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First Loksabha Election: कैसे हुआ था भारत का पहला लोकसभा चुनाव, जानें कुछ रोचक बातें

First Loksabha Election: अंग्रेजों की गुलामी से जब देश स्वतंत्र हुआ तब किसी ने कल्पना नहीं की थी कि भारत संसदीय लोकतंत्र अपनाकर दुनिया की सबसे बड़ी चुनाव प्रक्रिया वाला राष्ट्र बनेगा। आगामी लोकसभा चुनाव में लगभग 98 करोड़ मतदाता हिस्सा लेंगे। मतदाताओं की संख्या के हिसाब से यह दुनिया का सबसे बड़ा चुनाव होने वाला है।

1947 में स्वतंत्र होते समय भारत विभाजित हो चुका था और आर्थिक रूप से बहुत कमजोर था। उन दिनों को देखते हुए तो आज तक लोकतंत्र की मजबूती के रूप में लगातार चुनावों का सफल आयोजन एक अविश्वसनीय उपलब्धि ही कहा जा सकता है। इसकी नींव पड़ी थी देश के पहले आम चुनाव से ही। ये चुनाव 1951-52 में आयोजित किए गए थे।

How India s first Loksabha election was held

पहले लोकसभा चुनाव की कहानी

आजादी के बाद लोकसभा की 489 सीटों के लिए देश का पहला संसदीय चुनाव भारतीय चुनाव आयोग द्वारा आयोजित किया गया था, जिसका गठन एक साल पहले ही किया गया था। पहले आम चुनाव में लोकसभा की 489 सीटों के लिए कुल 1,949 उम्मीदवारों ने चुनाव लड़ा। वहीं मतदान केंद्रों पर प्रत्येक उम्मीदवार को अलग-अलग रंग की मतपेटी आवंटित की गई थी, जिस पर प्रत्येक उम्मीदवार का नाम और चुनाव चिन्ह लिखा हुआ था।

इस चुनाव में मतदाता सूची को टाइप करने और मिलान करने के लिए छह महीने के अनुबंध पर 16,500 क्लर्कों को नियुक्त किया गया था और नामावली को मुद्रित करने के लिए 380,000 रीम कागज का उपयोग किया गया था। साल 1951 की जनगणना के अनुसार पूरे देश की आबादी 36,10,88,090 (जम्मू और कश्मीर को छोड़कर) थी। जबकि कुल योग्य मतदाताओं की पंजीकृत संख्या 17,32,12,343 थी। जिसकी वजह से भारत विश्व का सबसे बड़ा घोषित लोकतांत्रिक देश बन गया। हालांकि, तब 18 साल नहीं बल्कि 21 से अधिक आयु के लोगों को ही मतदान करने का अधिकार था। जिसमें करीब 85 प्रतिशत मतदाता निरक्षर थे।

4 महीना, 68 चरण और 1949 उम्मीदवार

शायद आपको विश्वास नहीं होगा, लेकिन भारत का पहला आम चुनाव 68 चरणों में कराया गया था। तब इस चुनाव में 533 निर्दलीय समेत 1,949 उम्मीदवार और 14 राष्ट्रीय दल (नेशनल पार्टी) समेत 53 राज्य स्तरीय पार्टियों ने हिस्सा लिया था। जिसमें 22 पार्टियों ने कम से कम एक सीट पर जीत दर्ज की थी।

इस चुनाव से पहले 29 राजनीतिक दलों ने आयोग से राष्ट्रीय दल का दर्जा मांगा था लेकिन केवल 14 को ही राष्ट्रीय दर्जा देने का निर्णय लिया गया था। हालांकि, जब चुनाव नतीजे आए तब केवल चार को ही राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा मिला। ये दल- कांग्रेस, प्रजा सोशलिस्ट पार्टी (सोशलिस्ट पार्टी और किसान मजदूर पार्टी के विलय से बना दल), भाकपा और जनसंघ थे।

पहला आम चुनाव 25 अक्टूबर, 1951 से शुरू हुआ और 21 फरवरी 1952 को खत्म हुआ था। तकरीबन चार महीने चले इस चुनाव के लिए कुल 196,084 मतदान केंद्र बनाए गए, जिनमें से 27,527 बूथ महिलाओं के लिए आरक्षित किए गए थे।

हालांकि, अधिकांश सीटों पर मतदान तो 1952 की शुरुआत में हुआ था लेकिन हिमाचल प्रदेश में 1951 में ही मतदान हो गया था। क्योंकि, फरवरी और मार्च में यहां भारी बर्फबारी होती थी। इस तरह भारत के इतिहास में लोकसभा चुनाव का पहला वोट हिमाचल में चिनी तहसील में डाला गया था। तब चार महीने चली इस चुनाव प्रक्रिया में हर वोटर पर 60 पैसे आयोग द्वारा खर्च किए गए थे।

