Shri Ram in Asia: विश्वव्यापी हैं राम! इन देशों के दिलों में भी बसते हैं राम
कण-कण में हैं राम, समाया जान सके तो जान... जन-जन के हैं राम विश्वव्यापी राम। राम लोगों के दिलों में बसते हैं, इसलिए उन्हें लोकनाथ कहा जाता है। इस भूलोक और संस्कृति दोनों में राम समाहित हैं। राम के प्रभाव का मूल है राम कथा। इसलिए कहते हैं राम से बड़ा राम का नाम। आज दुनियाभर में 300 से ज्यादा रामायण प्रचलित हैं।
भारत के अलावा कंबोडिया, इंडोनेशिया, नेपाल, भूटान, बांग्लादेश, चीन, मलेशिया, श्रीलंका, बाली, जावा, सुमात्रा, लाओस, कंपूचिया और थाईलैंड आदि देशों की लोक-संस्कृति व ग्रंथों में राम याद किए जाते हैं। वहां रामकथाएं होती और गाई जाती हैं। नृत्य नाटिकाओं में भी भगवान राम की कथा का मंचन बहुतायत में होता है।

सबके अपने-अपने राम और उनकी रामायण
पूरी दुनिया में राम और उनकी कथाएं लोकप्रिय है। जैसे- हरि अनंत हरिकथा अनंता। भारतीय साहित्यिक परंपरा के मुताबिक वाल्मीकि के रामायण को सबसे पुरानी रामायण कहा जाता है। इसे उपजिव्य काव्य भी मानते हैं। इसके बाद तुलसीदास के द्वारा लिखा गया रामचरितमानस को स्थान दिया गया है।
चीन की राम कथा
इंदिरा गांधी नेशनल सेंटर ऑफ ऑर्ट्स में छपे एक लेख के मुताबिक चीन में रामायण का एक अलग ही रूप है। चीनी साहित्य में राम कथा पर आधारित कोई मौलिक रचना तो नहीं हैं, लेकिन बौद्ध धर्म ग्रंथ त्रिपिटक के चीनी संस्करण में रामायण से संबद्ध दो रचनाएं मिलती हैं। 'अनामकं जातकम्' और 'दशरथ कथानम्'।
तीसरी शाताब्दी में चीनी भाषा में लिखी गई 'अनामकं जातकम्' का मूल भारतीय रामायण से मिलता जुलता है। जबकि 'दशरथ कथानम्' के अनुसार राजा दशरथ जंबू द्वीप के सम्राट थे और उनके पहले पुत्र का नाम लोमो (राम) था। दूसरी रानी के पुत्र का नाम लो-मन (लक्ष्मण) था। राजकुमार लोमो में ना-लो-येन (नारायण) का बल और पराक्रम था। उनमें 'सेन' और 'रा' नामक अलौकिक शक्ति थी तीसरी रानी के पुत्र का ना पो-लो-रो (भरत) और चौथी रानी के पुत्र का नाम शत्रुघ्न था।
तिब्बत की राम कथा
तिब्बत में रामकथा को 'किंरस-पुंस-पा' कहा जाता है। वहां के लोग प्राचीनकाल से वाल्मीकि रामायण की मुख्य कथा से परिचित थे। तिब्बती रामायण की छह प्रतियां तुन-हुआंग नामक स्थल से प्राप्त हुई है। उत्तर-पश्चिम चीन स्थित तुन-हुआंग पर 787 से 848 ई. तक तिब्बतियों का आधिपत्य था। ऐसा अनुमान किया जाता है कि उसी अवधि में इन गैर-बौद्ध परंपरावादी राम कथाओं का सृजन हुआ होगा।
मलेशिया की राम कथा
मलेशिया में रामकथा पर आधारित एक विस्तृत रचना है 'हिकायत सेरीराम'। दरअसल यहां के राम कथा की शुरुआत रावण के जन्म से होती है। मलेशिया को रावण के नाना के राज्य के रुप में माना गया है। वैसे तो मलेशिया का इस्लामीकरण 13वीं शताब्दी के आस-पास हुआ था। जबकि मलय रामायण की प्राचीनतम पांडुलिपि बोडलियन पुस्तकालय में 1633 ई. में जमा की गयी थी। इससे ज्ञात होता है कि मलयवासियों पर रामायण का इतना प्रभाव था कि इस्लामीकरण के बाद भी लोग उसका परित्याग नहीं कर सके। हालांकि, 'हिकायत सेरीराम' को किसने लिखा, इसका कोई पुख्ता सबूत नहीं है।
