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देश की जनता के नाम जेएनयू का खुला पत्र

प्रिय देशवासियों

मैं कुशल हूं, पता नहीं, लेकिन आपकी कुशलता की कामना करता हूं!

जी हां मैं आपका जेएनयू। आज आपको मैं शायद मजबूर नजर आ रहा हूं। मायूस नजर आ रहा हूं। हां मैं आज रो रहा हूं। कितनी शिद्दत के साथ भविष्यों को निखारने की खातिर मेरी नींव रखी गई थी। उम्मीदों का झोला थमाकर मां बाप ने मेरे साये में सीखने की, जानने की इजाजत दी थी। पर आज उन्हें शर्मिंदगी मेरे नाम से ही है।

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JNU

अधिनियम 1966 का 53 के अंतर्गत भारतीय संसद द्वारा 22 दिसंबर 1966 में मेरी स्थापना की गई थी। पर देशद्रोह के अलाव में मेरी प्रतिष्ठा को खाक कर दिया गया है। मेरे नाम के साथ जुड़ा सबसे अच्छा विद्यालय का तमगा अपनी चमक खो चुका है। तमाम भविष्यों को यहां मैंने बनते हुए देखा। पर आज मेरे साथ, मेरे वतन के साथ ही खिलवाड़ हो गया। पर मेरा गुनाह क्या है। कोई तो बता दो।

दिल छल्ली हो गया जब मेरे देश के टुकड़े टुकड़े करने की बात हुई। चौंक उठा मैं जब अफजल सरीखे लोगों को मेरी छाती पर खड़े होकर न्याय दिलाने की बात कही गई। मैं खूब रोया हूं...नहीं मानते तो मेरी हर ईंट को करीब से छूकर देखो नमीं नजर आएगी तुम्हे।

आज भविष्य ही देश का भविष्य खत्म करने में लगे हैं। कश्मीर की आजादी के नारे लगा रहे लोगों को मैं अभी तक पराये देश का समझ रहा था। मगर चेहरों को देखकर मैं एक लंबी सोच में डूब गया। पाकिस्तान जिंदाबाद के नारों ने मुझे जी भर के यातनाएं दी हैं।

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आज मीडिया देशद्रोहियों के नाम के बदले जेएनयू जेएनयू कर रही है। सारे आरोपों के मेरे ऊपर छिड़क रही है। सच कह रहा हूं मैं गुनहगार नहीं, मैं तो चुपचाप सबकी बातों को सुनता रहा। मुझ पर लगाए गए आरोपों को सीने में दबाकर चुपचाप रोता रहा।

दर्द इस बात का है कि मेरे सारे हमदर्द कहां चले गए। कहां गए कल तक गर्व के साथ मुझे अपना कहने वाले। आज मेरी बद्नामी की खातिर नए नए वीडियो जारी हो रहे हैं। जिनमें देशद्रोही नारे बुलंद आवाजों के साथ मेरे आस पास की हवाओं को जहरीला कर रहे हैं। पूरे भारत देश के लोगों की जुबान पर यही है कि जेएनयू देशद्रोहियों का अड्डा है। पर इसमें मेरा क्या दोष। ये तो सियासतदानों द्वारा फेंका गया वो निवाला है जिसे छात्रों ने कुबूल कर लिया। शिक्षा को राजनीति का नाम दे दिया। बेबस हूं, लाचार हूं क्योंकि ये दाग ताउम्र रहने वाला है।

कल तक लिखता था कि आपका जेएनयू, पर आज मुझे कोई अपने साथ जोड़ने को तैयार नहीं। परिचय में क्या लिखूं ये समझ नहीं आ रहा। बस ये लिखूंगा कि पता नहीं किसका जेएनयू। बहरहाल मैं आज भी सबको अपना मानता हूं।

आपका जेएनयू।

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