इन पार्टियों ने बनाया इतिहास

आजादी के संघर्ष में हिस्सा लेने के कारण कांग्रेस का नाम पहले से ही लोग जानते थे। इसका फायदा कांग्रेस को मिला और वह 364 सीटें जीत कर सत्ता में आ गई। जबकि भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी 16 सीटें जीतकर दूसरी सबसे बड़ी पार्टी बनीं।

आचार्य नरेंद्र देव, जयप्रकाश नारायण और डॉ. राम मनोहर लोहिया के नेतृत्व वाली सोशलिस्ट पार्टी को 12 सीटें, आचार्य जेबी कृपलानी के नेतृत्व वाली किसान मजदूर प्रजा पार्टी को 9, जबकि हिंदू महासभा को 4, डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी के नेतृत्व वाले भारतीय जनसंघ को 3 सीटें मिलीं थीं। इस चुनाव में 45 प्रतिशत वोट हासिल कर कांग्रेस के नेता जवाहरलाल नेहरू देश के पहले लोकतांत्रिक रूप से निर्वाचित प्रधानमंत्री बने।

तब देश में नेहरू की थी 'गूंज'

वैसे तो इस चुनाव में देश के कई बड़े नेता मैदान में थे लेकिन तब सुर्खियों में सबसे ज्यादा जवाहर लाल नेहरू ही रहे थे। इस चुनाव में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की ओर से नेहरू ही स्टार प्रचारक थे। उन्होंने अपने चुनाव प्रचार अभियान के तहत 40 हजार किलोमीटर की यात्रा की थी और करीब साढ़े तीन करोड़ लोगों को सभाओं के जरिए संबोधित किया था।

यही कारण था कि चुनाव में तब कांग्रेस पार्टी को 45 प्रतिशत वोट मिले थे। उस चुनाव में ज्यादातर पार्टियों का मुद्दा आजाद भारत के पुनर्निर्माण, जीवन यापन, आम नागरिकों के अधिकार, राजनीतिक पार्टियों के ढांचे, अर्थव्यवस्था, समाज, संस्कृति और धर्म को लेकर था।

गरीब देश, अशिक्षित मतदाता और मतपेटी बनी चुनौती

आज इस बात की कल्पना करना कठिन है कि अंग्रेजों द्वारा लूटा-पीटा और अनपढ़ बनाया गया भारत जैसा एक कंगाल देश। जहां न सड़क, न पानी, न शिक्षा और न बिजली की व्यवस्था थी। बावजूद इसके घर-घर जाकर मतदाताओं का नाम सूची में शामिल करने और उन्हें चुनाव के लिए उत्साहित करना कितना कठिन काम था।

तब अशिक्षा के कारण सबसे बड़ी समस्या ये आई थी कि उत्तर भारत के क्षेत्रों में बड़ी संख्या में अशिक्षित महिलाएं अपना नाम तक नहीं बोलती थीं और उनके नाम फलां की पत्नी, फलां की बेटी के रूप में लिख दिए जाते थे। तब चुनाव आयोग ने एक मुहिम चलाकर महिलाओं से अपना नाम लिखवाने का अनुरोध किया और ऐसे लाखों नाम मतदाता सूचियों से हटा दिए गए जिनमें महिला के खुद के नाम के स्थान पर उनके पति या पिता का ही नाम था।

चुनाव आयोग ने मतदाताओं की अशिक्षा के कारण यह भी समझा कि वे उम्मीदवारों के नाम पढ़ नहीं पाएंगे, इसलिए उन्हें और पार्टियों के लिए ऐसे चुनाव चिन्ह देने होंगे, जो आसानी से पहचानने योग्य हो और किसी की भावनाओं को ठेस पहुंचाने वाला न हो। तब कांग्रेस को 'दो बैलों की जोड़ी' को दर्शाने वाला एक चिन्ह आवंटित किया गया था।

अन्य राष्ट्रीय दलों में सोशलिस्ट पार्टी (बड़ा पेड़), किसान मजदूर प्रजा पार्टी (झोपड़ी), अखिल भारतीय राम राज्य परिषद (उगता सूरज), बोल्शेविक पार्टी ऑफ इंडिया (एक सितारा) और अखिल भारतीय जन संघ (दीपक/दीप) चुनाव चिन्ह मिला था।

इन जुगाड़ों से पहुंचाई गई मतपेटियां

तब आयोग द्वारा हर पार्टी के लिए अलग मतपेटी रखी जाती थी, जिन पर उनके चुनाव चिन्ह अंकित कर दिए गए थे। इसके लिए लोहे की 2 करोड़ 12 लाख मतपेटियां बनाई गई थीं और करीब 62 करोड़ मतपत्र छापे गए थे।

लोहे की इन मतपेटियों और मतपत्रों को मतदान केंद्रों तक पहुंचाना आयोग के लिए एक बहुत बड़ी चुनौती थी। क्योंकि, तब सड़क मार्ग भी सुगम नहीं थे। पहाड़ों, जंगलों, मैदानी और दलदली इलाकों में नियत स्थान तक पहुंचने के लिए काफी मशक्कत करनी पड़ी थी। तब मतदान पेटियों को मतदान केंद्रों तक पहुंचाने के दौरान कई कर्मचारी बीमार पड़ गए और कुछ की मृत्यु भी हो गई थी। जबकि कई जगहों पर मतपेटियों को ही लूट लिया गया था।

