1965-जब जंग से पहले और बाद में भारत ने लड़ी अर्थव्यवस्था से जंग
बेंगलुरु। भारत और पाकिस्तान के बीच वर्ष 1965 में हुई जंग से पहले और बाद भारत की अर्थव्यवस्था ने भी एक जंग लड़ी थी। यह वह दौर था जब भारत को आजादी मिले हुए कुछ वर्ष ही बीते थे।

साथ ही इस जंग से उसके पास मौजूद हथियार और दूसरे सैनिका साजो-सामान को भी बड़ा नुकसान पहुंचा था। साथ ही दूसरे कई पश्चिमी देशों की ओर से भी जंग के बाद भारत के खिलाफ कड़ा रुख अख्तियार कर लिया गया था।
आर्थिक हालात पर जंग लड़ रहा था देश
वर्ष 1950 से ही देश घाटे को झेल रहा था जो 60 के दशक तक पहुंचते-पहुंचते दोगुना हो गया था। देश का बजट घाटे में था और ऐसे में सरकार न तो विदेश से मदद मांग सकती थी और न ही निगेटिव रेटिंग वाले प्राइवेट सेक्टर से मदद मांग सकती थी।
भारत की हालत ऐसी नहीं थी कि वह कोई भी जंग को बर्दाश्त कर पाता। इस जंग से सिर्फ तीन वर्ष पहले ही चीन ने भी भारत को 62 की जंग के साथ आर्थिक दर्द दिए थे।
पहले से ही महंगाई, बुरे मॉनसून और स्थिर होने की कोशिशों से जूझ रहे देश को 1965 में जंग का सामना करना पड़ गया। सुधार के जो भी कदम उठाए जाने थे या फिर उठाए गए, उन्हें इस जंग ने तोड़ कर रख दिया था।
अमेरिका ने रोकी मदद
इस जंग के बाद अमेरिका जैसे ताकतवर देश पाकिस्तान के पक्ष में आ गए थे। पाक के साथ उनका रवैया दोस्ताना था। इसका नतीजा था कि जो मदद अमेरिका और दूसरे देशों से भारत को मिल रही थी, उसे बंद कर दिया गया।
भारत पहले ही मूलभूत जरूरतों की चीजों को अमेरिका और दूसरे देशों से आयात कर रहा था। जंग के बाद मदद बंद हुई तो मुश्किलें और बढ़ गई थीं। मदद पर लगी रोक ने भारत की कमर तोड़ कर रख दी थी।
आर्थिक हालातों ने किया मजबूर
बताते हैं कि भारत और पाकिस्तान के अंदरुनी आर्थिक हालातों ने दोनों देशों को मजबूर किया कि वह अपनी वास्तविक स्थिति में वापस लौट जाएं। इस जंग के बाद अमेरिका ने पाक को सैनिक साजो-सामान देने पर पांबदी लगा दी।
यह पाबंदी भारत पर भी लगी थी लेकिन फ्रांस, ब्रिटेन और रूस पर निर्भर होने की वजह से भारत पर इसका ज्यादा असर नहीं पड़ा लेकिन पाक को इससे काफी बुरी चोट लगी। पाक में महंगाई एक नए स्तर को छु गई और जनता को भी कई तरह की मुश्किलों का सामना करना पड़ गया।












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