Karnataka Election: वे महत्त्वपूर्ण मुद्दे, जो बदल सकते हैं कर्नाटक की चुनावी तस्वीर
कर्नाटक की भाजपा सरकार अपने द्वारा किये गये विकास कार्यों को तो जनता के सामने गिनाएगी ही। लेकिन, आरक्षण, टीपू सुल्तान, हिजाब, जातिगत समीकरण जैसे मुद्दों के भी आगामी विधानसभा चुनावों में छाये रहने की संभावना है।

Karnataka Election: कर्नाटक विधानसभा चुनावों की घोषणा के साथ ही राज्य में राजनीतिक सरगर्मी तेज हो गई है। सभी राजनीतिक दल चुनावी प्रचार अभियान में जुट गए हैं। गौरतलब है कि नामांकन भरने की अंतिम तिथि 20 अप्रैल निर्धारित की गई है। कर्नाटक में मतदान 10 मई को होगा और मतों की गणना 13 मई को की जाएगी। यहां यह बताते चलें कि साल 1985 के बाद से कोई भी सरकार राज्य में दो बार लगातार सत्तारूढ़ नहीं हुई है। ऐसे में हम यहां कुछ महत्त्वपूर्ण चुनावी मुद्दों पर नजर डाल रहे हैं।
मुसलमानों का आरक्षण समाप्त
कर्नाटक की बसवराज बोम्मई सरकार ने हाल ही में एक महत्त्वपूर्ण फैसला लेते हुए ओबीसी के तहत मुसलमानों को दिये जा रहे चार प्रतिशत के आरक्षण को समाप्त कर दिया। यह आरक्षण पिछले लगभग तीन दशकों से कर्नाटक के मुसलमानों को दिया जा रहा था। अब मुसलमानों को ईडब्ल्यूएस कोटे के तहत रखा गया है। इस चार प्रतिशत के आरक्षण को कर्नाटक के दो प्रभावी समुदाय लिंगायत और वोक्कालिगा में समान रूप से बांटा गया है।
लिंगायत समुदाय को पहले पांच प्रतिशत आरक्षण दिया जा रहा था, जो अब बढ़कर सात प्रतिशत हो गया है। वहीं, वोक्कालिगा समुदाय का आरक्षण चार प्रतिशत से बढ़कर छह प्रतिशत हो गया है। कांग्रेस का कहना है कि अगर वह कर्नाटक में सत्ता में आएगी, तो मुस्लिम आरक्षण को फिर से बहाल किया जाएगा। गौरतलब है कि कर्नाटक में मुसलमानों की आबादी 12 प्रतिशत से भी ज्यादा है।
एससी और एसटी को फायदा
कर्नाटक सरकार ने शिक्षा और रोजगार में अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति के लिए भी आरक्षण का कोटा बढ़ा दिया है। अनुसूचित जाति का कोटा 15 प्रतिशत से बढ़कर 17 प्रतिशत और अनुसूचित जनजाति का कोटा तीन प्रतिशत से बढ़ाकर सात प्रतिशत किया गया है।
कर्नाटक की बोम्मई सरकार ने इसके साथ ही अनुसूचित जाति के आरक्षण को आंतरिक स्तर पर चार हिस्सों में बांट दिया है। इस फैसले से अनुसूचित जाति में शामिल बंजारा समुदाय नाराज हो गया है। वहीं, आरक्षण के इस आंतरिक बंटवारे का सबसे ज्यादा फायदा दलितों के मडिगा समुदाय को मिलेगा, क्योंकि दलितों में उनकी आबादी ज्यादा है। कहा जाता है कि मडिगा समुदाय की मांग पर ही सरकार ने आंतरिक आरक्षण का फैसला लिया है। भाजपा को इस समुदाय से काफी उम्मीदें हैं। गौरतलब है कि कर्नाटक में अनुसूचित जाति की आबादी लगभग 20 प्रतिशत है।
कांग्रेस के जातिगत समीकरण
कर्नाटक में भी जातिगत समीकरण बहुत मायने रखता है। राज्य में कांग्रेस के पास तीन बड़े चेहरे मौजूद हैं। जिनमें कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष मलिकार्जुन खड़गे, पूर्व मुख्यमंत्री सिद्धारमैया और प्रदेश अध्यक्ष डी.के. शिवकुमार शामिल हैं। मलिकार्जुन खड़गे अनुसूचित जाति से आते हैं। वहीं, सिद्धारमैया कुरुबा और डी.के. शिवकुमार वोक्कालिगा समुदाय से आते हैं। कांग्रेस को यह उम्मीद है कि ये तीनों नेता अपने चेहरे के बल पर अपने-अपने समुदाय के वोटरों को कांग्रेस के पाले में लाने में सफल रहेंगे। कांग्रेस को मुसलमानों से भी काफी उम्मीद है। हालांकि, मुस्लिम वोट जनता दल सेक्युलर (जेडीएस) और कांग्रेस दोनों पार्टियों में जाने की संभावना है।
भाजपा का जातीय गणित
भारतीय जनता पार्टी की बात करें तो, उसकी लिंगायत समुदाय में अच्छी पकड़ है और यह समुदाय परंपरागत तौर पर भाजपा का वोटर रहा है। इसलिये पार्टी भी लिंगायत समुदाय को अपने पाले में मानकर चल रही है और इस समुदाय के बड़े नेता बी.एस. येदियुरप्पा को सामने रखकर चुनाव लड़ रही है। कर्नाटक के मुख्यमंत्री बसवराज बोम्मई भी लिंगायत समुदाय से ही आते हैं।