नॉर्थ-ईस्ट के जंगली और पहाड़ी क्षेत्रों में तो स्थानीय लोगों को यह कहकर मनाया गया था कि आप इस मतदान पेटियों और मतपत्रों को नियत स्थानों पर पहुंचाने में मदद करेंगे तो बदले में कंबल और बंदूक के लाइसेंस दिए जाएंगे।

इसी तरह राजस्थान के विशाल रेगिस्तानी क्षेत्रों में भी कई कठिनाइयों को सामना करना पड़ा था। जैसलमेर और जोधपुर जैसे कुछ रेगिस्तानी जिलों में तो ऊंटों के सहारे मतदान पेटियों और मतदान पत्रों को पहुंचाया गया था। इसके लिए बड़ी संख्या में ऊंटों को किराए पर लेना पड़ा था।

सुकुमार सेन थे पहले मुख्य चुनाव आयुक्त

कोलकाता के प्रेसीडेंसी कॉलेज और लंदन विश्वविद्यालय से पढ़े सुकुमार सेन को स्वतंत्र भारत का पहला मुख्य चुनाव आयुक्त नियुक्त किया गया था। मतदाताओं के पंजीकरण, राजनीतिक दलों के चुनाव चिन्हों का निर्धारण, पोलिंग बूथ तक मतपेटियों को पहुंचाना व बिना किसी तरह की हिंसा के साफ-सुथरा चुनाव कराने का पूरा जिम्मा सुकुमार सेन को ही जाता है।

उनके बारे में कहा जाता है कि वे सरकारी खजाने के पैसे की बहुत चिंता किया करते थे। इसका उदाहरण ये था कि चुनाव के बाद मतपेटियों को सुरक्षित रखने के लिए जितना संभव हुआ उन्होंने मतपेटियों को सुरक्षित रखने की व्यवस्था की। ताकि, 1957 के दूसरे आम चुनाव में भी उनका इस्तेमाल हो सके। एक रिपोर्ट के मुताबिक मतपेटियों को सुरक्षित कर करीब साढ़े चार करोड़ रुपये सरकारी खजाने के बचाए गए थे।

पहले आम चुनाव की सफलता के बाद 1953 में सूडान ने भारतीय चुनाव मॉडल को अपनाया था। देश के मुख्य निर्वाचन आयुक्त सुकुमार सेन की निगरानी में ही नवंबर-दिसंबर 1953 में सूडान में आम चुनाव कराए गए थे। वैसे सुकुमार सेन का कार्यकाल 21 मार्च 1950 से 19 दिसंबर 1958 तक रहा।

एक संसदीय सीट और सांसदों की संख्या दो-तीन?

पहले लोकसभा चुनाव की बात करें तो डॉ. अमूल देसाई ने 173 वोटों से मोरारजी देसाई को हरा दिया था। तब मोरारजी देसाई और उनके सहयोगियों ने कुछ गड़बड़ होने की बात की और दोबारा मतों की गणना की अपील हुई। रीकाउंटिंग में डॉ. अमूल देसाई ने 19 वोटों से मोरारजी देसाई को हरा दिया। यही नहीं मोरारजी देसाई के साथ-साथ डॉ. भीमराव आंबेडकर और आचार्य कृपलानी जैसे बड़े नेता भी इस चुनाव में हार गए थे।

पहले चुनाव की एक रोचक बात ये भी है कि कुछ संसदीय सीटें ऐसी थीं, जहां दो से ज्यादा सांसद बने। एक सामान्य वर्ग से और दूसरा एससी-एसटी वर्ग से था। हालांकि, 1962 में यह व्यवस्था खत्म हुई। दरअसल उस समय लोकसभा में कुल 499 सीटें थीं लेकिन मतदान 489 के लिए ही हुआ था, क्योंकि 10 सांसदों को मनोनीत किया जाता था।

तब देश में संसदीय क्षेत्रों की संख्या 401 थी। लोकसभा की 314 संसदीय सीटें ऐसी थीं, जहां से सिर्फ एक-एक प्रतिनिधि चुने जाने थे। वहीं 86 संसदीय सीटें ऐसी थी जिनमें दो-दो लोगों को सांसद चुना जाना था। जबकि उत्तर बंगाल के संसदीय क्षेत्र से तीन सांसद चुने गए थे। किसी संसदीय क्षेत्र में एक से अधिक सदस्य चुनने की यह व्यवस्था 1957 तक जारी रही।

लोकसभा की बेवसाइट के मुताबिक चुनाव संपन्न होने के बाद पहली लोकसभा 17 अप्रैल, 1952 को अस्तित्व में आई थी। इसकी पहली बैठक 13 मई, 1952 को आयोजित की गई थी।

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