Jama Masjid: जामा मस्जिद का महिला विरोधी आदेश, जानिए क्या है जामा मस्जिद का इतिहास

पुरानी दिल्ली की ऐतिहासिक जामा मस्जिद ने अब एक नया आदेश जारी किया है। इस आदेश के तहत लड़कियों के जामा मस्जिद में अकेले प्रवेश करने पर पाबंदी लगा दी गई है। जामा मस्जिद के प्रवेश द्वार पर एक पर्चा लगाया गया है, जिसमें लिखा गया है कि जामा मस्जिद में लड़कियों का अकेले दाखिल करना मना है। यह पर्चा तीनों गेट पर लगा है।

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      हालांकि इस फैसले की सामाजिक कार्यकर्ताओं द्वारा तीव्र आलोचना की जा रही है और इसे कट्टरवादी मानसिकता बताया जा रहा है। लोग कह रहे हैं कि जिस देश के संविधान में महिलाओं को बराबरी का अधिकार मिला है, वहां पर आधी आबादी के साथ कोई ऐसा बर्ताव कैसे कर सकता है? यह आदेश गैरकानूनी और अलोकतांत्रिक हैं।

      जामा मस्जिद के प्रवक्ता ने इस फैसले का बचाव करते हुए कहा है कि जामा मस्जिद में कई जोड़ियां ऐसी आती हैं, जिनका व्यवहार धर्म के अनुसार नहीं होता है। उन्होंने कहा कि सोशल मीडिया के लिए वीडियो बनाने वाली कुछ युवतियां यहां आती हैं और वह नमाज पढ़ने के स्थान तक आ जाती हैं, जिसके कारण नमाजियों को असुविधा होती है।

      जामा मस्जिद का इतिहास
      जामा मस्जिद का निर्माण मुगल बादशाह शाहजहां ने 1656 में करवाया था और यह मस्जिद 23 एकड़ भूमि में फैली हुई है। इस मस्जिद में तीन दरवाजे हैं। मुगल बादशाह इस मस्जिद में जुमे की नमाज अदा किया करते थे। वे पूर्वी दरवाजे से मस्जिद में दाखिल हुआ करते थे।

      जामा मस्जिद में एक साथ 25000 लोग बैठ कर नमाज पढ़ सकते हैं। इस मस्जिद की गिनती विश्व की सबसे बड़े मस्जिदों में होती है। यह दिल्ली के प्रमुख धार्मिक स्थलों में से एक है और देश-विदेश के पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र भी है। इस मस्जिद का उद्घाटन बुखारा (वर्तमान उज्बेकिस्तान) के इमाम सैयद अब्दुल गफूर शाह बुखारी ने किया था।

      1857 के स्वतंत्रता संग्राम में जीत हासिल करने के बाद अंग्रेजों ने जामा मस्जिद पर कब्जा कर लिया था और वहां अपने सैनिकों का पहरा लगा दिया था। इतिहासकारों के अनुसार अंग्रेज शहर के सौंदर्यीकरण के लिए जामा मस्जिद को तोड़ना चाहते थे। लेकिन लोगों के विरोध के कारण उन्हें अपना फैसला बदलना पड़ा।

      जामा मस्जिद की जर्जर स्थिति
      कहा जाता है कि 1948 में हैदराबाद के आखिरी निजाम मीर उस्मान अली खान से मस्जिद के एक चौथाई हिस्से की मरम्मत के लिए 75 हजार रुपये मांगे गए थे। लेकिन निजाम ने तीन लाख रुपये आवंटित किए और कहा कि मस्जिद का बाकी का हिस्सा भी पुराना नहीं दिखना चाहिए।

      गत दो वर्षों से जामा मस्जिद के इमाम अहमद बुखारी मस्जिद की जर्जर स्थिति के बारे में प्रधानमंत्री और अन्य मंत्रियों को पत्र लिख रहे हैं। जामा मस्जिद की जर्जर स्थिति का मामला संसद के दोनों सदनों में भी उठाया जा चुका है।

      इस वर्ष के जनवरी महीने में दिल्ली वक्फ बोर्ड ने जामा मस्जिद की मरम्मत की जिम्मेवारी ली थी और एक कमेटी का भी गठन किया था, जो मरम्मत के लिए न सिर्फ चंदा इकट्ठा करेगी, बल्कि वह इस संदर्भ में विशेषज्ञों से संपर्क भी स्थापित करेगी। इस कमेटी ने जामा मस्जिद की मरम्मत के लिए आगा खान फाउंडेशन सहित अन्य संगठनों से भी संपर्क करने का फैसला किया था।