जबकि, वोक्कालिगा समुदाय के आरक्षण में वृद्धि करने के बाद भाजपा यह मान कर चल रही है कि वोक्कालिगा समुदाय के वोट उसे भी मिलेंगे। कर्नाटक में सरकार बनने के बाद से ही मंत्रालय और पार्टी के संगठन में वोक्कालिगा समुदाय को अहमियत दी गई है। वोक्कालिगा समुदाय जेडीएस और कांग्रेस को परंपरागत रूप से वोट देता रहा है। वहीं, जेडीएस को यह भरोसा है कि वोक्कालिगा समुदाय पहले की तरह उसी के साथ रहेगा। क्योंकि, एच.डी. देवगौड़ा वोक्कालिगा समुदाय के प्रभावी नेता हैं और भारत के प्रधानमंत्री भी रह चुके हैं।
कर्नाटक में मठों की भूमिका
कर्नाटक में लगभग 600 प्रमुख मठ हैं, जिनमें लिंगायत समुदाय के 400, वोक्कालिगा समुदाय के 150 और कुरुबा समुदाय के 80 से ज्यादा मठ हैं। इन तीनों समुदायों के कुल मिलाकर लगभग 38-40 प्रतिशत मतदाता हैं और वे किसी भी सरकार के बनने और बिगड़ने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। अतः इन मठों में नेताओं की हाजिरी लगी रहती है। ऐसे में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ, जो स्वयं एक मठ से हैं, भाजपा के लिए वोट खींचने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।
कर्नाटक महाराष्ट्र सीमा विवाद
हाल ही में महाराष्ट्र की शिंदे सरकार ने कर्नाटक के मराठी भाषी गांवों में स्वास्थ्य योजनाओं का लाभ पहुंचाने के लिए एक बड़ा कदम उठाया है। इस पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कर्नाटक के मुख्यमंत्री बसवराज बोम्मई ने कहा है कि ऐसी कार्यवाहियों को तुरंत रोका जाए, नहीं तो महाराष्ट्र के कन्नड भाषी गांवों में हम भी ऐसा ही कार्यक्रम शुरू करेंगे।
दरअसल, कर्नाटक और महाराष्ट्र के बीच सीमा का विवाद 1950 के दशक से है। क्योंकि, उस समय भाषाई आधार पर साल 1956 में कर्नाटक और साल 1960 में महाराष्ट्र राज्य का गठन हुआ था। उस समय महाराष्ट्र ने यह मांग की थी कि महाराष्ट्र की सीमा से लगे कर्नाटक के 865 गांवों को महाराष्ट्र में मिला देना चाहिए, जो ज्यादातर कर्नाटक के बेलागावी (बेलगाम) जिले में स्थित हैं। बेलागावी में बड़ी संख्या में मराठी भाषी लोग रहते हैं। वहीं, कर्नाटक ने महाराष्ट्र सीमा से सटे 260 कन्नड गांवों पर अपना अधिकार जताया था।
कांग्रेस के नेता सिद्धारमैया ने कहा है कि महाराष्ट्र सरकार के इस फैसले को बर्दाश्त नहीं किया जा सकता। साथ ही, सिद्धारमैया ने बोम्मई सरकार पर कर्नाटक के हितों की रक्षा करने में विफल रहने का आरोप भी लगाया है और उनका इस्तीफा मांगा है। इससे पता चलता है कि कर्नाटक विधानसभा चुनाव में इस मुद्दे की कितनी धमक रहेगी।
सांप्रदायिक ध्रुवीकरण
एक ओर, कांग्रेस ने मुसलमानों के लिए समाप्त किए गए आरक्षण को दोबारा बहाल करने का आश्वासन दिया है। वहीं, हिंदू-मुस्लिम से जुड़े कई अन्य मुद्दे भी चुनावी सरगर्मी बढ़ा सकते हैं, जिनमें टीपू सुल्तान का विवाद भी चुनावी मुद्दा बनने की संभावना है। दरअसल, टीपू सुल्तान कर्नाटक ही नहीं बल्कि देश में एक विवादित नाम रहा है। साल 2015 में कर्नाटक की कांग्रेस सरकार ने टीपू सुल्तान जयंती मनाने का फैसला किया था। वहीं, भाजपा ने इसका विरोध किया था। अब मैसूर के स्थानीय लोगों का कहना है कि टीपू सुल्तान को वोक्कालिगा समुदाय के दो सरदारों उरी गौड़ा और नानजे गौड़ा ने मारा था। भाजपा ने भी इस बात पर सहमति जताई है और कहा है कि टीपू कोई स्वतंत्रता सेनानी नहीं था।
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इस साल के फरवरी महीने में कर्नाटक के यादगीर जिले में स्थित एक सर्कल के नामकरण का भी विवाद चर्चा में रहा। पहले इस सर्कल का नाम मौलाना आजाद सर्कल हुआ करता था। लेकिन, 2010 में इसका नाम बदलकर टीपू सुल्तान सर्कल कर दिया गया। वहीं, हिंदू संगठनों का कहना है कि इस सर्कल का नाम वीर सावरकर के नाम पर रखा जाए।
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