थाईलैंड की राम कथा
थाईलैंड में भगवान राम की कहानी रामायण को रामाकीन या रामाकियेन कहा जाता है। इसका अर्थ है राम की कीर्ति। यह ग्रंथ काफी हद तक वाल्मीकि रामायण के जैसा ही है, बस कुछ हिस्सों में इसका चित्रण अलग है। इसे थाईलैंड की संस्कृति के प्रमुख ग्रंथ का दर्जा हासिल है।
1238 ई. में स्वतंत्र थाई राष्ट्र की स्थापना हुई। उस समय उसका नाम स्याम था। 13वीं शताब्दी से वहां राम से जुड़ी कहानियों के अवशेष हैं। लेकिन, राम कथा पर आधारित सुविकसित साहित्य 18वीं शताब्दी में ही उपलब्ध होता है। राजा बोरोमकोत (1732-58 ई.) के शासन के दौरान राम कथा के पात्रों की रचना करवाने का उल्लेख मिलता है। इसके बाद जब तासकिन (1767-82ई.) थोनबुरी के सम्राट बने, तब उन्होंने थाई भाषा में रामायण को छंदोबद्ध किया, जिसके चार खंडों में 2012 पद थे। पुन: सम्राट राम प्रथम (1782-1809 ई.) ने अनेक कवियों के सहयोग से एक रामायण की रचना करवाई उसमें 50188 पद हैं। यही थाई भाषा का पूर्ण रामायण है।
इंडोनेशिया, कंबोडिया की राम कथा
इसी तरह कंबोडिया में भी श्रीराम का अपना अलग महत्व है। थाईलैंड की ही तरह कंबोडिया में भी रामायण का स्थानीय संस्करण है जिसे 'रिएमकार' कहते हैं। यहां भी बौद्ध और हिंदू धर्म के मिले-जुले अंश पाए जाते हैं।
जबकि दुनिया में सबसे ज्यादा मुस्लिम आबादी वाले देश इंडोनेशिया में भी रामायण का कई बार मंचन होता है। रामकथा पर आधारित इंडोनेशिया के जावा की प्राचीनतम कृति 'रामायण काकावीन' है। काकावीन की रचना कावी भाषा में हुई है। यह जावा की प्राचीन शास्त्रीय भाषा है। इस रामायण में देवी-देवताओं के नामों में कुछ बदलाव भी हैं। इनके अलावा वियतनाम, म्यांमार (बर्मा), लाओस, नेपाल, मलाया, श्रीलंका जैसे देशों में भी रामायण या राम से जुड़े कुछ न कुछ अंश वहां की सांस्कृतिक ग्रंथों और जातक कथाओं में मिलते हैं।
राम और उनकी कथा का दुनियाभर में प्रभाव
वैसे तो दुनियाभर के देशों में साहित्यिक रुप से राम कथा का कोई न कोई रूप तो मिलता है। एक रिपोर्ट के मुताबिक बेल्जियम के पादरी कामिल बुल्के रामायण से इतने प्रभावित थे कि उन्होंने भारत आकर और यहां रहकर दुनियाभर में फैले 'रामकथा' के विषयों पर शोध किया। बुल्के ने अपने शोध ग्रंथ 'रामकथा उत्पत्ति और विकास' में रामायण और रामकथा के एक हजार से ज्यादा प्रतिरूप होने की बात कही है।
कुछ इसी तरह साल 1609 में जे. फेनिचियो ने 'लिब्रो डा सैटा' नाम से राम कथा का अनुवाद किया था। ए. रोजेरियस ने 'द ओपेन रोरे' नाम से डच भाषा में राम कथा का अनुवाद किया। जेवी टावर्निये ने 1676 में फ्रेंच में राम कथा का अनुवाद किया था। वानश्लेगेन ने 1829 में रामायण का लैटिन में अनुवाद किया और साल 1840 में सिंगनर गोरेसिउ द्वारा इटैलियन में राम कथा का अनुवाद किया गया। रूसी विद्वान वारान्निकोव ने 20वीं सदी में रामचरितमानस का रूसी भाषा में अनुवाद किया था। जबकि विलियम केटी ने 1806 में अंग्रेजी में रामायण का अनुवाद शुरू किया था पर इसे पूरा मार्शमैन, ग्रिफिथ, व्हीलर ने किया।
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