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Political Families: ठाकरे से लेकर पासवान परिवार तक सत्ता के लिए लड़े चाचा-भतीजे?

Political Families: लोकसभा चुनाव से पहले बिहार में सीट बंटवारे को लेकर चर्चाएं जोरों पर है। पासवान बनाम पासवान की लड़ाई सुलझाने की पूरी कोशिश में बीजेपी जुटी है।

चाचा (पशुपति पारस) और भतीजा (चिराग पासवान) दोनों ही हाजीपुर लोकसभा सीट पाना चाहते हैं। क्योंकि, दोनों ही खुद को पूर्व केंद्रीय मंत्री व एलजेपी प्रमुख रामविलास पासवान का राजनीतिक उत्तराधिकारी मानते हैं। अब यह एनडीए गठबंधन के लिए सिरदर्द बना हुआ है। वैसे सीट बंटवारे को लेकर मैराथन मंथन का दौर चल रहा है लेकिन सीट शेयरिंग को लेकर अभी तक गठबंधन द्वारा कोई स्पष्ट जानकारी नहीं दी गई है।

Political Families

हालांकि, भारतीय राजनीति में सत्ता पाने के लिए चाचा-भतीजे के बीच विवाद होना ये कोई नई बात नहीं है। इससे पहले भी अखिलेश यादव बनाम शिवपाल यादव, शरद पवार बनाम अजीत पवार, राज ठाकरे बनाम बाला साहेब ठाकरे और प्रकाश सिंह बादल बनाम मनप्रीत बादल जैसे बड़े राजनीतिक परिवारों के बीच भी मनमुटाव और झगड़े हो चुके हैं। इनके विवादों के चर्चें आज भी भारतीय राजनीति में होते हैं।

चिराग पासवान और पशुपति पारस

8 अक्टूबर, 2020 को पूर्व केंद्रीय मंत्री रामविलास पासवान का 74 साल की उम्र में निधन हो गया था। उनके निधन के बाद से पार्टी का मुखिया कौन होगा? इसके लिए रामविलास पासवान के बेटे चिराग पासवान और भाई पशुपति कुमार पारस के बीच राजनीतिक विवाद शुरू हो गए। इसके बाद जून 2021 में चिराग और उनके चाचा पशुपति पारस अलग हो गए। पारस अपने साथ पांच सांसदों को लेकर अलग हुए थे इसलिए उन्होंने पार्टी पर दावा ठोक दिया। जबकि चिराग पासवान अकेले सांसद रह गए।

मामला चुनाव आयोग पहुंचा, कई महीनों तक दोनों के धड़ों के बीच वाद-विवाद होते रहे। इसके बाद चुनाव आयोग ने लोजपा का सिंबल बंगला फ्रीज कर दिया। वहीं चिराग पासवान और पशुपति पारस को नया सिंबल और पार्टी का नाम आवंटित किया। चिराग पासवान को हेलिकॉप्टर चुनाव चिन्ह दिया गया, उनकी पार्टी का नाम लोजपा (रामविलास) है। जबकि चाचा पशुपति पारस की पार्टी का नाम राष्ट्रीय लोक जनशक्ति पार्टी है। जिसका चुनाव चिन्ह सिलाई मशीन है।

राज ठाकरे बनाम बालाजी साहेब ठाकरे

चाचा-भतीजे के बीच की सबसे चर्चित लड़ाई बाला साहेब ठाकरे और राज ठाकरे की है। जब शिवसेना प्रमुख बाला साहेब ठाकरे जीवित थे। तब राजनीतिक गलियारे में ये बात आम थी कि बाला साहेब ठाकरे के अगला राजनीतिक उत्तराधिकारी राज ठाकरे ही होंगे। राज ठाकरे तब शिवसेना की 'रीढ़ की हड्डी' की तरह थे। उनका कद पार्टी में दूसरे नंबर का था।

