जेएनयू, हरियाणा के जाट और 'आंदोलन' की हकीकत
एक आंदोलन जेएनयू का, जिसमें देशद्रोह हावी हुआ। कश्मीर की आजादी के नारे बुलंद हुए। लेकिन रंग बदलते बदलते मुद्दा ही बदरंग हो गया। आखिर में गफलत की स्थिति आ गई कि दोषी अगर उमर खालिद है तो कन्हैया कुमार भी। पर कन्हैया कुमार के समर्थन में तमाम आवाजें किसलिए उठती जा रही हैं। ये सवाल लगभग हर दिल में है।
दूसरा आंदोलन हरियाणा के जाट आरक्षण का, जिसमें उम्मीदों को खाक कर दिया गया। इज्जत को कुरेद कुरेद कर स्त्रीत्व से जुदा करने की भरसक कोशिशें हुईं। अब उतरी हुई आबरुओं के निशानों के तले हकीकत को तलाशा जा रहा है। जवाबों की अपेक्षा सवालों के लिए की जा रही है। लेकिन इस पूरे प्रकृम में अहम है.. आंदोलन... आंदोलन और आंदोलन। आजादी की खातिर आंदोलन।
जेएनयू में छात्रों का आंदोलन
हां जेएनयू मामले में आजादी को कैटेगेराइज्ड या कहिए अलग श्रेणियों में बांट दिया गया। मनुवाद से आजादी, सामंतवाद से आजादी, पूंजीवाद से आजादी। पर इस आजादी की शक्ल में आंदोलन का सहारा लेकर कितना भयानक ख्वाब रच दिया गया। ख्वाब इस बात का कि भारत के टुकड़े करने की ख्वाहिश भारत के भीतर भारतीय ही पाल रहे हैं।
ख्वाब ये कि हिंदुस्तानी ही हिंदुस्तान की तवारीख यानि की इतिहास को यातनाओं के बीच डालकर आजादी का विकल्प तलाशने की कोशिश कर रहे हैं। क्यों ख्वाब अच्छा है या बुरा। हालांकि कहना कुछ उचित न होगा। वरना तस्वीर अंधेरे की होगी..आवाज टीवी को टीबी की गुहार लगाते हुए उभरेगी और सवाल उठेगा कि ये बताईये जो ये ख्वाब दिखा रहे हैं क्या वे राष्ट्रवादी हैं। किस तरह से हैं।
आंदोलन और उनका प्रयोग
दरअसल आज आंदोलनों को समझने के लिए इतना काफी है कि आप मुद्दा बनाएं, देश भक्ति गाने बजाएं, चीखने चिल्लाने में माहिर हों, कॉलेज और पॉलिटेक्निक में संबंध हों। फिर क्या भीड़ आपके साथ है। रही बात आंदोलनकारियों की तो इनके दो चेहरे होते हैं। पहला सत्ताधारियों के साथ तो दूसरा विपक्ष को मजबूती का आश्वासन देता हुआ।
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बाकी तमाशबीनों की संख्या क्रांति का झंडा उठाने वालों से अधिक होती है। दिल्ली, लखनऊ, कानपुर या फिर कोई अन्य शहर हर जगह आन्दोलनकारियों की एक नई पीढ़ी है। जैसे जैसे आधुनिकता ने पाँव पसारे वैसे ही नये तेवर के साथ आंदोलन भी बढ़ गये।
पेशेवर शक्ल लेते आंदोलन
आन्दोलनों के तैयार होने के लिए मुद्दों की भी कमी नहीं। हां स्फूर्तता की दरों में गिरावट ज़रूर आ गई। साथ ही निज मन से तैयार होने वाले आंदोलन अब पेशेवर शक्ल ओ सूरत के इर्द गिर्द घूमने लगे हैं। नून - तेल और लकड़ी के इतर गाजा - इजराइल में प्रदर्शन करने वाले कई चेहरे हर आंदोलन के साथ गिने जा सकते हैं। फलस्वरूप इन आन्दोलनों का कोई लब्बोलुबाब निकल ही आये, यह तय नहीं माना जा सकता।
कहां से जुटते हैं आंदोलनकारी
