हमारे शरीर में पाया जाने वाला ऐसा तत्व है, जिसकी वजह से त्वचा, बाल और आंखों का रंग निर्धारित होता है। शरीर में मेलेनिन जितना अधिक होगा, आंखों, बालों और त्वचा का रंग उतना ही गहरा होगा। इसकी कमी होने से आंखों, बाल या त्वचा का रंग सफेद, भूरा या हल्का लाल भी हो सकता है। एल्बिनिज्म के मरीजों के शरीर में मेलेनिन ठीक से बन नहीं पाता है। इसलिए उनकी त्वचा का रंग सफेद हो जाता है। भारत में ऐल्बिनिजम से पीड़ित लोगों की संख्या लगभग 1,00,000 है।












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