Interview: मीडिया के एक सेक्शन को नरेंद्र मोदी पच नहीं रहे हैं: रामबहादुर राय
चार राज्यों में हुए विधानसभा चुनाव के परिणाम 3 दिसंबर को आ जाएंगे, जबकि मिजोरम के परिणाम 4 दिसंबर को आने की संभावना है। जीतने और हारने वाली पार्टियां अलग अलग अपने प्रदर्शन का आकलन करेंगी। लेकिन चुनाव प्रचार के दौरान और वोटिंग के बाद भी कई ऐसे पत्रकार रहे हैं, जो अपने अपने ढंग से चुनाव परिणाम की संभावनाएं बता रहे हैं।
कुछ टीवी एंकर खुलकर सत्ता पक्ष के साथ खड़े दिखते हैं, वहीं यूट्यूब पर सक्रिय कुछ पत्रकार विपक्ष के नेताओं की तरह बात कर रहे हैं। हमेशा की तरह भाजपा और विशेषकर प्रधानमंत्री को लेकर तमाम ऐसी टिप्पणियां कर रहे हैं, जो कि वस्तुनिष्ठ पत्रकारिता के दायरे में नहीं आती।

पिछले कुछ वर्षों में पत्रकारिता का स्वरूप बदल गया है या पत्रकार का निष्पक्ष रहना अब मायने नहीं रखता? ऐसे कई सवालों के बेहतर जवाब रामबहादुर राय से अच्छा कौन दे सकता है। रामबहादुर राय ना सिर्फ एक प्रख्यात पत्रकार हैं, बल्कि वह कई दौर के प्रधानमंत्रियों को एक पत्रकार के नजरिए से देख परख भी चुके हैं। राजेन्द्र माथुर और प्रभात जोशी जैसे धुरंधर संपादकों के साथ काम कर चुके रामबहादुर राय से वनइंडिया हिंदी ने पत्रकार और पत्रकारीय मर्यादा पर लंबी बातचीत की। प्रस्तुत है उसके कुछ प्रमुख अंश।
प्रश्नः चुनाव परिणाम आने से पहले ही कई पत्रकार, खासकर बड़े मीडिया संस्थान में काम चुके यूट्यूबर अभी से ही यह कहने लगे हैं कि भाजपा या मोदी इतने साल सत्ता में रहने के बावजूद केवल विवादास्पद मुद्दे पर ही चुनाव लड़ने की कोशिश करते हैं? क्या ऐसा ही है या इनका मुद्दा कुछ और है?
राम बहादुर राय: पत्रकारिता समय के हिसाब से चलती है, समय से प्रभावित भी होती है। हम लोगों के समय हर पत्रकार, चाहे छोटे संस्थान का हो, बड़े संस्थान का हो, रिपोर्टर हो या संपादक हो, उसकी एक इच्छा रहती थी कि और उसका प्रयास भी रहता था कि उसे निष्पक्ष माना जाए। उसकी इच्छा होती थी कि हम जो लिखें वो दोनों पक्ष पढ़ें और पढ़कर अपनी राय बनाएं।
यह एक दौर था और यह दौर बहुत पुराना भी नहीं था। तब गिरिलाल जैन अंग्रेजी पत्रकारिता का नेतृत्व कर रहे थे। बी जी वर्गिस थे। उसी तरह से हिंदी में प्रभाष जोशी, राजेंद्र माथुर थे। इनमें कर्पूर चंद कुलिश का नाम हम बहुत सम्मान से लेना चाहेंगे। कम लोगों को मालूम है कि राजस्थान पत्रिका ने इमरजेंसी में जो काम किया, वो तो कोई कर ही नहीं पाया। सत्ता से उनके अच्छे संबंध थे। एक दिन वह निकल पड़े अपनी गाड़ी में और उन्होंने एक कॉलम शुरू किया: मैं देखता चला गया। उस कॉलम में उन्होंने इमरजेंसी के दौरान जो देखा वह लिखा। उसका असर यह हुआ कि कुलिश जी के लिखे हुए शब्दों को पढ़कर केंद्र और राज्य की सरकार सुधार करने लगी, कार्रवाई करने लगी।
उस जमाने में भी ऐसा नहीं था कि किसी संपादक पर पक्ष लेने का आरोप नहीं लगाया गया। प्रभाष जी पर कभी आरएसएस समर्थक होने की तोहमत भी लगी, लेकिन जब उन्होंने 6 दिसंबर 1992 के बाद कलम चलाई, तो लोगों ने उन्हें घनघोर कम्यूनिस्ट भी कहा। लेकिन सच्चाई यह है कि वह ईमानदारी से पत्रकारिता कर रहे थे। वह दौर अब खत्म हो गया है कि जिसमें पत्रकार अपनी निष्पक्षता को सबसे बड़ी पूंजी मानता था। आज के दौर में कौन किसके साथ खड़ा है, वह दिखाने का दौर है। और आज जब इस तरह का दौर है तो पाठकों में भी ऐसी प्रवृति आई है।