हालांकि, राज ठाकरे का यह सपना ज्यादा दिन तक नहीं टिक सका क्योंकि बाला साहेब ने साल 2003 में शिवसेना की कमान उद्धव ठाकरे को दी। उन्हें पार्टी का कार्यकारी अध्यक्ष बना दिया। इस बात से नाराज होकर और अपने चाचा द्वारा शिवसेना में साइडलाइन किए जाने के बाद साल 2005 में राज ठाकरे ने शिवसेना में विद्रोह कर दिया। उन्होंने शिवसेना से इस्तीफा देकर अपनी पार्टी महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना का गठन किया।

इसके बाद दोनों के बीच राजनीतिक विवाद बढ़ता ही गया। महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव से ठीक पहले अक्टूबर 2009 में मराठी मुद्दे को लेकर चाचा-भतीजे की लड़ाई चरम पर थी। बाल ठाकरे ने तब पार्टी के मुखपत्र सामना के जरिए नाम न लेते हुए राज ठाकरे पर निशाना साधा था।

बाल ठाकरे ने मराठी अस्मिता पर एक लेख में लिखा था कि 'मुझे मराठी अस्मिता का पाठ ना पढ़ाओ, मैं तुम्हारा बाप हूं'। सामना में बाल ठाकरे ने ये भी लिखा था कि मराठी समुदाय को जो मान मिला है वो सिर्फ शिवसेना की वजह से। बाल ठाकरे ने ये भी कहा था कि मराठी का पाठ उन्होंने कईयों को पढ़ाया है लेकिन कुछ छात्र अच्छे निकलते हैं तो कुछ बुरे भी।

अखिलेश यादव बनाम शिवपाल यादव

मुख्यमंत्री की कुर्सी को लेकर अखिलेश यादव और उनके चाचा शिवपाल यादव के बीच मनमुटाव शुरू हुए थे। धीरे-धीरे पार्टी को दो खेमों में बंट गई। हालांकि, अंत भला तो सब भला वाली बात यहां लागू होती है। दरअसल साल 2012 में समाजवादी पार्टी ने पहली बार उत्तर प्रदेश में पूर्ण बहुमत हासिल किया।

तब मुलायम सिंह यादव ने खुद कुर्सी पर न बैठकर अपने बेटे अखिलेश यादव को पार्टी की बागडोर सौंप दी। पार्टी के कुछ वरिष्ठ नेताओं समेत मुलायम सिंह यादव के भाई शिवपाल यादव को भी ये बात अच्छी नहीं लगी। क्योंकि, शिवपाल यादव ने जब से राजनीति शुरू की थी, वो तब से ही अपने बड़े भाई मुलायम सिंह की परछाई की तरह साथ खड़े थे।

इसके बाद 2014 के लोकसभा चुनाव में शिवपाल यादव फिरोजाबाद सीट से अपने बेटे आदित्य के लिए टिकट चाहते थे लेकिन ये टिकट रामगोपाल यादव (मुलायम के चचेरे भाई) के बेटे अक्षय को मिली। यहीं से शिवपाल यादव, अपने भतीजे अखिलेश के खिलाफ होने लगे। शक्तियों के बंटवारे व सत्ता की इस लड़ाई का नतीजा यह हुआ कि शिवपाल यादव को 2016 में अखिलेश ने अपने मंत्रीमंडल से बाहर निकाल दिया।

हालांकि, तब मुलायम सिंह यादव ने अपने भाई शिवपाल यादव का बचाव किया और अखिलेश यादव को खूब फटकार लगाई। इसके बाद 2018 में शिवपाल यादव ने अपनी प्रगतिशील समाजवादी पार्टी बनाई। हालांकि, साल 2022 में शिवपाल यादव की पार्टी और समाजवादी पार्टी फिर से एक हो गईं।

शरद पवार बनाम अजित पवार

महाराष्ट्र की राजनीति में दूसरा सबसे मजबूत पवार फैमिली को माना गया है। लेकिन, यहां शरद पवार के भतीजे अजित पवार ने अपने चाचा शरद पवार से बगावत कर ली और सत्ता में जा बैठे। दरअसल साल 2019 में महाराष्ट्र विधानसभा का चुनाव हुआ। तब बीजेपी और शिवसेना ने मिलकर चुनाव लड़ा लेकिन मुख्यमंत्री की कुर्सी के लिए विवाद हो गया।

