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Shankar Dayal Sharma: राष्ट्रपति शंकर दयाल शर्मा के पास आई थी उनकी बेटी और दामाद के हत्यारों की दया याचिका

Shankar Dayal Sharma: 19 अगस्त 1918 को भोपाल के अमोन गांव में जन्में शंकर दयाल शर्मा ने कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय सहित हार्वर्ड लॉ स्कूल, ज्यूरिक यूनिवर्सिटी और पेरिस यूनिवर्सिटी जैसे बड़े शिक्षण संस्थानों से शिक्षा ग्रहण की थी। इनके पिता पंडित खुशीलाल शर्मा एक प्रसिद्ध वैद्य थे। कुछ समय तक उन्होंने कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी में पढ़ाया। इसके बाद देश में वापस लौटने पर लखनऊ विश्वविद्यालय में भी विधि विभाग में छात्रों को पढ़ाया। 1940 में उन्होंने वकालत शुरू की। इसके बाद 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन में भी सक्रिय रहे और जेल भी गए।

आजादी के समय जब भोपाल के नवाब ने भारत में विलय से इंकार कर दिया था तो शंकर दयाल शर्मा ने उनकी खिलाफत शुरू कर दी थी। इसके लिए उन्हें जेल भी जाना पड़ा था। 1949 में जब भोपाल की रियासत का भारत में विलय हुआ तो वह पूर्ववर्ती भोपाल राज्य के मुख्यमंत्री बने। इसके बाद जब भोपाल मध्य प्रदेश का हिस्सा बन गया तब वह 1967 तक विभिन्न विभागों के मंत्री बने। इसके बाद 1971 में वह सांसद बने। 1974 से 1977 तक वे केन्द्रीय संचार मंत्री रहे। इसके बाद 1984 से 1985 तक वह आंध्र प्रदेश के राज्यपाल रहे। इसके बाद 1985 से 1986 तक वह पंजाब और फिर 1986 से 1987 तक वह महाराष्ट्र के राज्यपाल रहे। इसके बाद 1987 से लेकर 1992 तक वह देश के उपराष्ट्रपति रहे। इसके बाद 1992 से लेकर 1997 तक वह भारत के राष्ट्रपति रहे।

Mercy petition of the killers of his daughter and son-in-law came to President Shankar Dayal Sharma

आतंकियों ने कर दी थी बेटी और दामाद की हत्या

शंकर दयाल शर्मा जब आंध्र प्रदेश के राज्यपाल थे तब उनके दामाद ललित माकन और बेटी गीतांजलि की खालिस्तानी आतंकियों ने गोली मारकर हत्या कर दी थी। दिल्ली में हुए सिख विरोधी दंगों में जिन कांग्रेस नेताओं का हाथ बताया जाता था उसमें ललित माकन का नाम भी शामिल था। उन दिनों वे कांग्रेस के सांसद थे। हत्या के दिन 31 जुलाई 1985 को कीर्ति नगर में मौजूद अपने निवास स्थान पर ललित माकन लोगों से मुलाकात करने के बाद कार में बैठ रहे थे तभी तीन खालिस्तानी आतंकियों ने उन पर गोलियां चला दी। इस हादसे में ललित माकन, पत्नी गीतांजलि और उनका एक सहायक मारा गया था।

बेटी के हत्यारों की दया याचिका

हत्या के बाद तीनों आरोपी भाग गए थे। पर इन लोगों को पुणे में गिरफ्तार कर लिया गया था। दोनों पर केस चला और कोर्ट ने दोनों को फांसी की सजा सुना दी थी। उनकी फांसी की सजा माफ होने का एक ही जरिया था दया याचिका और वह दया याचिका राष्ट्रपति की मंजूरी मिलने पर ही मान्य होती है। ऐसे में दोनों ने दया याचिका दायर की। उस समय देश के राष्ट्रपति शंकर दयाल शर्मा थे। ये दोनों वे हत्यारे थे जिन्होंने उनकी बेटी और दामाद की हत्या की थी। राष्ट्रपति ने दोनों आतंकियों की याचिका खारिज कर दी। इसके बाद 9 अक्टूबर 1992 को दोनों को पुणे की यरवदा जेल में फांसी पर लटका दिया गया।

शंकर दयाल शर्मा की मृत्यु और कंधार कांड

26 दिसंबर 1999 को जब इनका निधन हुआ तब देश कंधार कांड से जूझ रहा था। दरअसल 24 दिसंबर 1999 को नेपाल से दिल्ली आ रहे एयर इंडिया के विमान का आतंकवादियों ने अपहरण कर लिया था। सारा देश हाईजैक विमान में सवार यात्रियों और क्रू मेंबर्स की कुशलता की प्रार्थना कर रहा था। ऐसे में जब देश के राष्ट्रपति रहे शंकर दयाल शर्मा का निधन हुआ तो उनकी मृत्यु की खबर को सुर्खियां नहीं मिल पाई थी। डॉक्टर शंकर दयाल शर्मा अपने पूरे जीवनकाल में एक राजनेता कम और शिक्षाविद की तरह ज्यादा रहे और देश व दुनिया में सम्मान प्राप्त किया।

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