Bhindranwale: राजनैतिक स्वार्थ के लिए इंदिरा गांधी ने पनपाया भिंडरावाले को, अंत हुआ दुखद
विदेशों में बैठे भारत विरोधी तत्वों द्वारा पंजाब में खालिस्तान का मुद्दा एक बार फिर से उठाया जा रहा है। 1980 के दशक में पंजाब की राजनीति में कांग्रेस का प्रभाव बढ़ाने के लिए इंदिरा गांधी ने भिंडरांवाले को महत्व दिया।

Bhindranwale: पंजाब में आम आदमी पार्टी सरकार पर राज्य में खालिस्तानी संगठनों के खिलाफ कार्रवाई न करने के आरोप लग रहे हैं। 23 फरवरी को अजनाला के पास एक पुलिस स्टेशन पर खालिस्तान की मांग करने वाले एक अलगाववादी के समर्थकों के सामने पंजाब सरकार के झुक जाने के बाद यह आरोप और मुखर हो रहे हैं। हालांकि, खालिस्तान को लेकर जो राजनीति के आरोप आज आम आदमी पार्टी पर लग रहे हैं, वे आरोप चार दशक पहले कांग्रेस पर भी लगे थे।
यह सर्वविदित है कि खालिस्तान आंदोलन को कुचलने के कारण ही पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या कर दी गई थी। हालांकि, ऑपरेशन ब्लू स्टार और इंदिरा गांधी की हत्या के बाद समाचारों पत्रों से ऐसे खुलासे हुए, जिनसे पता चलता है कि कांग्रेस के नेता सीधे नहीं पर अप्रत्यक्ष रूप से खालिस्तानी समर्थकों के साथ खड़े दिखते थे।
इंदिरा गांधी, भिंडरांवाले और खालिस्तान आंदोलन
साल 1977 में पंजाब में विधानसभा चुनाव हारने के बाद कांग्रेस ने पंजाब के सिखों में फिर से पैठ बनाने की कोशिशें शुरू कर दी। इसके लिए पूर्व मुख्यमंत्री ज्ञानी जैल सिंह ने संजय गांधी को सलाह देते हुए दो सिख संतों के नाम सुझाए। एक दमदमी टकसाल गुरुद्वारा दर्शन प्रकाश के जत्थेदार और दूसरा जनरैल सिंह भिंडरावाले। कुलदीप नायर अपनी किताब 'बियॉन्ड द लाइन्स, एन ऑटोबायोग्राफी' में लिखते हैं कि संजय गांधी के दोस्त संसद सदस्य कमलनाथ कहते हैं कि जब हम भिंडरावाले से मिले तो उसकी आवाज में दम था और वह हमें काम का आदमी लगा। हम उसे कभी कभार पैसे भी दिया करते थे लेकिन हमने यह नहीं सोचा था कि वह आतंकवादी बन जायेगा। वहीं जी.बी.एस. सिंधु अपनी किताब में लिखते हैं कि संजय गांधी जनरैल सिंह भिंडरावाले का इस्तेमाल केवल सिख जनता को रिझाने और अकाली दल को सत्ता से बाहर फेंकने के लिए करना चाहते थे।
साल 1980 में कांग्रेस द्वारा लोकसभा चुनावों में भिंडरावाले के नाम का खूब इस्तेमाल किया गया। वहीं सत्ता में आने के बाद इंदिरा गांधी ने गुरदयाल सिंह ढिल्लों को कनाडा में भारतीय राजदूत बनाकर भेजा। कनाडा में खालिस्तानी मूवमेंट चरम पर था। वहीं ढिल्लों और भिंडरावाले के संबंध किसी से छिपे नहीं थे। वे बहुत ही ज्यादा करीबी थे। इसलिए कुछ इतिहासकार इसे अचानक बना संयोग नहीं बल्कि जानबूझकर किया गया कृत्य अधिक मानते हैं। क्योंकि 1980 के बाद से खालसा मूवमेंट को विदेशों से जबरदस्त फंडिंग की जा रही थी।
ज्ञानी जैल सिंह की भूमिका
ज्ञानी जैल सिंह को इंदिरा गांधी ने केंद्र में गृहमंत्री बना दिया था। ये वहीं ज्ञानी सिंह थे, जिन्होंने संजय गांधी को भिंडरावाले का नाम सुझाया था। दूसरी ओर केंद्र में सरकार बनते ही इंदिरा गांधी ने पंजाब की अकाली दल सरकार को बर्खास्त कर दिया फिर वहां कांग्रेस की सरकार बनी। धीरे-धीरे एक दो सालों में खालिस्तानी चरमपंथी हावी होने लगे। भिंडरावाले के खिलाफ बोलने वालों को मौत के घाट उतार दिया जाता, और भिंडरावाले खालिस्तान मूवमेंट का सबसे बड़ा चेहरा बनता चला गया। आखिर 11 सितंबर 1981 को पंजाब के मुख्य सचिव एस.के. सिन्हा को प्रधानमंत्री कार्यालय से भिंडरावाले को गिरफ्तार करने का संदेश मिला। केंद्रीय रक्षामंत्री आर. वेंकटरमण ने सिन्हा को आदेश दिया कि वे सेना को नहीं बल्कि पंजाब पुलिस को इस काम में लगाये।