      बताया जाता है कि प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह के कार्यकाल में ही जामा मस्जिद की मरम्मत का एक प्रारूप तैयार किया गया था, जिसके तहत इस मस्जिद की मरम्मत पर 100 करोड़ रुपये खर्च करने का अनुमान लगाया गया था, मगर वी पी सिंह सरकार का तख्ता पलट जाने के बाद यह योजना खटाई में पड़ गई।

      इसी वर्ष के मई महीने में दिल्ली में आए जबर्दस्त तूफान के कारण जामा मस्जिद के बड़े गुंबद पर लगा कलश टूटकर नीचे गिर गया था। जामा मस्जिद को हुए इस नुकसान के बाद मस्जिद के शाही ईमाम अहमद बुखारी ने कहा कि कांग्रेस के शासनकाल में भारत सरकार इस मस्जिद की मरम्मत करवाती रही है, मगर अब जो सरकार सत्तारूढ़ है, उसे इस मस्जिद के रखरखाव में कोई रुचि नहीं है। उन्होंने जनता से अपील की कि वे इस ऐतिहासिक धरोहर के संरक्षण के लिए धनराशि प्रदान करने के लिए आगे आएं।

      विरोध-प्रदर्शनों का अड्डा
      देश में मुसलमानों से जुड़ी अगर कोई घटना होती है, तो उसके विरोध में जामा मस्जिद के बाहर अक्सर प्रदर्शन होते रहते हैं। इसी वर्ष के जून महीने में नुपूर शर्मा और नवीन जिंदल द्वारा पैगम्बर मोहम्मद के कथित अपमान के खिलाफ जामा मस्जिद में उग्र प्रदर्शन हुए। 2019 में जब देश की संसद में नागरिकता संशोधन विधेयक पारित हुआ तो उसके खिलाफ भी जामा मस्जिद में जबर्दस्त उग्र प्रदर्शन हुए थे।

      जामा मस्जिद और राजनीति
      नवंबर 2014 में दिल्ली की जामा मस्जिद के शाही इमाम अहमद बुखारी ने अपने छोटे बेटे के दस्तारबंदी समारोह में तत्कालीन पाकिस्तानी प्रधानमंत्री नवाज शरीफ को तो आमंत्रित किया, लेकिन भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को न्योता नहीं भेजा।

      अहमद बुखारी ने इस अवसर पर कहा कि नरेन्द्र मोदी को प्रधानमंत्री बने चार महीने हो गए, लेकिन अभी तक वे एक खास वर्ग का ही प्रतिनिधित्व कर रहे हैं। वे देश की तमाम जनता के प्रतिनिधि नहीं हैं। उन्होंने कहा कि गुजरात दंगों के घाव अभी तक भारतीय मुसलमानों के दिल में जिंदा हैं। इसलिए वे नरेन्द्र मोदी को निमंत्रण नहीं देंगे। हालांकि बुखारी ने भाजपा के कुछ नेताओं को इस अवसर पर आमंत्रित किया था।

      जामा मस्जिद को मुसलमानों का राजनीतिक केंद्र भी बनाने का प्रयास किया गया। इसकी शुरुआत वर्तमान शाही इमाम सैयद अहमद बुखारी के पिता सैयद अब्दुल्ला बुखारी ने 1970 के दशक में की थी। अब्दुल्ला बुखारी, जो उस समय जामा मस्जिद के शाही इमाम थे, ने जामा मस्जिद पर अपना आधिपत्य स्थापित करने के लिए अपने राजनीतिक संबंध स्थापित करने शुरू किए।

      उन्होंने इंदिरा गाँधी के परिवार नियोजन कार्यक्रम, विशेषकर नसबंदी के समर्थन में एक फतवा जारी किया। अब्दुल्ला बुखारी ने 1977 में जनता पार्टी के लिए, 1980 और 1984 में कांग्रेस के लिए और 1989 में जनता दल के लिए राजनीतिक फतवे जारी किए।

      उनकी इस राजनीतिक विरासत को उनके बेटे अहमद बुखारी ने भी आगे बढ़ाया। अहमद बुखारी ने 2004 में मुसलमानों से भारतीय जनता पार्टी के पक्ष में वोट डालने की अपील की। तब प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी थे। वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव में अहमद बुखारी ने मुसलमानों से कांग्रेस, टीएमसी और आरजेडी को वोट देने की अपील की। हालांकि, 2019 के लोकसभा चुनाव में उन्होंने किसी भी पार्टी के समर्थन में अपील नहीं की।

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