Jagannath Rath Yatra: जानें भगवान जगन्नाथ की रथ यात्रा समेत तीनों रथों के बारे में
Jagannath Rath Yatra: भारत के पवित्र धामों में एक ओडिशा के पुरी में स्थित जगन्नाथ मंदिर की विश्व प्रसिद्ध रथ यात्रा की तैयारियां जोरों पर हैं। हिंदू पंचांग के अनुसार हर वर्ष यह यात्रा आषाढ़ माह के शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि से शुरू होकर आषाढ़ शुक्ल की दशमी तक चलती है।
भगवान जगन्नाथ की इस रथ यात्रा में उनके साथ भाई बलराम और बहन सुभद्रा भी शामिल होती हैं। भगवान की यह रथ यात्रा पुरी के मंदिर से निकलते हुए गुंडिचा मंदिर जाती है। इस गुंडिचा मंदिर में भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा तीनों ही आषाढ़ माह के शुक्ल पक्ष की दशमी तक रुकते है। फिर इसके बाद वापस अपने पुरी के मंदिर में वापस लौट आते हैं। भगवान जगन्नाथ की इस यात्रा में शामिल होने के लिए हर वर्ष दुनियाभर से उनके लाखों श्रद्धालु पुरी पहुंच रथ यात्रा में शामिल होते हैं।

क्यों निकाली जाती है रथ यात्रा?
जगन्नाथ रथ यात्रा क्यों निकलती है इसके पीछे भक्तों के बीच कई अलग-अलग कहानियां और मत हैं। जगन्नाथ दो शब्दों के मेल से बना है। इसमें जग का अर्थ ब्रह्मांड और नाथ का अर्थ भगवान से है। भगवान जगन्नाथ को श्रीकृष्ण का रूप माना जाता है, जो कि स्वयं भगवान विष्णु के अवतारों में एक हैं। हालांकि, इस रथ यात्रा के बारे में स्कंद पुराण, नारद पुराण, पद्म पुराण और ब्रह्म पुराण में भी विस्तार से बताया गया है।
इस रथ यात्रा को लेकर धार्मिक मान्यता यह चली आ रही है कि भगवान जगन्नाथ की बहन सुभद्रा ने एक बार उनसे नगर देखने की इच्छा जाहिर की थी। तब भगवान जगन्नाथ और बलराम ने अपनी बहन सुभद्रा को रथ पर बैठाकर नगर दिखाया था। इस दौरान वह मौसी के घर गुंडिचा मंदिर भी गये और वहां सभी लोग नौ दिन तक ठहरे थे। ऐसा कहा जाता है कि तभी से इस परंपरा को निभाया जा रहा है। हालांकि, इस रथ यात्रा को लेकर कई और मान्यताएं भी हैं।
एक दूसरी मान्यता के मुताबिक रथ यात्रा के पीछे का पौराणिक मत यह है कि स्नान पूर्णिमा (ज्येष्ठ पूर्णिमा) के दिन भगवान जगन्नाथ का जन्म होता है। तब भगवान जगन्नाथ को उनके बड़े भाई बलराम और बहन सुभद्रा के साथ रत्नसिंहासन से उतार कर मंदिर के पास बने स्नान मंडप में लाया जाता है। जहां उन्हें 108 कलशों से स्नान कराया जाता है। मान्यता यह है कि इसी स्नान से भगवान बीमार हो जाते हैं उन्हें ज्वर आ जाता है। इसके बाद उन्हें 15 दिन तक एक विशेष कक्ष (ओसर घर) में प्रमुख सेवकों और वैद्यों की देखरेख रखा जाता है। इस दौरान मंदिर में महाप्रभु के प्रतिनिधि अलारनाथ जी की प्रतिमा रखी जाती है और उनकी पूजा होती है। जब 15 दिन बाद भगवान जगन्नाथ स्वस्थ हो जाते हैं तब वो अपने भक्तों को दर्शन देने के लिए बाहर निकलते हैं। जिसे नव यौवन नैत्र उत्सव भी कहते हैं।
तीनों रथों की अलग-अलग है पहचान
इस रथ यात्रा के लिए तीन अलग-अलग रथ बनाये जाते हैं। जब रथ यात्रा शुरू होती है तब सबसे आगे वाला रथ भगवान बलराम का होता है। इसके बाद देवी सुभद्रा और सबसे पीछे वाला रथ भगवान जगन्नाथ का होता है।
गरुड़ ध्वज/कपिल ध्वज: भगवान जगन्नाथ का रथ 'गरुड़ ध्वज' या 'कपिल ध्वज' कहलाता है। जिसमें लाल व पीले रंग के वस्त्र का प्रयोग होता है। दरअसल भगवान विष्णु का वाहन गरूड़ हैं, इसलिए इसे गरूड़ ध्वज कहा गया है, मान्यता है कि वे इस रथ की रक्षा करते हैं। रथ पर जो ध्वज है, उसे त्रैलोक्यमोहिनी या नंदीघोष भी कहते हैं। यह रथ 16 पहियों वाला होता है, साथ ही 13.5 मीटर ऊंचा होता है।