कुछ समय बाद यानि 29 सितंबर 1981 को दिल्ली-अमृतसर होते हुए श्रीनगर जाने वाले इंडियन एयरलाइंस के विमान का खालिस्तान की मांग करने वाले पांच चरमपंथियों ने अपहरण कर लिया। हालांकि, इसका कोई फायदा नहीं हुआ लेकिन चौधरी चरण सिंह ने 27 अप्रैल 1983 को इस बात का लोकसभा में खुलासा किया था कि इस विमान अपहरण के अपहरणकर्ताओं को ज्ञानी जैल सिंह (तत्कालीन गृहमंत्री) का समर्थन हासिल था। जिसके बाद चौधरी चरण सिंह को जान से मारने की धमकी भरा पत्र भी मिला था।
इस पर बीबीसी के पत्रकार मार्क टली ने लिखा कि इंदिरा गांधी पर दिल्ली सिख गुरुद्वारा कमेटी व अन्य सिख संगठनों से समर्थन वापस लेने का दवाब दिया जाने लगा। अंतत: राजनैतिक फायदे के लिए कांग्रेस ने न्याय को ताक पर रख दिया। यह कहने में कोई जल्दबाजी नहीं होगी कि इस एक गलती ने प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की मौत की भी पृष्ठभूमि तैयार कर दी थी। वहीं दूसरी ओर गृहमंत्री जैल सिंह ने संसद में कहा कि भिंडरावाले को हम रिहा कर रहे हैं। वो 15 अक्टूबर 1981 में रिहा हो गया।
चरण सिंह ने लिखा इंदिरा गांधी को पत्र
इसके बाद भिंडरावाले का कद काफी ज्यादा बढ़ गया और वो खालिस्तानी मूवमेंट का सबसे बड़ा नेता बन गया। इसके बाद वो खुलेआम अपने समर्थकों के साथ बिना लाइसेंस के हथियार लेकर घूमा करता था और कोई उसे कुछ नहीं कह पाता था। आरोप लगते थे कि केंद्र सरकार का सीधा हाथ है उसपर। तब चौधरी चरण सिंह ने इंदिरा गांधी को एक खत भी लिखा था। जिसमें उन्होंने कहा कि आपने संत भिंडरावाले को हीरो बनाया है। अखबारों में खबरें छपती हैं लेकिन कोई गिरफ्तारी क्यों नहीं होती।
भिंडरावाले को विदेशी समर्थन
द टाइम्स ऑफ इंडिया ने 20 दिसंबर 1984 को खुलासा किया था कि जनरैल सिंह भिंडरावाले को खालसा मूवमेंट के लिए लंदन स्थित हैवलॉक रोड के गुरुद्वारे से 100,000 पौंड से अधिक की राशि भेजी गई थी। साथ ही यह भी कहा कि खालिस्तानी चरमपंथियों को 1980 से पाकिस्तान के एबटाबाद, हस्सन अब्दल, सियालकोट और साहिवाल में प्रशिक्षण दिया जा रहा हैं। वहीं 4 सितंबर 1982 में ब्लिट्ज ने भी खुलासा किया था कि खालिस्तान के चरमपंथियों को अमेरिका की खुफिया एजेंसी सीआईए भी सहायता दे रही है। वहीं जम्मू कश्मीर में इसके ट्रेनिंग कैंप हैं जहां मुख्यमंत्री फारूख अब्दुल्ला भी दौरा कर चुके हैं। इन दावों को लोकसभा में 16 नवंबर 1983 को केंद्रीय गृहमंत्री पी.सी. सेठी ने स्वीकार किया था।
ऑपरेशन ब्लू स्टार से खत्म हुआ भिंडरावाले का खौफ
19 जुलाई 1982 में भिंडरावाले ने अमृतसर में स्वर्ण मंदिर पर कब्जा कर लिया था। जहां उसके सशस्त्र समर्थकों की पूरी गैंग तैनात थी। जब इंदिरा गांधी के पास विकल्प नहीं बचा तो उन्होंने भारतीय सेना को भिंडरावाले के चंगुल से स्वर्ण मंदिर को खाली करवाने का आदेश दिया। सेना और खालिस्तानी चरमपंथियों के बीच 3 से 6 जून 1984 तक चली कार्रवाई में भिंडरावाले मारा गया और स्वर्ण मंदिर चरमपंथियों के कब्जे से आजाद हो गया।
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भिंडरावाले की मौत के बाद पूरे देश में हालात बहुत बिगड़ गये और इस ऑपरेशन के चार महीने बाद ही 31 अक्टूबर 1984 को प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या उनके दो बॉडीगार्ड्स सतवंत सिंह और बेअंत सिंह ने कर दी। इसके बाद दिल्ली एवं अन्य कई शहरों में कांग्रेस कार्यकर्ताओं द्वारा सिख विरोधी दंगे शुरू कर दिए गए, जिनमें सैकड़ों निर्दोष लोग मारे गए।
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