अमेरिका में भी पत्रकारों में इस बात का बंटवारा है कि कौन किसके साथ खड़ा है। आज जो कह रहे हैं कि परिणाम आने से पहले कुछ पत्रकार रिजल्ट बनाने लगे हैं वह अस्वाभाविक नहीं है। उनको जो काम दिया गया है वह वही कर रहे हैं। उन्होंने अपने लिए किसी को चुन लिया होगा तो उसके लिए भी कर रहे होंगे। उसी तरह से मोदी जी या बीजेपी के पक्ष में कुछ लोग कर रहे हैं। यह जो दौर है, वह ध्रुवीकरण का दौर है। यह ध्रुवीकरण वैचारिक स्तर पर है, पार्टी के स्तर पर है और हिंदू मुस्लिम के आधार पर भी है। यह होना नहीं चाहिए, लेकिन है। यह दौर टूटेगा और सामान्य वातावरण बनेगा, क्योंकि यह दौर लोकतांत्रिक नहीं है।
प्रश्नः 2014 के बाद मीडिया दो हिस्सों में स्पष्ट दिखाई दे रही है। एक को कम्यूनल मीडिया बताया जा रहा है और दूसरा मोदी के खिलाफ खड़ा है और अपने को सेकुलर मीडिया कहता है। आप इस बंटवारे को कैसे देखते हैं?
राम बहादुर राय: पहली बात यह है कि सेकुलरिज्म या सोशलिज्म के बारे में यह कहा जाता है कि यह ऐसी टोपी है कि जिसके सिर पर रख दीजिए वह उसी आकार की हो जाती है। हमारे यहां सेकुलरिज्म की कोई परिभाषा नहीं है और ना ही कम्यूनिल्जम की कोई परिभाषा है। मैं तो यहां तक कहता हूं कि हमारे यहां नेशनलिज्म की भी कोई परिभाषा नहीं है। हर आदमी इन सबको अपने ढंग से परिभाषित कर सकता है।
आप जो कह रहे हैं कि मीडिया में जो सेक्युलर और गैर सेक्युलर के बीच में डिवीजन हुआ है, ऐसा नहीं है। दरअसल मीडिया के एक सेक्शन को नरेंद्र मोदी पच नहीं रहे हैं और नरेंद्र मोदी को आईना दिखाने के लिए अटल बिहारी वाजपेयी का उदाहरण दिया जाता है। अटल बिहारी वाजपेयी को बिना पढ़े हुए नरेंद्र मोदी को आईना दिखाने की यह कोशिश है। जबकि वाजपेयी ही अकेले व्यक्ति हैं, संभवतः भारत की राजनीति में, जिन्हें बीजेपी से बाहर करने की कम से कम चार पांच बार चेष्टा हुईं। लेकिन बीजेपी में हर समय खुश नहीं रहने के बावजूद पार्टी के साथ रहे। पार्टी के साथ उनका एक कमिटमेंट था, इसलिए अप्रिय परिस्थितियों में भी रहें।
सेकुलर मीडिया और कम्यूनल मीडिया का डिवीजन बनावटी है और जब 2014 में राजनीतिक परिवर्तन हुआ और जो लोग सेकुलर जनर्लिज्म की बात करते हैं दरअसल वे पोस्ट ट्रूथ की बात करते हैं। पोस्ट ट्रूथ पर एक कांफ्रेंस में मैं भी गया था। उसमें उर्मिलेश, राजदीप सरदेसाई और पुण्य प्रसून वाजपेयी भी थे। वहां मैंने पूछा पोस्ट ट्रूथ है क्या? किसी ने संतोषजनक जवाब नहीं दिया। यानी आप जो कह रहे हैं वह ट्रूथ है और दूसरा जो कह रहा है वह पोस्ट ट्रूथ है। यह तो आधुनिकता और उत्तर आधुनिकता जैसा मामला है। जब आधुनिकता ही अपरिभाषित है तो उत्तर आधुनिकता परिभाषित कैसे हो जाएगी।
हमारा देश संविधान से चल रहा है और हमारे संविधान ने सेकुलरिज्म को दरवाजे से बाहर रखा हुआ है। सोशलिज्म को भी दरवाजे से बाहर रखा है। हमारे संविधान निर्माताओं ने संविधान का उददेश्य लोककल्याण रखा। उन्हें मालूम था कि विचारधारा के आधार पर जो संविधान बनेगा वह विचारधारा पर ही टूट भी जाएगा। इस पर सबकी सहमति भी थी।
प्रश्न: मोदी विरोधी मीडिया का एक बाजार बन चुका है। मोदी के खिलाफ यूट्यूबर्स की आमदनी लाखों में है। इनके फॉलोअर्स भी लाखों में बताए जा रहे हैं। आप इसे कैसे देखते हैं?
