Anesthesia Day: भारत में पचास हजार की आबादी पर केवल एक निश्चेतना विशेषज्ञ
उसे दर्द का एहसास ना हो। सामान्य भाषा में इसे ही एनेस्थीसिया या निश्चेतना देना कहते हैं। एनेस्थीसिया दो ग्रीक शब्दों को मिलाकर बना है। "an" अर्थात "बिना" और "aethesis" अर्थात "संवेदना"। एनेस्थीसिया के लिए प्रयोग की जाने वाली एनेस्थेटिक दवा की सहायता से चिकित्सीय प्रक्रियाओं को बिना किसी दर्द के पूरा किया जा सकता है।
इसके बिना जटिल ऑपरेशन संभव नहीं होते हैं। भारत में एलोपैथिक डॉक्टरों की उपलब्धता प्रति 1445 मरीज पर एक डॉक्टर है, जबकि विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार प्रति एक हज़ार लोगों पर एक डॉक्टर होना चाहिए, लेकिन अगर बात एनेस्थीसिया की करे तो भारत में 50000 आबादी पर मात्र एक निश्चेतना विशेषज्ञ है।

177 साल पूर्व हुई निश्चेतना की शुरुआत
डॉ. विलियम थोमस ग्रीन मार्टिन ने 16 अम्टूबर 1846 को सर्वप्रथम निश्चेतना के लिये ईथर का प्रयोग दांत निकालने के लिये किया था, उन्हें फादर ऑफ़ एनेस्थीसिया माना जाता है। हर साल उनकी याद में इसी दिन विश्व निश्चेतना दिवस के रूप में मनाया जाता है। तब से इथर का प्रयोग निश्चेतना के लिए किया जाने लगा और उसके बाद क्लोरोफॉर्म का उपयोग प्रचलन में आया। निश्चेतना विशेषज्ञों के संगठन के विश्व महासंघ ने 2023 को विश्व निश्चेतना दिवस "निश्चेतना एवं कैंसर देखभाल" विषय पर मनाना तय किया है।
भारतीय निश्चेतना संगठन की स्थापना 1947 में हुई। इससे 55000 निश्चेतना विशेषज्ञ पंजीकृत है व कुछ हजार अपंजीकृत है, जो विभिन्न शहरों में कार्यरत है। निश्चेतना विज्ञान आधुनिक स्वास्थ्य सेवा की सबसे जटिल स्पेशलिटी है। एनेस्थीसिया की चार व्यापक श्रेणियां हैं- जिनमें स्थानीय एनेस्थीसिया, क्षेत्रीय एनेस्थीसिया, शांतिकर औषधि व सार्वदैहिक एनेस्थीसिया शामिल है।
भारत में 98 प्रतिशत लोगों को नहीं पता सीपीआर क्या है
आधुनिक समय में भी आम आदमी को निश्चेतना विज्ञान एवं निश्चेतना विशेषज्ञ के बारे में जानकारी बहुत ही सीमित है। भारत में सिर्फ 40 प्रतिशत युवा आबादी निश्चेतना विज्ञान एवं निश्चेतना विशेषज्ञ के बारे में जानती है। सीपीआर (हृदय फेफड़े पुनर्जीवन) का प्रशिक्षण भी आम तौर पर निश्चेतना विशेषज्ञों द्वारा ही दिया जाता है और सबसे बड़ी बात यह है कि भारत में सिर्फ 2 प्रतिशत लोग सीपीआर के बारे में जानते है।
निश्चेतना विशेषज्ञों का कार्य स्थल सिर्फ शल्य क्रिया तक ही सीमित नही है बल्कि क्रिटिकल केयर यूनिट, प्रसूति दर्द निवारण, कैंसर व अन्य रोगों की तीव्र पीड़ा कम करना, संकट एवं विपदाओं में सहयोग, ईसीटी/ एमआरई सी.टी. स्केन के दौरान सहयोग करना भी शामिल है। ऐसे में चिकित्सा विज्ञान में इनके योगदान को कम नहीं आंका जा सकता।
भारत में 50000 की आबादी पर केवल एक निश्चेतना विशेषज्ञ
भारत में 55000 निश्चेतना निशेषज्ञ कार्यरत है एवं करीब 1.5 लाख विशेषज्ञों की कमी है। भारत में 50000 आबादी पर मात्र एक निश्चेतना विशेषज्ञ है परन्तु विश्व स्वाथ्य संगठन की नियमावली के अनुसार 5000 की आबादी पर एक निश्चेतना विशेषज्ञ होना चाहिये। जिसके चलते भारत में निश्चेतना द्वारा गंभीर जटिलताओं का खतरा एक प्रतिशत से कम है लेकिन समग्र मृत्यु दर निश्चेतना से करीब प्रति 100000 पर 2.2 प्रतिशत है।
विशेषज्ञों की कमी का सबसे बड़ा कारण है कि भारत में निश्चेतना विषय में स्नातकोतर सीटे (डीएम. डीडी.एनबी) करीब 4500 ही है। ऐसे में निश्चतेना विशेषज्ञ की कमी को दूर करने के लिए सरकार को आगे आना होगा और इन सीटो में बढ़ोतरी करनी होगी।
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