Old Parliament: पहले राष्ट्रपति से लेकर धारा 370 हटने तक, इन 10 बड़ी घटनाओं की गवाह रही पुरानी संसद
नये संसद भवन के उद्घाटन पर सियासत गरमाई हुई है। लेकिन इस समय पुराने संसद भवन में हुई प्रमुख घटनाओं को भी याद करना उचित होगा।

पुराना संसद भवन अब इतिहास की बात हो जायेगा, जिसका खुद एक समृद्ध इतिहास है। 96 साल के लंबे इतिहास में इस संसद भवन से ढेरों कालजयी कानून पारित हुए, तो कई ऐसी घटनाएं घटीं, जो हमेशा याद रहेंगी। यहां हम आपको उन 10 बड़े घटनाक्रम के बारे में बता रहे हैं, जिनका गवाह पुराना संसद भवन है।
गवर्नर जनरल से राष्ट्रपति
पुराने संसद भवन का उद्घाटन ब्रिटिश शासन के दौरान 18 जनवरी 1927 को हुआ था। उस समय देश में वायसराय को सर्वोच्च माना जाता था। 1926 से 1931 तक इरविन भारत के वायसराय थे। उन्होंने ही संसद भवन का उद्घाटन किया था। भारत के संविधान का निर्माण भी इसी संसद भवन में हुआ था। 26 जनवरी 1950 में जब देश का संविधान लागू हुआ और डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद ने भारत के पहले राष्ट्रपति का पद संभाला, तो उसी समय गवर्नर जनरल और राजा का पद समाप्त हो गया। इस प्रकार पुराना संसद भवन ब्रिटिश शासन से स्वतंत्र होकर भारत के एक धर्मनिरपेक्ष गणतंत्र देश बनने के अति महत्त्वपूर्ण क्षण का गवाह है।
आपातकाल की घोषणा
देश के राजनीतिक इतिहास पर जब भी बात होती है, तो आपातकाल का जिक्र जरूर आता है। स्वतंत्र भारत के इतिहास में यह सबसे विवादास्पद और अलोकतांत्रिक काल था। 25 जून 1975 को तत्कालीन राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद ने तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के कहने पर भारतीय संविधान के अनुच्छेद 352 के अधीन आपातकाल की घोषणा की थी। 25 जून 1975 से 21 मार्च 1977 तक देश में आपातकाल रहा। पुराना संसद भवन इस बड़ी घटना का भी गवाह है।
105 संवैधानिक संशोधन
पुराने संसद भवन से ढेरों कालजयी कानून पारित हुए। देश के विकास की नींव रखने के लिए अनेक नये कानून बने, तो जरूरत के हिसाब से कई कानूनों में संशोधन भी हुए। 26 जनवरी 1950 को देश का संविधान लागू होने के बाद 18 जून 1951 को पहला संवैधानिक संशोधन हुआ। इसमें धारा 15, 19, 85, 87, 174, 176, 341, 342, 372 और 376 को संशोधित किया गया। धारा 31A, धारा 31B और अनुसूची 9 को जोड़ा गया। 10 अगस्त 2021 को 105वां संवैधानिक संशोधन हुआ। इसमें अनुच्छेद 338B, 342A और 366 को संशोधित किया गया।
1996-1998 के बीच 4 प्रधानमंत्री
पुराने संसद भवन ने साल 1996 से 1998 के बीच 4 प्रधानमंत्रियों को देखा। 16 मई 1996 को अटल बिहारी वाजपेयी प्रधानमंत्री बनकर सदन पहुंचे। उनकी सरकार सिर्फ 16 दिन ही चल पाई। इसके बाद 1 जून साल 1996 को एचडी देवगौड़ा देश के प्रधानमंत्री बने। देवगौड़ा 21 अप्रैल 1997 तक पीएम रहे। 21 अप्रैल 1997 को इंद्रकुमार गुजराल प्रधानमंत्री बनकर सदन पहुंचे। इसके बाद 19 मार्च 1998 को अटल बिहारी वाजपेयी फिर प्रधानमंत्री बनकर संसद पहुंचे। इस तरह 1996 से लेकर 1998 के बीच दो साल से भी कम समय में पुराने संसद भवन ने 4 प्रधानमंत्रियों का कार्यकाल देखा।
कभी सदन न जाने वाले प्रधानमंत्री
पुराने संसद भवन ने एक ऐसा प्रधानमंत्री भी देखा, जो अपने कार्यकाल के दौरान कभी सदन नहीं जा पाया। यह दुर्भाग्य है देश के पांचवें प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह का। दरअसल, जनता पार्टी में टूट के बाद 15 जुलाई 1979 को मोरारजी देसाई ने प्रधानमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया था। कांग्रेस और सीपीआई के समर्थन से जनता पार्टी (एस) के नेता चरण सिंह 28 जुलाई 1979 को प्रधानमंत्री बने। राष्ट्रपति नीलम संजीव रेड्डी ने निर्देश दिया था कि चरण सिंह 20 अगस्त तक लोकसभा में अपना बहुमत साबित करें। इस बीच इंदिरा गांधी ने 19 अगस्त को ही चरण सिंह की सरकार से समर्थन वापस लेने की घोषणा कर दी। नतीजतन चरण सिंह ने लोकसभा का सामना किए बिना ही अपने पद से इस्तीफा दे दिया। राष्ट्रपति ने 22 अगस्त 1979 को लोकसभा भंग करने की घोषणा कर दी। चरण सिंह जनवरी 1980 तक कार्यवाहक पीएम के रूप में बने रहे। फिर लोकसभा का मध्यावधि चुनाव हुआ और इंदिरा गांधी 14 जनवरी 1980 को प्रधानमंत्री बन गईं।
