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बहादुर शाह जफर की मजार पर पीएम मोदी, जानिए मुगल बादशाह के बारे में खास बातें

नई दिल्ली। आज देश के पीएम नरेंद्र मोदी म्यांमार दौरे के आखिरी दिन मुगल बादशाह बहादुर शाह जफर की मजार पर गए। म्यांमार की यात्रा करने वाले ज्यादातर भारतीय लोग, बहादुर शाह जफर की दरगाह जरूर जाते हैं। पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह भी 2012 में बहादुर शाह जफर की दरगाह पर गए थे।

आइए जानते हैं इसकी वजह और मुगल बादशाह बहादुर शाह जफर के बारे में कुछ अनकही बातें

बहादुर शाह जफर (1775-1862)

बहादुर शाह जफर (1775-1862)

  • बहादुर शाह जफर (1775-1862) भारत में मुग़ल साम्राज्य के आखिरी शहंशाह थे और उर्दू के माने हुए शायर थे।
  • उन्होंने 1857 का प्रथम भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में भारतीय सिपाहियों का नेतृत्व किया।
  • युद्ध में हार के बाद अंग्रेजों ने उन्हें बर्मा (अब म्यांमार) भेज दिया जहां उनकी मृत्यु हो गई।
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      PM Modi pays tribute at Bahadur Shah Zafar's mausoleum in Myanmar | वनइंडिया हिंदी
      जन्म 24 अक्टूबर 1775

      जन्म 24 अक्टूबर 1775

      • बहादुर शाह जफर का जन्म 24 अक्टूबर 1775 में हुआ था।
      • उनके पिता अकबर शाह द्वितीय और मां लालबाई थीं।
      • अपने पिता की मृत्यु के बाद जफर को 18 सितंबर, 1837 में मुगल बादशाह बनाया गया था।
      • जफर लोगों के दिलों पर राज करते थे

        जफर लोगों के दिलों पर राज करते थे

        • भारत के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने की जफर को भारी कीमत भी चुकानी पड़ी थी।
        • उनके पुत्रों और प्रपौत्रों को ब्रिटिश अधिकारियों ने सरेआम गोलियों से भून डाला।
        • यही नहीं, उन्हें बंदी बनाकर रंगून ले जाया गया, जहां उन्होंने सात नवंबर, 1862 में एक बंदी के रूप में दम तोड़ा।
        • उन्हें रंगून में श्वेडागोन पैगोडा के नजदीक दफनाया गया था।
        • उनके दफन स्थल को अब बहादुर शाह जफर दरगाह के नाम से जाना जाता है।
        • जफर लोगों के दिलों पर राज करते थे और इसी वजह से हिंदुस्तान में कई जगह सड़कों का नाम उनके नाम पर रखा गया है, वहीं पाकिस्तान के लाहौर शहर और बांग्लादेश में सड़कों का नाम जफर के नाम पर है। यही नहीं इसलिए कोई भी भारतीय म्यमांर जाता है तो वो जफर की मजार पर जरूर मत्था टेकता है।

        क्या था मसला?

        क्या था मसला?

        1857 में जब सभी विद्रोही सैनिकों और राजा-महाराजाओं ने जफर को हिंदुस्तान का सम्राट माना और उनके नेतृत्व में अंग्रेजों की ईंट से ईंट बजा दी। अंग्रेजों के खिलाफ भारतीय सैनिकों की बगावत को देख बहादुर शाह जफर का भी गुस्सा फूट पड़ा और उन्होंने अंग्रेजों को हिंदुस्तान से खदेड़ने का आह्वान कर डाला। भारतीयों ने दिल्ली और देश के अन्य हिस्सों में अंग्रेजों को कड़ी शिकस्त दी लेकिन अंग्रेजों की कूटनीति के चलते जफर फेल हो गए और अंग्रेजों ने उन्हें रंगून भेज दिया।

        देशभक्त मुगल बादशाह ही नहीं बल्कि उर्दू के मशहूर कवि

        देशभक्त मुगल बादशाह ही नहीं बल्कि उर्दू के मशहूर कवि

        बहादुर शाह जफर सिर्फ एक देशभक्त मुगल बादशाह ही नहीं बल्कि उर्दू के मशहूर कवि भी थे। उन्होंने बहुत सी मशहूर उर्दू कविताएं लिखीं, जिनमें से काफी अंग्रेजों के खिलाफ बगावत की भी कहानी कहती थीं।देश से बाहर रंगून में भी उनकी उर्दू कविताओं का जलवा जारी रहा। वहां उन्हें हर वक्त हिंदुस्तान की फिक्र रही। उनकी अंतिम इच्छा थी कि वह अपने जीवन की अंतिम सांस हिंदुस्तान में ही लें और वहीं उन्हें दफनाया जाए लेकिन ऐसा नहीं हो पाया।

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