Indian Pharma: भारतीय दवा कारोबार पर अंतरराष्ट्रीय साजिश के बादल? डब्लूएचओ की भूमिका संदेहास्पद

पहले गाम्बिया, फिर उज्बेकिस्तान और अब अमेरिका – तीनों जगह भारतीय दवा कंपनियों पर दोष मढ़ा गया है। वहीं, वैश्विक दवा कारोबार में भारत की टक्कर अमेरिका और चीन जैसे देशों से हो रही हैं।

Suspicion of international conspiracy on Indian drug trade Questionable role of WHO

दिसंबर 2022 में उज्बेकिस्तान की सरकार और विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने आरोप लगाया था कि भारत में निर्मित कफ सिरप पीने से वहां 18 बच्चों की मौत हो गयी हैं। इस सिरप का नाम Doc-1 Max था। इस दवा का निर्माण नोएडा स्थित एक दवा कंपनी 'मैरियन बायोटेक' करती है। फिलहाल इन आरोपों के बाद भारत सरकार ने हस्तक्षेप कर कंपनी को उत्पादन करने से रोक दिया है।

यह मामला अभी खत्म ही नहीं हुआ कि एक और खबर अमेरिका से आई। खबर के मुताबिक भारतीय कंपनी की आईड्रॉप डालने से अमेरिका में लोग अंधे हो रहे हैं। इस मामले में अमेरिकी ड्रग प्रशासन (एफडीए) ने भारत में बने आईड्रॉप के इस्तेमाल से बचने को आगाह किया है। एफडीए के मुताबिक अमेरिका के एक दर्जन राज्यों में कम से कम 55 लोग इससे प्रभावित हुए हैं। इसके बाद चेन्नई स्थित कंपनी ने दवा का उत्पादन बंद कर दिया।

इससे पहले गाम्बिया में कई बच्चों का निधन किडनी की बीमारी (acute kidney injury - AKI) से निधन हुआ था। तब भी विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने कुछ भारतीय कंपनियों को इसका जिम्मेदार ठहराते हुए उनसे बचने के लिए कहा था। जबकि कई जांच रिपोर्ट्स के मुताबिक बच्चों का निधन भारतीय दवा से नहीं बल्कि E. coli (Escherichia Coli) नाम के एक वायरस से हुआ था। इसी वायरस के एक खतरनाक स्ट्रेन ने बच्चों में किडनी की जानलेवा बीमारी को पैदा किया। गाम्बिया सरकार ने अपनी खराब स्वास्थ्य सेवाओं को छुपाने के लिए सारा दोष भारतीय दवा कंपनियों पर डाल दिया।

दवाइयों में क्या जहर मिला है?
पहले गाम्बिया, फिर उज्बेकिस्तान और अब अमेरिका - तीनों जगह भारतीय कंपनियों पर दोष मढ़ा गया है। स्थानीय जांच के बाद उज्बेकिस्तान में जिन दवाओं से बच्चों का निधन हुआ उनमें Diethylene glycol (DEG) नाम का एक अवयव मिला है जोकि टोक्सिक होता है। गौरतलब है कि विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) की वेबसाइट पर आजतक इस Diethylene glycol को लेकर कोई एडवाइजरी जारी नहीं की गयी है।

मेडिकल जगत की प्रतिष्ठित वेबसाइट 'साइंस डायरेक्ट' के मुताबिक इस Diethylene glycol का कई देशों में दवाई बनाने में इस्तेमाल किया जाता है। इसका इस्तेमाल पैरासिटामोल जैसी दवाओं को बनाने में बहुत कॉमन है। हालांकि साइंस डायरेक्ट ने इसके इस्तेमाल करने पर कई बीमारियों के खतरे पर भी चेतावनी जताई है। गौरतलब है कि टोक्सिक होने के बाद भी इसके खरीदने और बेचने पर कोई अंतरराष्ट्रीय प्रतिबन्ध नहीं है। यह अमेरिका सहित दुनिया के किसी भी देश में खुलेआम आसानी से मिलता है।

भारतीय दवाओं का वैश्विक बोलबाला
भारत का फॉर्मास्यूटिकल सेक्टर वैश्विक स्तर पर तेजी से पकड़ बना रहा है। फिलहाल, भारत पूरी दुनिया में दवाओं का तीसरा सबसे बड़ा उत्पादनकर्ता देश है और जेनेरिक दवाओं का सबसे बड़ा विक्रेता। इसके अलावा, वैश्विक आपूर्ति में 20 प्रतिशत की हिस्सेदारी भारत की है। यही नहीं, भारत इस समय सबसे बड़ा वैक्सीन निर्माता देश भी है।