तीन प्रधानमंत्रियों का निधन
तीन प्रधानमंत्रियों का पद पर रहते हुए निधन भी पुराने संसद भवन ने देखा है। इनमें जवाहरलाल नेहरू, लाल बहादुर शास्त्री और इंदिरा गांधी के नाम शामिल हैं। 27 मई 1964 को जवाहरलाल नेहरू को दिल का दौरा पड़ा, जिससे उनका निधन हो गया। इसके बाद देश के दूसरे प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री का निधन भी पद रहने के दौरान ही हुआ। शास्त्री जी का निधन ताशकंद में 11 जनवरी 1966 को हुआ था। इनकी मौत आज भी एक रहस्य बनी हुई है। इंदिरा गांधी भी उस समय देश की प्रधानमंत्री थी, जब 31 अक्टूबर 1984 को उनकी हत्या कर दी गई।
29 अविश्वास प्रस्ताव
पुरानी संसद 29 अविश्वास प्रस्तावों की भी गवाह है। इंदिरा गांधी सरकार के खिलाफ सबसे ज्यादा 15 बार अविश्वास प्रस्ताव विपक्ष ने पेश किये। लाल बहादुर शास्त्री के खिलाफ तीन, पी.वी. नरसिम्हा राव के खिलाफ तीन, मोरारजी देसाई के खिलाफ दो, अटल बिहारी वाजपेयी के खिलाफ दो और राजीव गांधी, एच.डी. देवगौड़ा, मनमोहन सिंह और नरेंद्र मोदी के खिलाफ एक-एक अविश्वास प्रस्ताव पेश किए जा चुके हैं। हालांकि, अविश्वास प्रस्ताव से अभी तक सिर्फ 3 सरकारें गिरी हैं। इनमें 1990 में वी.पी. सिंह, 1997 में एच.डी. देवगौड़ा और 1999 में अटल बिहारी वाजपेयी की सरकारें शामिल हैं।
3 संयुक्त सत्र
पुराने संसद भवन ने तीन संयुक्त सत्र भी देखे है। साल 1961 में जवाहरलाल नेहरू के समय में दहेज विरोधी अधिनियम के लिए संयुक्त सत्र बुलाया गया था। इसके बाद 1978 में मोरारजी देसाई के समय में बैंकिंग सेवा आयोग विधेयक के लिए और 2002 में अटल बिहारी वाजपेयी के समय में आतंकवाद निवारक विधेयक (पोटा) के लिए संयुक्त सत्र बुलाए गये। जानकारी के लिए बता दें कि संविधान के अनुच्छेद 108 के अनुसार यदि किसी विषय पर दोनों सदनों में गतिरोध उत्पन्न हो जाता है, तो राष्ट्रपति द्वारा दोनों सदनों का संयुक्त अधिवेशन बुलाने का प्रावधान है।
आतंकी हमला
संसद पर हुए आतंकी हमले ने पूरे देश को झकझोर दिया था। 13 दिसंबर 2001 को पाकिस्तानी आतंकी संगठन लश्कर-ए-तैयबा और जैश-ए-मोहम्मद के आतंकियों ने लोकतंत्र के मंदिर को निशाना बनाया। हमले में संसद भवन के गार्ड और दिल्ली पुलिस के जवान समेत कुल 9 लोग शहीद हुए थे। इसमें शामिल 5 आतंकवादियों को सुरक्षाबलों ने मौके पर ढेर कर दिया था। हमारा पुराना संसद भवन पाकिस्तान की इस शर्मनाक करतूत का भी गवाह बना।
अनुच्छेद 370 हुआ निष्प्रभावी
नरेंद्र मोदी सरकार के इस बड़े फैसले का गवाह भी पुराना संसद भवन बना है। 5 अगस्त 2019 को केंद्र की मोदी सरकार ने जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन अधिनियम 2019 पेश किया, जिससे जम्मू कश्मीर राज्य से संविधान का अनुच्छेद 370 निष्प्रभावी हो गया। साथ ही जम्मू-कश्मीर और लद्दाख दो केन्द्रशासित प्रदेशों का गठन किया गया। सरकार के इस फैसले की चर्चा न सिर्फ देश, बल्कि विदेशों में भी रही। पहले केंद्र सरकार का कोई भी कानून यहां प्रत्यक्ष लागू नहीं होता था, लेकिन अब यहां केंद्र के कानून लागू होते हैं। इतना ही नहीं, जम्मू-कश्मीर में कई समुदायों को कई सारे अधिकार भी नहीं थे, लेकिन अब सभी भारतीयों को समान अधिकार मिलते हैं।
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