इसे कुछ इस तरह भी समझा जा सकता है कि मान लीजिये किसी शहर में एक प्रतिष्ठित व्यक्ति हैं। वे न तो किसी के बुरे हैं और न ही भले। उनकी एक गैर सरकारी संस्था है। जिसमें एक ऐसा विभाग है, जो सिर्फ दिनभर की घटनाओं को सूचीबद्ध कर वे मुद्दे तय करता है जिसके सहारे घंटाघर चौराहे, कचेहरी, डीएम आवास पर प्रदर्शन किया जा सके। फिर तो संस्था का हर एक सदस्य फेसबुक की हरी लाइट के साथ कच्चा माल यानि भीड़ जुटाने लगता है।
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सोशल मीडिया के और भी कई अंग हैं। निश्चित ही उनकी सहायता से भी। डिग्री कॉलेज, पॉलिटेक्निक भीड़ आपूर्ति के प्रमुख हब हैं। इनमें से भी कई देशप्रेमी, समाजसेवी, जागरूक लोग आंदोलन में शामिल होते हैं।
भीड़ का चयन भी सोच समझ कर
बिहार में भीड़ जुटानी है, तो यूपी के पूर्वांचल से भीड़ जुटायी जाती है, क्योंकि यहां के लोग भोजपुरी बोलने में माहिर होते हैं। हरियाणा के लिये पश्चिमी उत्तर प्रदेश और राजस्थान से, पंजाब के लिये हरियाणा से, क्योंकि इनके बोलने का ढंग लगभग एक जेसा होता है। पश्चमी उत्तर प्रदेश के लिये उत्तराखंड व हरियाणा से, महाराष्ट्र में उत्तर कर्नाटक से, क्योंकि ये मराठी अच्छी बोलते हैं।
हरियाणा में जाट आंदोलन
ऐसा करने से बाहर से आये लोग भीड़ में इस तरह घुल जाते हैं, मानो दूध में पानी। किसी को पता भी नहीं चलता है कि उसके बगल में बैठा व्यक्ति पीड़ित है या किराये का टट्टू। और सुनिये आंदोलन में गड़बड़ी फैलाने वाले किराये के टट्टू ही होते हैं। हरियाणा में किस तरह महिलाओं की आबरू लूटी गई, उसमें बेशक जाटों का हाथ नहीं, बल्कि आस-पास के क्षेत्रों से बुलाये गये लोगों का है।
इस तरह देते हैं आंदोलन को अंतिम रूप
निश्चित दिन - तारीख और समय पर नियत स्थान पर साउंड सिस्टम, पोस्टर, बैनर, टोपी, स्टीकर के साथ साथ कवि एवं गायक भी पहुँचते हैं। संगीतमय वातावरण के बीच देश को, समाज को बचाने की ललकारें उठती हैं। हालाँकि कभी कभार पुलिस के बैरीकेडों पर चढ़ने पर लाठी चार्ज और पानी से हमले की ख़बरें भी उठती हैं। और बस इसके बाद आंदोलन संपन्न।
इनमें इस बात पर जोर नहीं दिया जाता कि उद्देश्य पूर्ण हुआ या नहीं। क्योंकि प्रदर्शन के पोटेंशियल युक्त दर्जनों मामले रोज इनके सामने होते हैं। परिणाम कुछ पुराने मुद्दों की हुई मौतों को लेकर रोज के इन आन्दोलनों को वजह बनाते हैं। आखिर काफी हद तक सही भी है।
जेएनयू और हरियाणा
कुछ यही हुआ दिल्ली के जेएनयू में भी और हरियाणा में आरक्षण पर भी। जोर-शोर के साथ आंदोलन हुआ। बुलंद नारे लगे। जिसमें चंद आतंक के सिपहसलारों ने कश्मीर को आजाद कराने की आवाज को ऊंची कर दिया। और मुद्दा कहां से कहां आ गया ये आप सबसे बेहतर कौन जान सकता है। हरियाणा में आरक्षण के बजाए भक्षण हो गया।
आंदोलन के नाम पर गुनाह जन्म ले रहे हैं। आज आंदोलनों के जरिए लोगों में भरे जा रहे जहर का असर आप हाल ही में हुई दोनों घटनाओं के साथ भी देख सकते हैं। तो जरूरत है मशविरे की। सलाह की। आंदोलन के बदले हुए स्वरूप की। जिससे बदलाव मानसिकता में सकारात्मक हो सकें, नकारात्मक नहीं क्योंकि उम्मीदें, इंसानियत जनाजों पर चल देती है। फिर पलायन ही शेष रह जाता है।
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