नेशनल इंवेस्टमेंट प्रमोशन एंड फैसिलिटेशन एजेंसी (NIPFA) के मुताबिक भारत का दवाओं से शुद्ध मुनाफा सालाना लगभग $3 बिलियन डॉलर का है। वहीं साल 2021-22 में कुल निर्यात $24.6 बिलियन डॉलर का था। जबकि 2024 तक यह $65 बिलियन और 2030 तक $130 बिलियन डॉलर का कारोबार हो जाएगा। वर्तमान दशक यानी 2020-2030 के बीच यह 11 से 12 प्रतिशत की अपेक्षित विकास दर को प्राप्त करेगा।

कोरोना महामारी के दौरान लगभग 98 देशों ने भारतीय वैक्सीन ली, जोकि भारत के फॉर्मा सेक्टर के लिए एक बूम था। चीन और अमेरिका जैसे देशों में दवाओं का सबसे ज्यादा निर्माण होता है और भारत इन देशों को जबरदस्त टक्कर दे रहा है।

डब्ल्यूएचओ और भारत के हित
इस वैश्विक टक्कर के बीच विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) की भूमिका महत्वपूर्ण है लेकिन कारोबार के मामलों में यह भारत के हित में नहीं हैं। एक ब्रिटिश न्यूज वेबसाइट UnHerd डॉट कॉम की एक रिपोर्ट छपी कि अपने हितों को साधने के लिए कई फार्मास्युटिकल कंपनियां विश्व स्वास्थ्य संगठन को फंड देती है। इसमें सबसे बड़ा नाम 2010 में शामिल हुआ बिल एंड मेलिंडा गेट्स फाउंडेशन।

समय के साथ बिल एंड मेलिंडा गेट्स का विश्व स्वास्थ्य संगठन पर प्रभाव जमना शुरू हो गया। अब फाउंडेशन, डब्ल्यूएचओ का इस्तेमाल अपने कार्यक्रमों (GAVI और CEPI) को बढ़ावा देने के लिए करता है, जिससे अमेरिकी दवा कंपनियों को काफी मुनाफा हुआ है।

गेट्स ने किया डब्ल्यूएचओ को हाईजैक
UnHerd ने अपनी रिपोर्ट में भारत में एक प्रमुख मानवाधिकार कार्यकर्ता वंदना शिवा का हवाला देते हुए लिखा कि बिल गेट्स ने डब्ल्यूएचओ को हाईजैक कर लिया है। जिसका उपयोग वह फार्मास्युटिकल मुनाफे को बढ़ाने के उद्देश्य के लिए करते है। इस बीच, एसेक्स विश्वविद्यालय में समाजशास्त्र की एक प्रोफेसर लिंसे मैकगोई ने अपनी पुस्तक 'No Such Thing as a Free Gift: The Gates Foundation and the Price of Philanthropy' में बताया है कि कैसे गेट्स ने दवा कंपनियों को फायदा पहुंचाने के लिए डब्ल्यूएचओ का इस्तेमाल किया।

डब्ल्यूएचओ को कई मिलियन देते हैं बिल गेट्स
वहीं डब्ल्यूएचओ के मुताबिक 2022-2023 के लिए वर्तमान स्वीकृत बजट $6.72 बिलियन डॉलर है। वहीं इसमें सबसे बड़ी भागीदारी बिल गेट्स के फाउंडेशन की है। संगठन के पास 80 प्रतिशत फंड वॉलेंटरी कंट्रीब्यूशन से आता है। यूरोन्यूज के मुताबिक इन वॉलेंटरी कंट्रीब्यूशन के तहत बिल एंड मेलिंडा गेट्स फाउंडेशन अकेले डब्ल्यूएचओ को 88 प्रतिशत से अधिक की मदद करता है। वहीं अन्य योगदानकर्ताओं में ब्लूमबर्ग फैमिली फाउंडेशन (3.5%), वेलकम ट्रस्ट (1.1%) और रॉकफेलर फाउंडेशन (0.8%) भी शामिल हैं।

ऐसे भी किया गया भारत को टारगेट
आपको बता दें कि साल 2009 में नाइजीरिया में चीन में बनी नकली पैरासिटामोल दवा पर मेड इन इंडिया का लेबल लगा दिया गया था और भारतीय दवा के नाम पर इसे खूब प्रचारित किया गया। जांच हुई तो नाइजीरिया की ड्रग एजेंसी NAFDAC ने खुद खुलासा किया वह नकली पैरासिटामोल चीन में बनी थी।

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