राम बहादुर राय: देखिए इसके कई आयाम हैं। लेकिन यह एक खतरनाक ट्रेंड हैं। यह अच्छी बात है कि उनके लाखों दर्शक हैं और लाखों पाठक हैं, लेकिन उनकी आदमनी के स्रोत के बारे में कोई जानकारी नहीं है, यह इस बात का सबूत है कि वे इस बारे में लापरवाह हैं। चाहे यह सरकार हो या कोई और। मैं उन लोगों में से हूं जो मीडिया के रेगुलेशन की बात सालों से उठा रहे हैं। पहली बात तो यह है कि जिस टेक्नोलॉजी से लाखों लोग देख रहे हैं उस पर सरकार का कोई नियंत्रण है क्या? नहीं है।
इसलिए मीडिया को रेगुलेशन के दायरे में लाया जाना चाहिए कि नहीं लाया जाना चाहिए? रेगुलेशन नहीं होने के कारण मीडिया में अनार्की है और जब अनार्की होती है तो जो किसी एक विचार के लिए फंडिंग करना चाहते हैं, उन पर कोई रोकटोक नहीं होती। आप न्यूजक्लिक पर रेड करते हैं, उसकी छानबीन करते हैं, तो बाकी पर क्यों नहीं करते। इस बात पर विचार होना चाहिए कि सभी मीडिया रूल ऑफ लॉ से चलना चाहिए ना कि मोनोपोली के आधार पर। मोनोपोली घराने का स्वार्थ है। प्रधानमंत्री मोदी को डराए रखने का स्वार्थ है।
प्रकाश जावड़ेकर जब सूचना प्रसारण मंत्री थे, तो मेरी उनसे मुलाकात हुई तो उनको बताया कि हम मीडिया काउंसिल की बात बरसों से कर रहे हैं। उसके पहले नृपेंद्र मिश्र जब ट्राई के चेयरमैन थे तो उन्होंने इस पर एक रिपोर्ट तैयार की थी। प्रकाश जावड़ेकर ने मुझे बताया कि मेरे सुझाव के आधार पर मीडिया काउंसिल के गठन का उन्होंने ड्राफ्ट तैयार कर लिया है और कैबिनेट के एजेंडे में उसे ले जाएंगे। आप जनता को बता सकते हैं कि मीडिया काउंसिल बनेगी। लेकिन दुर्भाग्य से वह मंत्रिमंडल से चले गए।
प्रश्नः एनडीटीवी को अडानी द्वारा खरीदने के बाद कुछ लोगों ने आरोप लगाया कि मोदी जी मीडिया का गला दबाना चाहते हैं?
राम बहादुर राय: देखिए। एनडीटीवी का गला नहीं दबाया। एनडीटीवी जिसका पात्र था, उसे वह मिल गया। प्रणव राय तो जेल जाते। जब डॉ मुरली मनोहर जोशी पीएसी के चैयरमैन थे, तब उन्होंने एनडीटीवी के खिलाफ जांच कमीशन बनाया था और प्रणय राय उसमें बुरी तरह फंस गए थे। सरकार ने उनको क्यों छोड़ा, जोशी जी से पूछिए। मेरी नजर में मोदी सरकार की एक विशेषता है कि वह एक्शन लेना जानते हैं। एनडीटीवी दरअसल चिदंबरम के घोटालों का अड्डा था। एनडीटीवी बड़े कर्ज में था। उन्हें चैनल बेचना ही था। अडानी ने खरीद लिया।
मीडिया कंपनी की खरीददारी कोई पहली बार थोड़े हुई है। जवाहर लाल नेहरू को लोग डेमोक्रेट मानते हैं। वे कहीं से भी डेमोक्रेट नहीं थे। उनसे लाख गुणा ज्यादा नरेंद्र मोदी डेमोक्रेट हैं। मैं आपको एक घटना बताता हूं। यह टाइम्स ऑफ इंडिया जैन परिवार का नहीं था। डालमिया का था और डालमिया ने जवाहर लाल नेहरू के बारे में लिख दिया। तो जवाहर लाल नेहरू ने उसे अपनी प्रतिष्ठा का सवाल बनाकर कार्रवाई की और डालमिया को राजा से रंक बना दिया। करोड़पति को भिखारी बना दिया और पूरी बेनेट कोलमैन कंपनी जैन परिवार को दिलवा दी।
नरेंद्र मोदी ने तो ऐसा किसी मीडिया के साथ नहीं किया। हिंदू निकल रहा है, इंडियन एक्सप्रेस निकल रहा है। टेलीग्राफ भी निकल रहा है। स्टेटसमैन भी निकल रहा है। ये सभी मोदी के खिलाफ लिखते हैं। क्या किसी ने कभी कहा कि मोदी उनका अखबार बंद कराना चाहते हैं। मीडिया घराने में उथल पुथल होती रहती है।
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