मिर्जा गालिब ने दिया था काशी को 'काबा-ए-हिंद' का खिताब

Mirza Ghalib-Varanasi
वाराणसी। 'मैं वाराणसी हूं। आप चाहे तो मुझे बनारस, वाराणसी या फिर काशी, किसी भी नाम से बुला सकते हैं। मैं लखनऊ से सिर्फ 320 किमी की दूरी पर और दिल्‍ली से 816.8 किमी की दूरी पर हूं लेकिन आजकल मैं राजनीति के कांउटडाउन में इन दोनों ही शहरों को पीछे छोड़ते हुए टॉप पर आ गया हूं।

सुबह-सुबह मेरी शुरुआत गंगा की आरती और अज़ान के साथ होती है। देश-विदेश से आने वाले लोग कभी मोक्ष तो कभी सुकून की तलाश

में मेरी मंजिल तक का सफर तय करते हैं। पिछले कुछ दिनों से कई बड़े राजनेता भी मेरी दर पर आए हैं। आप सबको लगता होगा कि नरेंद्र मोदी सरीखी शख्सियत ने आज मेरी जमीं पर कदम रखकर मुझे धन्‍य कर दिया लेकिन नहीं मैं तो बहुत पहले से इसका आदी हूं। कभी तुलसीदास तो कभी मिर्जा गालिब ने मुझे छूकर धन्‍य कर दिया।'

वाराणसी की कहानी को हमने सोचा कि वाराणसी के शब्‍दों में ही आपको सुनाएं। हमेशा खबरों से दूर रहने वाली गंगा की यह नगरी आज से पहले अगर कभी सुर्खियों में आई तो आतंकी हमलों की दहशत को लेकर या फिर गंगा में मौजूद प्रदूषण की वजह से।

वाराणसी कभी सियासत का इतना बड़ा गढ़ बनेगा, इसका अंदाजा 15 मार्च तक कोई नहीं लगा पाया था। जैसे ही 15 मार्च को बीजेपी की ओर से इस बात का ऐलान किया गया कि नरेंद्र मोदी उत्‍तर प्रदेश के वाराणसी से लोकसभा चुनाव लड़ेंगे, सांस्‍कृतिक नगरी वाराणसी सियासत की जमीं में तब्‍दील हो गई।

'रगों में बहते दौड़ते फिरने के हम नहीं कायल, जो आंख से ना टापका तो फिर लहूं क्‍या है,' ऐसी न जानें कितनी शायरी को आपके बीच में लाने वाले मिर्जा गालिब ही थे। गालिब, जिनका असली नाम मिर्जा असदुल्‍लाह बेग खान था, ही वह शख्‍स थे जिन्‍होंने काशी या वाराणसी को 'काबा-ए-हिंद' करार दिया था।

कहते हैं कि मिर्जा गालिब कोलकाता जा रहे थे जब वह वह कुछ पलों के लिए वाराणसी में रुके। कई प्रचीन मंदिरों और घाटों का यह शहर उनके दिल में बस गया और उनकी शायरी या फिर कविताओं की प्रेरणा में तब्‍दील हो गया।

गालिब करीब एक महीने तक वाराणसी में रुके थे और वहां यहां आध्‍यात्मिक सुंदरता और माहौल से इतना प्रभावित हुए कि उन्‍होंने अपनी एक कविता बनारस को ही समर्पित कर दी।

गालिब ने बनारस की खूबसूरती और यहां की 'सर्वधर्म समभाव' की संस्‍कृति को बयां करते हुए लिखा था, 'इबादत खाने नाकूशियां अस्‍त, हरम न काबा-ए-हिंदुस्‍तान अस्‍त,' मतलब यह जगह (वाराणसी) उन लोगों के लिए पूजने के बराबर है जो शंख की आवाज में संगीत तलाश लेते हैं। सच में काशी हिंदुस्‍तान का काबा है।

गालिब ने यह लाइनें अपनी कविता 'चिराग'ए-दैर' जिसका अंग्रेजी में मतलब है 'द टेंपल लैंप,' में लिखा हैं। वाराणसी के इस कभी न भूल पाने वाले गालिब के सफर का जिक्र ब्रिटिश याचिका के सामने दायर की गई, उस याचिका में पहली बार किया गया, जो उनकी पेंशन के लिए दायर की गई थी।

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