Gaza Strip: क्या है गाज़ा पट्टी, जिसके लिए हजारों ने जान गवायीं, लाखों हुए बेघर
Gaza Strip: इज़राइल ने दस लाख से अधिक लोगों को उत्तरी गाजा छोड़ने का निर्देश दिया है। उसका मकसद हमास के हर ठिकाने को ध्वस्त करना बताया जा रहा है। लेकिन मुस्लिम देश यह प्रचार करने में लगे हैं कि इजराइल गाज़ा में रह रहे सभी 23 लाख लोगों को उजाड़ कर उस पर पुनः कब्ज़ा करने की योजना बना रहा है। उल्लेखनीय है कि ग़ाज़ा में ज्यादातर नागरिक 1948 के अरब-इज़राइली युद्ध के दौरान विस्थापित लोगों के ही वंशज हैं। भले ही इस आरोप में कम दम हो कि इजराइल ग़ाज़ा पर कब्ज़ा करने की नीयत से वहां घुसा है, पर इसमें संदेह नहीं कि वह इस क्षेत्र को ऐसा बना देना चाहता है, जहां वर्षों तक इजरायल के किसी विरोधी के रहने की गुंजाईश न हो।
इजराइली अखबार येदिओथ अहरोनोथ में मेजर जनरल जियोरा एइलैंड ने लिखा भी है, "इजरायल के पास गाजा को एक ऐसी जगह में बदलने के अलावा कोई चारा नहीं है, जहां अस्थायी या स्थायी रूप से रहना असंभव हो। उन्होंने आगे लिखा है - "गाजा एक ऐसी जगह बन जाएगी जहां कोई इंसान नहीं रह पाएगा।" इजराइल के रक्षा मंत्री योव गैलेंट ने कहा, "हम मानव रूपी जानवरों से लड़ रहे हैं, और हम उसी के अनुसार कार्य कर रहे हैं।" मेजर जनरल घासन एलियन ने घोषणा की है कि गाजा में "न बिजली होगी और न पानी। विनाश ही होगा। तुम नर्क चाहते थे; तुम्हें नरक ही मिलेगा।"।

दूसरा नकबा
कुछ आलोचक इजराइल की इस कार्रवाई को दूसरा नकबा की संज्ञा दे रहे हैं। फिलिस्तीनी हर 15 मई को नकबा, या "तबाही" के दिन के रुप में याद करते हैं, क्योंकि 1948 में इसी दिन इज़राइल अस्तित्व में आया। तब फिलिस्तीनियों को भारी संख्या में बेदखली का सामना करना पड़ा था। इज़राइल का गठन एक हिंसक प्रक्रिया के साथ ही हुआ था। 1947 और 1949 के बीच, 19 लाख की आबादी में से कम से कम साढ़े सात लाख फिलिस्तीनियों को इजरायल की सीमाओं के बाहर खदेड़ कर शरणार्थी बना दिया गया था। इस हिंसा में लगभग 15,000 फ़िलिस्तीनियों की जान भी गयी थी।
फिलिस्तीनी चरमपंथियों, जिसमें मुख्य रूप से हमास है, और इज़रायली सेना के बीच लगातार हिंसक संघर्ष हो रहा है। 2006 से लेकर हालिया घेराबंदी तक छह बार गाजा में इजराइली सेना घुस चुकी है। इज़राइल का दावा है कि संयुक्त राष्ट्र के अनुसार, यह क्षेत्र अभी भी अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत कानूनी रूप से इजरायली सैन्य के कब्जे में है। इसी अधिकार के तहत इज़राइल ने गाज़ा पट्टी से बिजली, पानी और ईंधन की आपूर्ति रोक दी।
गाजा पट्टी का इतिहास व भूगोल
प्रथम विश्व युद्ध (1914-18) में ओटोमन साम्राज्य का शासन समाप्त होने के बाद, गाजा क्षेत्र ब्रिटिश शासन के अधीन आ गया, फिर राष्ट्र संघ द्वारा जनादेश कराये जाने के बाद फिलिस्तीन का हिस्सा बन गया। नवंबर 1947 में संयुक्त राष्ट्र (यूएन) की महासभा ने अरब-यहूदी विभाजन की योजना को स्वीकार कर लिया, जिसके तहत गाजा शहर और आसपास के क्षेत्र अरबों को आवंटित किया जाना था, परन्तु ब्रिटिश शासनादेश 15 मई, 1948 को समाप्त हो गया और उसी दिन पहला अरब-इजरायल युद्ध शुरू हुआ।
1948 में भारी लड़ाई के परिणामस्वरूप, अरब कब्जे वाले शहर के आसपास का क्षेत्र 25 मील (40 किमी) लंबे और 4-5 मील (6-8 किमी) चौड़े क्षेत्र की एक पट्टी में सिमट गया। यह क्षेत्र गाजा पट्टी के नाम से जाना जाने लगा। गाजा पट्टी सिनाई प्रायद्वीप के उत्तर-पूर्व में भूमध्य सागर के साथ 140 वर्ग मील (363 वर्ग किमी) का क्षेत्र है। गाजा पट्टी एक घनी आबादी वाला क्षेत्र होने के साथ साथ फिलिस्तीन शरणार्थियों का बसेरा है। 2023 में इसकी अनुमानित जनसंख्या 22,26,544 है।
गाजा पट्टी अपेक्षाकृत समतल तटीय मैदान पर स्थित है। यह दुनिया में सबसे तेजी से बढ़ रही आबादी वाला क्षेत्र बन गया है। शांति के समय में कुछ फ़िलिस्तीनी छोटी-मोटी नौकरियाँ करने प्रतिदिन इज़राइल जाते थे। उन्हें वहां रात को रुकने की अनुमति नहीं है। इजरायली अपनी सीमा बंद ही रखते हैं। गाजा पट्टी के कुछ हिस्सों को पड़ोसी मिस्र से जोड़ने वाली भूमिगत सुरंगे भी हैं। इन सुरंगों से फ़िलिस्तीनी भोजन, ईंधन, दवा, इलेक्ट्रॉनिक्स और हथियारों की तस्करी भी करते हैं।
मिस्र के सैन्य शासन के अधीन रही गाजा पट्टी
गाजा पट्टी 1949 से 1956 तक और फिर 1957 से 1967 तक मिस्र के सैन्य शासन के अधीन रही, लेकिन मिस्र सरकार ने इसे अपना क्षेत्र नहीं माना और ना ही शरणार्थियों को मिस्र का नागरिक बनने की अनुमति दी। शरणार्थियों का भरण-पोषण यूएन आरडब्ल्यूए की सहायता से किया जाता रहा।
1956 में एक बार इस पट्टी पर इज़राइल ने कब्जा कर लिया था, पर अंतरराष्ट्रीय दबाव के बाद 1957 में यह पट्टी मिस्र को पुनः सौंप दी गई। जून 1967 में छह-दिन के युद्ध के बाद गाजा पट्टी पर फिर से इज़राइल ने कब्जा कर लिया। 1994 में इज़राइल ने ओस्लो समझौते की शर्तों के तहत गाजा पट्टी में फिलिस्तीनी प्राधिकरण बनाने पर सहमति व्यक्त कर दी और फिलिस्तीन लिबरेशन ऑर्गनाइजेशन (पीएलओ) ने भी इस पर हस्ताक्षर किए ।
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