तालध्वज: बलराम का रथ तालध्वज के नाम से जाना जाता है। यह लाल, हरे रंग के कपड़े व लकड़ी के 763 टुकड़ों से बना होता है। रथ के रक्षक वासुदेव और सारथी मताली होते हैं। यह रथ 13.2 मीटर ऊंचा और 14 पहियों का होता है। इस रथ के ध्वज को उनानी कहते हैं। त्रिब्रा, घोरा, दीर्घशर्मा व स्वर्णनावा इसके अश्व माने गये हैं, वहीं जिस रस्सी से रथ खींचा जाता है, वह वासुकी कहलाता है।
पद्म ध्वज: सुभद्रा का रथ पद्म ध्वज कहलाता है। इस रथ की रक्षक जयदुर्गा व सारथी अर्जुन होते हैं। रथध्वज नदंबिक कहलाता है। यह रथ 12.9 मीटर ऊंचे और 12 पहियों वाला होता है। इस रथ में लाल, काले कपड़े के साथ लकड़ी के 593 टुकड़ों का प्रयोग होता है। रोचिक, मोचिक, जिता व अपराजिता इसके अश्व होते हैं। इसे खींचने वाली रस्सी को स्वर्णचूड़ा कहते है।
सोने के झाडू से रास्ते की होती है साफ-सफाई
जब भगवान गजन्नाथ, बलराम और देवी सुभद्रा के रथ तैयार हो जाते हैं। इसके बाद इसकी पूजा के लिए पुरी के गजपति राजा की पालकी आती है। इस पूजा अनुष्ठान को 'छर पहनरा' नाम से जाना जाता है। इन तीनों रथों की वे विधिवत पूजा करते हैं और इसके बाद 'सोने के झाड़ू' से रथ मंडप और यात्रा वाले रास्ते को साफ किया जाता है।
जगन्नाथ पुरी मंदिर का इतिहास
उड़ीसा के पुरी में स्थित जगन्नाथ मंदिर भारत के पवित्र चार धामों (बद्रीनाथ, द्वारका, जगन्नाथ पुरी और रामेश्वरम) में से एक है। यह वैष्णव मंदिर श्री हरि के अवतार श्रीकृष्ण को समर्पित है। बता दें कि वैसे तो पूरे साल भगवान जगन्नाथ, बलराम और सुभद्रा की पूजा मंदिर के गर्भगृह में होती है, लेकिन आषाढ़ माह में तीन किलोमीटर की अलौकिक रथ यात्रा के जरिये ये भक्तों को बाहर दर्शन देते हैं। जगन्नाथ पुरी का वर्तमान मंदिर लगभग 800 वर्ष पुराना है।
वैसे जगन्नाथ मंदिर में स्थापित मूर्तियों को लेकर भी कई मान्यताएं चलती आ रही हैं, जिसमें सबसे ज्यादा प्रचलित मान्यता ये है कि पुरी में हजारों साल पहले एक राजा थे इंद्रद्युम्न। एक रोज भगवान जगन्नाथ उनके सपने में आये और उन्हें समुद्र में बहती हुई लकड़ियों के बारे में बताते हुए कहा कि इन लकड़ियों से हमारी मूर्ति की रचना करो। तब राजा ने भगवान की आज्ञा मानकर समुद्र से बहती हुई लकड़ियों को इकट्ठा करके बढ़ई से मूर्ति बनाने को कहा। यह बढ़ई के रूप में स्वयं विश्वकर्मा जी थे।
तब बढ़ई (विश्वकर्मा जी) ने यह शर्त रखी कि वे एक माह में मूर्ति तैयार कर देंगे, लेकिन तब तक वह एक कमरे में बंद रहेंगे और राजा या कोई भी उस कमरे के अंदर नहीं आये। माह के अंतिम दिन जब कई दिनों तक कोई भी आवाज नहीं आयी, तो उत्सुकता वश राजा ने कमरे में झांका और वह वृद्ध कारीगर द्वार खोलकर बाहर आ गया और राजा से कहा कि मूर्तियां अभी अपूर्ण हैं। उनके हाथ अभी नहीं बने थे। राजा के अफसोस करने पर मूर्तिकार ने बताया कि यह सब दैववश हुआ है और यह मूर्तियां ऐसे ही स्थापित होकर पूजी जायेंगी। इसी कारण भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा की मूर्तियां अधूरी ही रह गईं। उसी दिन से आज तक मूर्तियां इसी रूप में यहां विराजमान हैं।
इस बार कब निकाली जाएगी रथ यात्रा?
साल 2023 में भगवान जगन्नाथ की रथ यात्रा 20 जून को रात्रि 10 बजकर 04 मिनट पर शुरू होगी और यात्रा का समापन 21 जून को शाम 07 बजकर 09 मिनट पर होगा। इस दौरान भगवान जगन्नाथ पूरे नगर का भ्रमण करेंगे और गुंडिचा मंदिर में इस भव्य यात्रा को विश्राम दिया जायेगा।
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