मुख्यमंत्री की कुर्सी के लिए शिवसेना ने बीजेपी से अलग होकर कांग्रेस-एनसीपी से हाथ मिला लिया। तभी बीजेपी ने एनसीपी में दूसरी पोजिशन की ताकत रखने वाले अजित पवार से हाथ मिलाया। हड़बड़ी में देवेंद्र फडणवीस ने मुख्यमंत्री पद की शपथ ली और अजित पवार ने उप मुख्यमंत्री पद की।

तभी शरद पवार ने तुरंत सक्रियता दिखाई और प्रेस कॉन्फ्रेंस कर कहा कि अजित पवार का बीजेपी के साथ जाना निजी फैसला है। एनसीपी के सारे विधायक उनके साथ हैं। इसके बाद अजित पवार 80 घंटे भी डिप्टी सीएम नहीं रह सके। शरद पवार ने अजित पवार को वापस पार्टी में बुला लिया।

इसके बाद 2 मई 2023 को शरद पवार ने एनसीपी अध्यक्ष के पद से इस्तीफा का ऐलान कर दिया और पार्टी के दो कार्यकारी अध्यक्ष प्रफुल्ल पटेल और सुप्रिया सुले को बनाया। अजित पवार को यह बात अच्छी नहीं लगी। इसी बीच खबरें उठने लगी कि अजित पवार पार्टी से विद्रोह कर सकते हैं।

इसके बाद जुलाई, 2023 में अजित पवार ने 40 से अधिक विधायकों और सांसदों का समर्थन लेकर भाजपा-शिवसेना (एकनाथ शिंदे गुट) गठबंधन से हाथ मिला लिया। इसके बाद वे महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री बन गए। साथ ही पार्टी और सिंबल पर चुनाव आयोग में अजित ने दावा ठोक दिया और जीत भी गए।

प्रकाश सिंह बादल बनाम मनप्रीत बादल

अखिलेश और शिवपाल की तरह ही पंजाब में मनप्रीत सिंह बादल और उनके चाचा प्रकाश सिंह बादल के बीच की टकराहट का कारण मुख्यमंत्री पद ही था। मनप्रीत सिंह साल 1995 में पहली बार शिरोमणी अकाली दल के टिकट पर विधायक बने थे। इसके बाद वे पार्टी से 1997, 2002 और 2007 में भी गिद्दड़बाहा सीट से ही विधायक बने। तब मनप्रीत बादल पार्टी के अंदर और बाहर काफी लोकप्रिय नेता बन गए थे। उनकी हैसियत पार्टी में दूसरे नंबर की थी। वे 2007 की बादल सरकार में वित्तमंत्री भी रहे।

लेकिन प्रकाश सिंह बादल अकाली दल की कमान अपने बेटे सुखबीर सिंह बादल को सौंपना चाहते थे। जो बात मनप्रीत सिंह बादल को सही नहीं लगी। पार्टी में रहते हुए मनप्रीत सिंह बादल का डिप्टी सीएम सुखबीर सिंह बादल से विवाद बढ़ने लगा। विवाद इतना बढ़ा कि मनप्रीत ने अकाली दल छोड़ दिया।

इसके बाद साल 2012 में मनप्रीत ने पंजाब में अपनी नई पार्टी 'पीपुल्स पार्टी ऑफ पंजाब' बनाई। विवाद इतना बढ़ा कि 2014 में बठिंडा से मनप्रीत अपनी भाभी हरसिमरत कौर के खिलाफ मैदान में उतरे। हालांकि वह इस चुनाव में हार गए।

इसके बाद जनवरी 2016 को मनप्रीत ने अपनी पार्टी का विलय कांग्रेस में कर लिया। जिससे शिरोमणि अकाली दल को गहरा झटका लगा और 2017 में कांग्रेस की विधानसभा चुनावों में जीत गई। शिरोमणि अकाली दल को हार का सामना करना पड़ा। वहीं जनवरी, 2023 में मनप्रीत सिंह बादल ने भाजपा ज्वाइन कर ली।

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